राजस्थान के पाली जिले में स्थित जवाई की पथरीली वादियों में वन्यजीवों और स्थानीय आबादी के बीच सदियों पुराना शांतिपूर्ण तालमेल अब एक नए प्रशासनिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गया है. अरावली की ग्रेनाइट चट्टानों के बीच बसे इस इलाके में उच्च न्यायालय के हालिया निर्देश के बाद लेपर्ड केव यानी तेंदुओं की गुफाओं के एक किलोमीटर के दायरे में नई पाबंदियां लागू की जा रही हैं. इस फैसले से स्थानीय स्तर पर खेती किसानी करने वाले किसानों, पशुपालक परिवारों और उभरते पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों के सामने आजीविका का बड़ा संकट खड़ा हो गया है. प्रशासन की इस कवायद के सामने आते ही जवाई क्षेत्र के 11 गांवों के बाशिंदों ने लामबंद होकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एक नए संयुक्त संगठन का गठन किया है.
जवाई संघर्ष समिति का गठन और 11 गांवों की एकजुटता
अदालती आदेश से उपजे हालात पर चर्चा करने और आगे की रणनीति तय करने के लिए प्रभावित गांवों के लोगों ने एक मंच पर आने का फैसला किया. इस मुहिम के तहत बलवना, बीसलपुर, पैरवा, जीवदा, सेणा, दुदनी, मोरी बेड़ा, वरावल, रघुनाथपुरा, कोठार और वेलार जैसे 11 गांवों के प्रतिनिधियों ने मिलकर जवाई संघर्ष समिति बनाई है. ग्रामीणों का दो टूक कहना है कि जिस वन्यजीव के साथ वे पीढ़ियों से बिना किसी टकराव के सह-अस्तित्व में रह रहे हैं, उसी के संरक्षण के नाम पर उनके पारंपरिक अधिकारों पर बंदिशें थोपना कतई स्वीकार्य नहीं है. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि वे अपने पुरखों की जमीन और सदियों पुरानी जीवनशैली से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे.
फैसले के खिलाफ जनसमर्थन जुटाने और साझा रणनीति बनाने के मकसद से इलाके के प्रमुख धार्मिक और सामाजिक स्थलों पर बड़ी पंचायतों का आयोजन किया गया. जीवदा गांव में स्थित माताजी मंदिर, सेणा गांव तथा वरावल के प्रसिद्ध हनुमानजी मंदिर में अलग-अलग बैठकें हुईं, जिनमें सैकड़ों ग्रामीणों ने हिस्सा लिया. इन महत्वपूर्ण बैठकों का नेतृत्व किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष जयेन्द्र सिंह गल्थनी, बीसलपुर के रघुवीर सिंह जी देवड़ा, जसवंत सिंह जी गल्थनी, राजपूत करनी सेना जोधपुर संभाग के अध्यक्ष मनमोहन सिंह जी बीसलपुर, वेलार के संग्राम सिंह, पैरवा के लोकेंद्र सिंह, जीवदा के विक्रम सिंह, सेणा के हुपेंद्र सिंह तथा राजेन्द्र सिंह सेणा ने किया. सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि अदालती दिशा-निर्देशों से जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया गया है, जिसका सीधा असर आम ग्रामीण की दैनिक जिंदगी पर पड़ेगा.
रेबारी समाज की अनूठी आस्था और लेपर्ड्स का सह-अस्तित्व
पाली जिले की पथरीली अरावली पहाड़ियों की तलहटी में बसा जवाई पूरे देश में इंसान और वन्यजीव के अनूठे रिश्ते के लिए जाना जाता है. यहां ग्रेनाइट की विशालकाय चट्टानों पर रहने वाले तेंदुए और आसपास के ग्रामीण बिना किसी लोहे की जाली, बाड़ या पिंजरे के एक साथ रहते आए हैं. शाम के समय जब पहाड़ियों पर ढलते सूरज की किरणें बिखरती हैं, तब चट्टानों के बीच बैठे तेंदुए स्थानीय चरवाहों और मवेशियों को निहारते हैं, लेकिन दोनों तरफ किसी किस्म का डर या आक्रामकता नहीं दिखती. यह विश्वास सदियों की उस परंपरा से उपजा है, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के दायरे का सम्मान किया है.
विशेष रूप से स्थानीय रेबारी समाज, जो पारंपरिक रूप से पशुपालन पर निर्भर है, इस रिश्ते को अपनी गहरी धार्मिक आस्था से जोड़ता है. रेबारी समुदाय के लोग तेंदुओं को केवल एक खूंखार शिकारी जानवर नहीं मानते, बल्कि उन्हें अपनी कुलदेवी यानी माताजी का पावन वाहन और इन दुर्गम पहाड़ियों का प्राकृतिक रखवाला मानते हैं. इसी अटूट श्रद्धा के कारण आज तक न तो इंसानों ने तेंदुओं के प्राकृतिक आवास में अनुचित खलल डाला और न ही तेंदुओं ने कभी इंसानी बस्तियों पर जानलेवा हमले किए. दुनिया भर में जब वन्यजीवों और इंसानों के बीच हिंसक टकराव की खबरें आती हैं, तब जवाई का यह सह-अस्तित्व संरक्षण का एक जीवंत और स्वाभाविक उदाहरण पेश करता है.
एक किलोमीटर के प्रतिबंध से आजीविका पर संकट
ग्रामीणों और स्थानीय प्रतिनिधियों का स्पष्ट मत है कि लेपर्ड केव से एक किलोमीटर के दायरे को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करने से समूचे जवाई बेल्ट का सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना बिखर जाएगा. इस दायरे में पाबंदियां लगने से सबसे ज्यादा मार उन किसानों पर पड़ेगी जिनके खेत पहाड़ियों की तलहटी में मौजूद हैं. इसके अलावा, पशुपालकों के लिए मवेशी चराने के पारंपरिक रास्ते बंद होने का खतरा पैदा हो गया है. जवाई बांध और लेपर्ड सफारी के जरिए पिछले कुछ वर्षों में उभरे स्थानीय इको-टूरिज्म और होमस्टे कारोबार पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा, जिससे सैकड़ों युवाओं का रोजगार जुड़ा हुआ है.
संघर्ष समिति के नेताओं का कहना है कि जब स्थानीय ग्रामीण खुद दशकों से तेंदुओं के प्राकृतिक संरक्षक बने हुए हैं, तो कागजी सीमाओं और पाबंदियों के जरिए उन्हें अपनी ही जमीन से बेदखल करने जैसी स्थिति बनाना बेहद अनुचित है. इस तरह के कड़े प्रतिबंधों से पूरे क्षेत्र का विकास ठहर जाएगा और स्थानीय आबादी में वन विभाग व प्रशासन के प्रति गहरा अविश्वास पैदा होगा.
प्रशासन को ज्ञापन और बड़े आंदोलन की चेतावनी
जवाई संघर्ष समिति ने बैठकों के बाद अपनी आगामी कार्ययोजना स्पष्ट कर दी है. समिति के प्रतिनिधियों ने तय किया है कि वे जल्द ही जिला कलेक्टर, पाली के समक्ष उपस्थित होकर एक विस्तृत और शांतिपूर्ण ज्ञापन सौंपेंगे. इस ज्ञापन के जरिए राज्य सरकार और न्यायपालिका तक स्थानीय लोगों की वास्तविक परेशानियों और सह-अस्तित्व के जमीनी तथ्यों को पहुंचाया जाएगा. ग्रामीणों ने आग्रह किया है कि लेपर्ड केव के एक किलोमीटर के दायरे वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाए और स्थानीय आबादी के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए.
बैठक में मौजूद सभी 11 गांवों के प्रतिनिधियों ने एकमत से संकल्प लिया कि यदि प्रशासन और सरकार ने उनकी जायज मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं दिखाया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन को और तेज किया जाएगा. ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी आजीविका, खेती और पारंपरिक संस्कृति को बचाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से सड़क से लेकर कानूनी मंच तक अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.


















