समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए हमेशा अकूत धन या बड़े संसाधनों की दरकार नहीं होती, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और समर्पण का भाव किसी भी बड़े मिशन को साकार कर सकता है. राजस्थान के झुंझुनूं जिले के अंतर्गत आने वाले सूरजगढ़ कस्बे में रहने वाले दो दोस्तों ने इस बात को पूरी तरह सच साबित कर दिखाया है. इनमें से एक दोस्त खुद शारीरिक दिव्यांगता का सामना कर रहे हैं, जबकि दूसरे पंडिताई और धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं. बेहद सीमित व्यक्तिगत आमदनी के बावजूद दोनों साथी पिछले सात वर्षों से लगातार दिव्यांग बच्चों और असहाय बुजुर्गों का जीवन संवारने में अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं.
यह प्रेरक कहानी दिव्यांग आंचल सेवा समिति के अध्यक्ष अशोक सैन और संस्था के सचिव जितेंद्र महमिया की है. वर्ष 2017 में दोनों मित्रों ने यह साझा संकल्प लिया था कि वे समाज के उपेक्षित दिव्यांग बच्चों को बुनियादी शिक्षा और आत्मनिर्भरता की राह दिखाएंगे. उसी दिन से शुरू हुआ सेवा का यह सिलसिला आज तक बिना रुके चल रहा है. उनकी इस समर्पित पहल के चलते अब तक 100 से अधिक दिव्यांग बच्चों और जरूरतमंद बुजुर्गों को नया जीवन और संबल मिल चुका है.
पेंशन और दक्षिणा से जुटाई जाती है सेवा की पूंजी
इस सेवा अभियान की सबसे अनूठी और प्रेरणादायक बात यह है कि दोनों दोस्त किसी बाहरी आर्थिक मदद या बड़े दान पर निर्भर नहीं हैं. वे अपने निजी खर्चों में कटौती करके अपनी जेब से यह पूरी व्यवस्था संभालते हैं. संस्था के अध्यक्ष अशोक सैन स्वयं दिव्यांग हैं. उन्हें सरकार से मिलने वाली दिव्यांग पेंशन के साथ-साथ सूरजगढ़ नगरपालिका में मनोनीत पार्षद के रूप में मिलने वाले मासिक भत्ते की पूरी राशि इस सेवा कार्य के लिए समर्पित रहती है.
वहीं संस्था के सचिव जितेंद्र महमिया पूजा-पाठ, कथा और धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए पंडिताई का काम करते हैं. जितेंद्र अपने यजमानों से मिलने वाली धार्मिक दक्षिणा का 20 प्रतिशत हिस्सा हर महीने सीधे संस्था के सेवा कोष में जमा कर देते हैं. दोनों दोस्तों का यह मानना है कि जीवन यापन के लिए जितनी आवश्यकता है, उतना रखकर बाकी हिस्सा समाज के उन लोगों पर खर्च किया जाना चाहिए जो खुद अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं. उनका ध्येय केवल आर्थिक सहायता देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे बच्चों को हुनर सिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहते हैं.
बस स्टैंड पर स्थापित किया विशेष स्कूल
दिव्यांग और मंदबुद्धि बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए इन दोनों साथियों ने सूरजगढ़ कस्बे के मुख्य बाजार बस स्टैंड पर जीवन ज्योत मंद बुद्धि स्पेशल स्कूल की स्थापना की. इस केंद्र में मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को पूरी तरह निशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती है. इसके साथ ही बच्चों की शारीरिक क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें रोजगारपरक और व्यावहारिक हुनर सिखाने का प्रयास किया जाता है, ताकि वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें.
वित्तीय संसाधनों के भारी अभाव के कारण फिलहाल यह स्पेशल स्कूल महीने में केवल पांच दिन ही संचालित किया जा पा रहा है. संस्था के संचालकों का कहना है कि यदि प्रशासन या राज्य सरकार की ओर से कोई नियमित वित्तीय मदद या अनुदान उपलब्ध कराया जाए, तो इस स्कूल को प्रतिदिन चलाया जा सकता है. नियमित संचालन से आसपास के ग्रामीण अंचलों के दर्जनों अतिरिक्त बच्चों को गुणवत्तापूर्ण विशेष शिक्षा और पेशेवर थेरेपी का लाभ मिल सकेगा.
निजी संघर्षों से उपजी दूसरों का दर्द समझने की प्रेरणा
संस्था अध्यक्ष अशोक सैन बताते हैं कि खुद दिव्यांग होने के नाते उन्होंने जीवन के हर मोड़ पर आने वाली व्यावहारिक और सामाजिक चुनौतियों को बेहद करीब से भोगा है. साधारण दैनिक कार्यों से लेकर सरकारी दफ्तरों में आवश्यक कागजी प्रक्रियाओं को पूरा कराने में जो परेशानियां एक दिव्यांग व्यक्ति झेलता है, उसका उन्हें व्यक्तिगत अनुभव है. इसी जमीनी पीड़ा ने उन्हें समाज के अन्य दिव्यांगजनों की मदद के लिए आगे आने को प्रेरित किया.
अशोक और जितेंद्र ने पाया कि शहरों की तुलना में सुदूर ग्रामीण इलाकों और ढाणियों में रहने वाले दिव्यांगजन आवश्यक सुविधाओं से पूरी तरह कट जाते हैं. जागरूकता की भारी कमी और सीमित आवागमन साधनों के चलते गांव-देहात के परिवार सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं. इस खाई को पाटने के लिए दोनों मित्र खुद गांव-गांव और सुदूर ढाणियों में जाकर ऐसे बच्चों और बुजुर्गों की पहचान करते हैं, फिर उनकी जरूरत के मुताबिक आवश्यक कागजात और सहायता मुहैया कराते हैं.
दिव्यांगता प्रमाण पत्र से लेकर ट्राई साइकिल वितरण तक का सफर
दिव्यांग आंचल सेवा समिति मुख्य रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के मेडिकल बोर्ड से दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाने में सेतु का काम करती है. ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को यह पता नहीं होता कि प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कैसे और कहां किया जाए, ऐसे में दोनों कार्यकर्ता उन्हें अस्पताल ले जाकर पूरी प्रक्रिया संपन्न कराते हैं. इसके साथ ही चलने-फिरने में असमर्थ जरूरतमंदों को निशुल्क ट्राई साइकिल और अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में पूरा सहयोग दिया जाता है.
इतना ही नहीं, कोरोना महामारी के संकटपूर्ण समय में जब गरीब और दिव्यांग परिवारों की आजीविका पर संकट आ गया था, तब भी इस संस्था ने अपने स्तर पर जरूरतमंदों को जरूरी राशन और आर्थिक मदद पहुंचाई थी. दोनों दोस्तों का स्पष्ट लक्ष्य है कि इलाके का कोई भी दिव्यांग व्यक्ति सिर्फ जानकारी के अभाव या गरीबी के कारण अपने कानूनी और मानवीय अधिकारों से वंचित न रहे.
बुजुर्गों के लिए समर्पित आश्रम का सपना
अशोक सैन और जितेंद्र महमिया का अगला बड़ा लक्ष्य बेसहारा दिव्यांग वृद्धजनों के लिए एक सुरक्षित आश्रम का निर्माण करना है. उनका मानना है कि ऐसे वृद्धजन, जिन्हें वृद्धावस्था और दिव्यांगता दोनों का दोहरा दंश झेलना पड़ रहा है और जिनके परिवार उनका साथ छोड़ चुके हैं, उन्हें विशेष स्नेह और चिकित्सकीय देखभाल की जरूरत होती है. दोनों दोस्तों को भरोसा है कि अगर सरकार या समाज से उचित सहयोग मिला, तो वे न केवल अपने स्पेशल स्कूल को दैनिक आधार पर संचालित कर सकेंगे, बल्कि बुजुर्गों के लिए आश्रय गृह भी खड़ा कर पाएंगे. यह कहानी दर्शाती है कि समाज में बड़ा बदलाव लाने के लिए पद या पैसे से अधिक सेवाभाव और नेक नीयत की जरूरत होती है.



















