लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बुनियादी धुरी कहे जाने वाले पंचायती चुनावों में आर्थिक गैर-बराबरी की एक बेहद चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राजस्थान पंचायतीराज चुनाव 2026 की चुनावी जंग में उतरे उम्मीदवारों के आधिकारिक घोषणापत्रों से पता चला है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी दिग्गज पार्टियों के कम से कम 370 प्रत्याशियों के बैंक खातों में एक पैसा भी जमा नहीं है। स्थिति यह है कि इन उम्मीदवारों के खाते में एक हजार रुपये का न्यूनतम बैलेंस तक मौजूद नहीं है। इसके विपरीत, कई अन्य प्रत्याशी लाखों की चल और अचल संपत्ति के बूते मुकाबले में अपनी ताल ठोक रहे हैं। यह विरोधाभास साफ दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर चुनाव लड़ने वाले हर चेहरे की माली हालत एक जैसी मजबूत नहीं है।
नामांकन दाखिल करते समय निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए गए शपथ पत्रों से यह भी खुलासा हुआ है कि चुनावी समर में उतरे कई परिवारों का जीवनयापन बेहद कठिन परिस्थितियों में चल रहा है। कई उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके घरों का चूल्हा रोजमर्रा की मजदूरी से जलता है, जहां पुरुष सदस्य दिहाड़ी मजदूरी करने को विवश हैं और घर की महिला प्रत्याशी जिला परिषद अथवा पंचायत समिति की सदस्यता हासिल करने के लिए वोट मांग रही हैं।
टिकट बंटवारे में युवा पीढ़ी को मिला बेहद सीमित दायरा
शहरी क्षेत्रों के स्थानीय निकाय चुनावों में युवा चेहरे यानी जेन-जी दावेदारों को तरजीह देने की बातें करने वाले राजनीतिक संगठनों की कथनी और करनी का अंतर इस बार गांवों के चुनावी दंगल में साफ झलक रहा है। जिला परिषद सदस्य और पंचायत समिति सदस्य के महत्वपूर्ण पदों के लिए राजनीतिक दलों ने युवाओं को उम्मीद से काफी कम प्रतिनिधित्व दिया है। एकत्रित जानकारी के मुताबिक, बांटे गए लगभग 6200 टिकटों के बड़े आंकड़े में से मात्र करीब 800 टिकट ही जेन-जी श्रेणी के युवाओं की झोली में आ सके हैं। प्रतिशत के लिहाज से देखा जाए तो ग्रामीण राजनीति में युवाओं की भागीदारी मात्र 13 से 14 प्रतिशत के सीमित दायरे तक ही सिमट कर रह गई है। इस आंकड़े ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े दलों ने पंचायत स्तर पर पुरानी कमान और स्थापित समीकरणों पर ही ज्यादा भरोसा जताया है।
करीब 4 हजार दावेदारों की कुल जमा-पूंजी 10 लाख रुपये से कम
उम्मीदवारों के आर्थिक प्रोफाइल की पड़ताल बताती है कि राजस्थान के इन चुनावों में लगभग 4 हजार उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनकी चल और अचल मिल्कियत को यदि जोड़ भी दिया जाए, तो भी उसका कुल मूल्यांकन 10 लाख रुपये का आंकड़ा नहीं छू पाता। यह आंकड़ा साबित करता है कि ग्रामीण स्वशासन की दौड़ में शामिल होने वाले एक बहुत बड़े तबके के पास पर्याप्त आर्थिक संबल का अभाव है।
हैरानी की बात यह भी है कि इस फेहरिस्त में कुछ ऐसे प्रत्याशी भी शामिल हैं जो पूर्व में ग्राम पंचायत के सरपंच पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इसके बावजूद उनके मौजूदा बैंक बैलेंस के कॉलम में शून्य रुपये का ब्योरा दर्ज है। किसी पूर्व जन प्रतिनिधि के पास बैंक खाते में एक रुपया भी न होना प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में कौतूहल का विषय बन गया है। इससे यह बात भी पुख्ता होती है कि जमीनी राजनीति में उतरे सभी दावेदार आर्थिक रूप से संपन्न या मजबूत पृष्ठभूमि वाले नहीं हैं।
जोधपुर में 22 साल की उम्मीदवार के पास मात्र 53 हजार की मिल्कियत
उम्मीदवारों के बीच मौजूद संपत्ति के इस बड़े फासले की बानगी जोधपुर जिला परिषद के वार्ड संख्या 27 में देखने को मिली है। यहां से कांग्रेस पार्टी की तरफ से चुनावी अखाड़े में उतरीं 22 साल की युवा प्रत्याशी ललिता रॉयल ने अपने हलफनामे में कुल संपत्ति मात्र 53 हजार रुपये दर्ज कराई है। इसमें उनकी चल और अचल दोनों तरह की संपत्तियां शामिल हैं। खास बात यह है कि उनके पास नकद धनराशि के कॉलम में शून्य रुपये का उल्लेख है। इतनी कम संपत्ति और बिना किसी बैंक बैलेंस के चुनावी मैदान में डटे रहना यह बताता है कि साधारण से साधारण पृष्ठभूमि के लोग भी आज व्यवस्था का हिस्सा बनने का प्रयास कर रहे हैं।
लाखों की मिल्कियत वाले दावेदारों की लंबी सूची
शून्य बैलेंस वाले उम्मीदवारों के समानांतर कई ऐसे प्रत्याशी भी हैं जिनकी मिल्कियत लाखों रुपयों में आंकी गई है। उपलब्ध चुनावी ब्योरे के अनुसार, भानू देवी की संपत्ति 22.81 लाख रुपये और राज कंवर की कुल संपत्ति 22.77 लाख रुपये बताई गई है। इसी तरह चुन्नी देवी ने 18.75 लाख रुपये, महेंद्र बिश्नोई ने 15.78 लाख रुपये और इंद्रा राम ने 14.10 लाख रुपये की मिल्कियत घोषित की है।
अन्य उम्मीदवारों की बात करें तो भीखा देवी की संपत्ति 11.02 लाख रुपये, रमेश कुमार की अलग-अलग दर्ज प्रविष्टियों में 10.75 लाख और 3.40 लाख रुपये तथा रवि गहलोत की 10.26 लाख रुपये है। इसके अलावा इंद्रा की संपत्ति 9.35 लाख रुपये, मुरलीराम की 8.60 लाख रुपये, सुमित्रा की 8.52 लाख रुपये, लहरी देवी की 7.70 लाख रुपये और गोविंदराम की 7.10 लाख रुपये सामने आई है। वहीं संतोष कंवर के पास 6.63 लाख रुपये, गवरी देवी के पास 6.34 लाख रुपये, बेबी के पास 5.70 लाख रुपये, सुरमा के पास 5.25 लाख रुपये, महिपाल के पास 2.31 लाख रुपये, कानाराम के पास 2.30 लाख रुपये और हरिया देवी के पास 2.63 लाख रुपये की संपत्ति दर्ज है।
यह विविधता बताती है कि राजस्थान की पंचायती राजनीति में एक तरफ जहां लाखों के संसाधनों वाले दावेदार सक्रिय हैं, वहीं दूसरी तरफ न्यूनतम जमा-पूंजी और दिहाड़ी पर निर्भर परिवार भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। अब देखना होगा कि मतदाता आर्थिक हैसियत से परे किस आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं।

















