देशभर में जन्माष्टमी का पर्व बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। सामान्य तौर पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात 12 बजे मनाने का विधान है। आधी रात को ही मंदिरों में शंख और घंटे-घड़ियाल बजते हैं, भगवान के जन्म की आरती होती है और श्रद्धालु बाल गोपाल के दर्शन कर अपना उपवास तोड़ते हैं। हालांकि राजस्थान के करौली जिले में एक ऐसा ऐतिहासिक मंदिर मौजूद है जहां यह परंपरा बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां आधी रात का इंतजार करने के बजाय दोपहर 12 बजे ही नंदलला का जन्मोत्सव धूमधाम से आयोजित किया जाता है।
रात 12 बजे के बजाय दोपहर 12 बजे जन्मोत्सव
राजस्थान की प्रसिद्ध धार्मिक नगरी करौली को भगवान मदनमोहन जी की नगरी के रूप में जाना जाता है। इस शहर की विभिन्न गलियों में श्रीकृष्ण के अनेक स्वरूपों के छोटे और बड़े मंदिर स्थापित हैं। करौली के अन्य सभी मंदिरों में जन्माष्टमी पर आधी रात 12 बजे ही भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है। परंतु मदनमोहन जी मंदिर जाने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित करीब 150 साल पुराना गोपीनाथ जी मंदिर इस मामले में सबसे अनोखा है। इस मंदिर में कई दशकों से जन्माष्टमी के दिन दोपहर 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है। दिन में ही भगवान के जन्म का उत्सव होने के कारण करौली और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
दिन में परंपरा शुरू होने की खास वजह
मंदिर के मुख्य पुजारी अजय मुखर्जी के अनुसार जन्माष्टमी पर दोपहर में जन्मोत्सव आयोजित करने के पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक और मानवीय कारण रहा है। आमतौर पर भक्त दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखते हैं और रात 12 बजे कान्हा के जन्म के बाद आरती देखकर ही अपना व्रत खोलते हैं। ऐसी स्थिति में छोटे बच्चों, बुजुर्गों और अस्वस्थ श्रद्धालुओं के लिए देर रात तक भूखे-प्यासे रहकर इंतजार करना काफी कठिन हो जाता था। श्रद्धालुओं की इस परेशानी को देखते हुए बहुत समय पहले मंदिर के बुजुर्गों और पूर्वजों ने आपस में विचार करके दिन में ही जन्मोत्सव मनाने का निर्णय लिया। तब से हर साल दोपहर 12 बजे ही गोपीनाथ जी मंदिर में जन्मोत्सव संपन्न होता है।
एक ही आसन पर तीन विग्रहों के दर्शन
गोपीनाथ जी का यह मंदिर न केवल अपनी अनोखी समय-सारणी के लिए जाना जाता है बल्कि अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। लगभग 150 वर्ष से अधिक प्राचीन इस मंदिर का सीधा संबंध करौली के राजशाही काल से रहा है। मंदिर के गर्भगृह की बनावट और सुंदरता श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है। गर्भगृह में स्थित एक ही विशाल आसन पर तीन दिव्य विग्रह विराजमान हैं। मुख्य स्थान पर बीच में गोपीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित है, जबकि उनके दाहिनी ओर श्रीराधा जी और बाईं ओर ललिता जी विराजमान हैं। एक ही पीठ पर तीनों स्वरूपों के एक साथ दर्शन करना श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
राजशाही जमाने से जारी है सेवा-पूजा की परंपरा
मंदिर की सेवा और देखभाल का इतिहास भी बेहद खास है। पुजारी अजय मुखर्जी बताते हैं कि करौली के तत्कालीन राजाओं ने उनके पूर्वजों को यह मंदिर सेवा-पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के संचालन के लिए दान स्वरूप सौंपा था। उसी समय से उनका परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी गोपीनाथ जी की सेवा में समर्पित है। मंदिर में रोजाना चार समय ठाकुर जी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। सुबह मंगला आरती के माध्यम से भगवान को जगाया जाता है, जिसके बाद दिन के समय राजभोग आरती का आयोजन होता है और ठाकुर जी को विशेष प्रसादम अर्पित किया जाता है। शाम और रात में भी नियमानुसार आरती और शयन के अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं।
जन्माष्टमी पर करौली में विशेष माहौल और दर्शन
जन्माष्टमी के पावन अवसर पर गोपीनाथ जी मंदिर का दृश्य देखते ही बनता है। सुबह से ही मंदिर परिसर में रंग-बिरंगी सजावट और भजनों की गूंज के बीच श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। जैसे ही दोपहर के 12 बजते हैं, मंदिर में शंखध्वनि और घड़ियाल गूंज उठते हैं और पूरा परिसर नंद के आनंद भयो के जयकारों से सराबोर हो जाता है। जो श्रद्धालु उम्र या स्वास्थ्य के कारण रात 12 बजे तक उपवास रखने में असमर्थ होते हैं, वे दोपहर में ही भगवान के जन्म के दर्शन करके प्रसादम ग्रहण करते हैं और अपना व्रत पूरा करते हैं। दूर-दराज से आने वाले भक्तों के लिए यह मंदिर जन्माष्टमी के दिन आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है।



















