शेखावाटी समेत राजस्थान के अनेक अंचलों में लोकदेवता जाहरवीर गोगाजी की स्मृति में गोगानवमी का पावन पर्व पूरी आस्था के साथ मनाया जाता है। इस विशिष्ट अवसर पर रक्षाबंधन के पावन पर्व पर बहनों द्वारा भाइयों को बांधी गई राखी को पूरी विधि-विधान और पूजा-अर्चना के बाद गोगाजी को समर्पित किया जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार जाहरवीर गोगाजी का जन्म चूरू जिले के ऐतिहासिक ददरेवा गांव में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। उनके पिता का नाम जेवर सिंह और माता का नाम बाछल देवी था। जनश्रुतियों और प्रचलित कथाओं के मुताबिक गुरु गोरखनाथ के दिव्य आशीर्वाद से बाछल देवी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी, जिनका नाम गुगो रखा गया था।
लोकदेवता के रूप में गोगाजी की ख्याति और पूजा परंपरा
समय के साथ यही गुगो आगे चलकर गोगाजी के रूप में प्रतिष्ठित हुए और एक लोकप्रिय लोकदेवता के तौर पर पूजे जाने लगे। आम जनमानस में उन्हें जाहरवीर, गोगा पीर और सर्पों के देवता के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। उनकी वीरता, साहस और लोक कल्याण से जुड़ी गाथाएं राजस्थान के घर-घर और गांव-गांव में रची-बची हैं। गोगाजी की आराधना की यह परंपरा गांवों में खेजड़ी के वृक्ष के नीचे बने उनके थान तक भी विस्तृत है और वर्तमान समय में भी तमाम ग्रामीण इलाकों में गोगाजी के थान पर पहुंचकर श्रद्धालु मत् टेकते हैं और धोक लगाते हैं।
गोगामेड़ी मंदिर और सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल
लोकदेवता गोगाजी का मुख्य और प्रधान मंदिर हनुमानगढ़ जिले के गोगामेड़ी नामक स्थान पर स्थित है। इस पवित्र स्थल को उनकी समाधिस्थली भी माना जाता है, जहां गोगानवमी के पावन अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है। इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोग अपनी अटूट श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं। गोगाजी के थान या मंदिर में पहुंचकर दोनों समुदाय के लोग धोक लगाते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना संपन्न करते हैं। गोगाजी को जाहरवीर, गोगापीर और गोगाजी महाराज जैसे विभिन्न नामों से भी पुकारा जाता है।
मातृभूमि की रक्षा के लिए गजनवी की सेना से ऐतिहासिक संघर्ष
लोकमान्यताओं के अनुसार गोगाजी को सर्पों के प्रकोप से रक्षा करने वाला देवता भी माना जाता है। गांवों और शहरों में उनके नाम से विशेष मेड़ियां और थान बने हुए हैं। लोकदेवता गोगाजी ने अपनी मातृभूमि और गौवंश की रक्षा के लिए महमूद गजनवी की अजेय सेना के साथ भीषण युद्ध लड़ा था। किंवदंतियों में यहां तक उल्लेख मिलता है कि युद्धभूमि में अपना सिर कट जाने के बावजूद उनका धड़ शत्रुओं के विरुद्ध अदम्य साहस के साथ लड़ता रहा था। उनकी इस अभूतपूर्व वीरता और शौर्य को देखकर विरोधी सेना के सैनिक भी भयभीत हो गए थे।
सीकर में आयोजित होने वाला 76वां भव्य मेला
इसी असीम वीरता और लोककल्याणकारी भावनाओं के कारण गोगाजी आज भी राजस्थान समेत देश के कई अन्य क्षेत्रों में एक लोकदेवता के रूप में अत्यंत आदर के साथ पूजे जाते हैं। सीकर शहर के वार्ड नंबर 33 में स्थित सिटी डिस्पेंसरी नंबर-2 के ठीक पीछे बने गोगामेड़ी मंदिर में गोगाजी महाराज का 76वां वार्षिक मेला आगामी 5 सितंबर, शनिवार के दिन आयोजित किया जाएगा। मंदिर के सम्मानित पुजारी माल सिंह सोलंकी ने इस आयोजन के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि मेले को लेकर सभी प्रकार की तैयारियां आरंभ कर दी गई हैं और व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक कार्यक्रम
आगामी 4 सितंबर को जन्माष्टमी के पावन पर्व पर दोपहर के समय महिला मंडल की ओर से सुंदर सत्संग का आयोजन किया जाएगा। इसके पश्चात रात्रि के समय प्रतिष्ठित संतों द्वारा गोगाजी महाराज के मनमोहक भजनों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाएगा। इसके बाद 5 सितंबर के दिन जाहरवीर गोगाजी महाराज का विशेष और भव्य श्रृंगार किया जाएगा। उसी दिन शाम को ठीक 4 बजे से मंदिर परिसर में मुख्य मेला शुरू हो जाएगा और शाम 7:15 बजे गोगाजी महाराज की महाजोत प्रज्वलित की जाएगी। इस धार्मिक और सांस्कृतिक मेले में बड़ी संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की पूरी संभावना है।





















