राजस्थान के औद्योगिक शहर भीलवाड़ा में नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। नगर परिषद से नगर निगम में क्रमोन्नत होने के बाद हो रहे इस पहले ऐतिहासिक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। कुल 70 वार्डों वाले इस नए नगर निगम में लगभग 3 लाख मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करके शहर के नए प्रशासनिक बोर्ड का फैसला करेंगे। लंबे समय से भाजपा का पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले भीलवाड़ा में इस बार मुकाबला केवल दो प्रमुख दलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कई वार्डों में मजबूत निर्दलीय उम्मीदवारों और बागियों की मौजूदगी ने चुनावी समीकरणों को त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय बना दिया है। दोनों मुख्य पार्टियां अपने-अपने पक्ष में माहौल बनाने और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साधने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं।
महापौर पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित, दावेदारों में बढ़ा उत्साह
राज्य सरकार के स्वायत्त शासन विभाग ने वर्ष 2024 में भीलवाड़ा नगर परिषद का दर्जा बढ़ाकर इसे नगर निगम में क्रमोन्नत किया था। इस प्रशासनिक बदलाव के तुरंत बाद तत्कालीन सभापति राकेश पाठक भीलवाड़ा नगर निगम के प्रथम महापौर बने थे। अब निगम बनने के बाद पहली बार आम चुनाव आयोजित किए जा रहे हैं, जिसमें महापौर की प्रतिष्ठित कुर्सी को सामान्य महिला के लिए आरक्षित किया गया है। आरक्षण की इस घोषणा के बाद से ही दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के भीतर महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीदवारी को लेकर खींचतान और मंथन का दौर तेज हो गया है।
भारतीय जनता पार्टी के खेमे में महापौर पद की दौड़ के लिए पूर्व सभापति मंजू चेचाणी का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। उनके साथ ही पार्टी संगठन में सक्रिय आरती कोगटा के नाम की भी जोरदार चर्चा चल रही है। दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी के भीतर से पूर्व सभापति मंजू पोखरना, सुशीला सालवी और समदू देवी खटीक जैसे अनुभवी और प्रमुख चेहरे चुनावी मैदान में अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी में जुटे हैं। इस बार महापौर का चुनाव सीधे जनता के वोटों से होगा या फिर निर्वाचित पार्षदों के बोर्ड में बहुमत के आधार पर तय किया जाएगा, इसका वास्तविक प्रभाव मतगणना के नतीजों के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। फिलहाल दोनों ही राजनीतिक दल अपने ज्यादा से ज्यादा पार्षदों को जिताने के लिए वार्ड स्तर पर रणनीति बनाने में लगे हुए हैं।
54 वर्षों का समृद्ध इतिहास और 7 चुनावों के राजनीतिक आंकड़े
भीलवाड़ा में स्थानीय निकाय शासन का इतिहास काफी पुराना और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। भीलवाड़ा नगर परिषद की स्थापना करीब 54 वर्ष पूर्व वर्ष 1970 में की गई थी। स्थापना से लेकर अब तक यहां कुल 7 बार निकाय चुनाव संपन्न हो चुके हैं। यदि इन सात चुनावों के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो राजनीतिक संतुलन दोनों बड़े दलों के बीच विभाजित नजर आता है। इनमें से 4 बार भारतीय जनता पार्टी अपना बोर्ड बनाने और सभापति की कुर्सी पर कब्जा जमाने में सफल रही है, जबकि 3 बार कांग्रेस पार्टी ने जीत दर्ज कर अपना बोर्ड गठित किया है।
कांग्रेस शासन के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश नराणीवाल दो अलग-अलग कार्यकालों में भीलवाड़ा नगर परिषद के सभापति रहे हैं, जबकि मंजू पोखरना ने एक बार सभापति के रूप में जिम्मेदारी संभाली है। वर्ष 2010 के बाद से भीलवाड़ा की स्थानीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का दबदबा और प्रभाव काफी मजबूत होता चला गया। इस चुनावी सफलता के दौर में भाजपा की ओर से अनिल बल्दवा, ललिता समदानी और मंजू चेचाणी ने अलग-अलग समय पर निकाय की कमान संभाली और सभापति पद का दायित्व निभाया।
वर्ष 2019 का राजनीतिक घटनाक्रम और अदालती फैसला
वर्ष 2010 के बाद भले ही भाजपा ने स्थानीय निकाय पर अपनी पकड़ मजबूत रखी, लेकिन वर्ष 2019 में भीलवाड़ा की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया जिसने दोनों दलों के बीच खींचतान को सार्वजनिक कर दिया। उस समय भाजपा की तत्कालीन सभापति ललिता समदानी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, जिसके चलते राज्य सरकार ने उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया था। इस प्रशासनिक कार्रवाई के बाद तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस की मंजू पोखरना को नगर परिषद का नया सभापति नियुक्त किया गया था।
सभापति पद से हटाए जाने के इस फैसले को भाजपा ने न्यायालय में चुनौती दी। यह मामला उच्च अदालत तक पहुंचा और लंबी कानूनी सुनवाई के बाद अदालत ने अपना फैसला सुनाया। अदालत के स्पष्ट आदेशों के अनुपालन में भाजपा की मंजू चेचाणी को भीलवाड़ा नगर परिषद का नया सभापति नियुक्त किया गया। इस पूरे कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम ने शहर में दोनों राजनीतिक खेमों के बीच प्रतिस्पर्धा और अविश्वास को काफी बढ़ा दिया था, जिसकी गूंज वर्तमान नगर निगम चुनाव में भी सुनाई दे रही है।
कांग्रेस के सामने 17 वार्डों में सिंबल का बड़ा संकट
वर्तमान चुनाव में कांग्रेस पार्टी के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक और सांगठनिक चुनौती 17 वार्डों में पार्टी का अधिकृत बी-फॉर्म या सिंबल समय पर जमा न हो पाना बनी हुई है। प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, नगर निगम के कुल 70 वार्डों में से केवल 54 वार्डों में ही कांग्रेस के उम्मीदवार पार्टी के आधिकारिक चुनाव चिन्ह पर चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। शेष 17 वार्डों में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने को मजबूर हैं। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी सभी 70 वार्डों में अपने अधिकृत प्रत्याशियों और चुनाव चिन्ह के साथ पूर्ण संगठनात्मक तैयारी के साथ चुनावी मैदान में उतरी है।
नामांकन दाखिल करने के बाद अब सभी की निगाहें नामांकन वापसी की प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। निर्धारित चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 3 सितंबर को दोपहर बाद नामांकन वापस लेने की समय सीमा समाप्त हो जाएगी, जिसके बाद ही प्रत्येक वार्ड में चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थियों की अंतिम और स्पष्ट तस्वीर सामने आ पाएगी। वर्तमान स्थिति यह है कि कई वार्डों में 8 से 10 प्रत्याशी भाग्य आजमा रहे हैं। ऐसी स्थिति में दोनों दलों के रणनीतिकारों के सामने न केवल अपने घोषित प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, बल्कि चुनावी गणित बिगाड़ रहे निर्दलीयों और असंतुष्ट बागियों को मनाकर चुनाव मैदान से हटाने की भी भारी चुनौती बनी हुई है।
भाजपा का पुराना गढ़ और कांग्रेस की बदलाव की रणनीति
भीलवाड़ा शहर को पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी के एक मजबूत और सुरक्षित गढ़ के रूप में देखा जाता रहा है। लंबे समय से बने स्थानीय राजनीतिक समीकरण, मजबूत बूथ प्रबंधन और पार्टी का पुराना कैडर ढांचा भाजपा के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। हालांकि, कांग्रेस इस बार इसे आसान या एकतरफा मुकाबला मानने के मूड में नहीं है। कांग्रेस की रणनीति इस पुरानी अवधारणा को तोड़ने और अधिक से अधिक वार्डों में भाजपा को कड़ी टक्कर देकर जीत हासिल करने की है।
चूंकि नगर परिषद से क्रमोन्नत होकर नगर निगम बनने के बाद यह पहला बड़ा आम चुनाव है, इसलिए दोनों ही दल इसे महज वार्ड पार्षदों की सीटों तक सीमित मानकर नहीं चल रहे हैं। महापौर की कुर्सी तक कौन पहुंचेगा, यह काफी हद तक पूरे नगर निगम बोर्ड में मिलने वाले स्पष्ट बहुमत और चुनाव परिणामों के बाद पार्षदों के बीच बनने वाले नए राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा। 3 सितंबर को नाम वापसी का समय पूरा होने के साथ ही प्रचार अभियान अपनी पूरी तेजी पकड़ लेगा।



















