राजस्थान का कोटा शहर मुख्य रूप से देशभर में अपने शिक्षा जगत और कोचिंग संस्थानों के लिए विख्यात है। लेकिन इन दिनों यह शहर एक बिल्कुल अलग और सकारात्मक वजह से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। वर्तमान दौर में अक्सर छोटी-छोटी बातों को लेकर धार्मिक तनाव की खबरें चर्चा में रहती हैं। ऐसे माहौल में कोटा ने सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी खूबसूरत तस्वीर पेश की है, जो पूरे देश के लिए एक नज़ीर है। शहर के तुल्लापुरा इलाके में स्थित रेलवे कॉलोनी में एक ऐसा अनूठा धार्मिक स्थल मौजूद है, जहां दो अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ मिलकर इबादत करते हैं। इस परिसर में मनसापूर्ण महादेव का पवित्र मंदिर और पठान साहब की मजार एक-दूसरे के साथ सटी हुई हैं। इन दोनों ही जगहों के बीच सिर्फ एक दीवार का फासला है और यहां तक पहुंचने का रास्ता भी बिल्कुल एक ही है।
दशकों पुराना आस्था का अटूट केंद्र
बीते तकरीबन 40 सालों के लंबे समय से यह जगह हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के अनुयायियों के लिए गहरी आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र बनी हुई है। रोज़ाना सुबह से लेकर शाम ढलने तक इस परिसर में लगातार श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। हर दिन लगभग 200 से 300 लोग अपनी-अपनी मन्नतें और मुरादें लेकर इस द्वार पर पहुंचते हैं। यहां आने वाले भक्त बिना किसी मनमुटाव या विवाद के अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा प्रकट करते हैं। यह स्थान शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और आपसी भाईचारे का एक बेहतरीन गवाह बन चुका है, जहां आस्था के नाम पर कोई बंटवारा नहीं है।
स्थानीय लोगों ने साझा किया इतिहास
इस अनूठी और ऐतिहासिक जगह के निर्माण को लेकर स्थानीय नागरिक काफी पुरानी यादें साझा करते हैं। इसी इलाके में अपना पूरा बचपन बिताने वाले 68 वर्षीय रमेश चंद्र इस परिसर के इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी देते हैं। रमेश चंद्र का कहना है कि वे साल 1989 से लगातार इस परिसर में दर्शन के लिए आ रहे हैं और उन्होंने इस जगह को बदलते हुए देखा है। उनकी जानकारी के अनुसार, करीब साल 1985 के आसपास यहां एक बहुत ही छोटे से आकार के शिव मंदिर की स्थापना की गई थी। उस वक्त यह स्थान आज जितना विकसित नहीं था, लेकिन आस्था की जड़ें वहीं से मजबूत होना शुरू हो गई थीं。
नन्नू चाचा की शानदार पहल
मंदिर की स्थापना के कुछ समय बाद ही इस जगह पर मजार का निर्माण कार्य भी शुरू हो गया। उस दौर में इस इलाके के एक बेहद सम्मानित और जाने-माने स्थानीय निवासी नन्नू चाचा जीवित हुआ करते थे। नन्नू चाचा ने समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश देने के नेक इरादे से एक बेहद खास पहल की थी। उन्होंने मनसापूर्ण महादेव के ठीक पीछे की तरफ पठान साहब की मजार का निर्माण करवाया था। उनका वह प्रयास इतना सफल रहा कि आज इतने सालों बाद भी यह परिसर दोनों समुदायों को एक मज़बूत डोर से बांधने का काम कर रहा है।
बिना भेदभाव के इबादत की आज़ादी
इस पूरे धार्मिक परिसर की सबसे बड़ी और हैरान करने वाली खासियत यह है कि यहां किसी भी तरह का कोई एकाधिकार नहीं है। यहां न तो कोई पारंपरिक पुजारी या परमानेंट पंडित नियुक्त है और न ही मजार की देखभाल के लिए कोई मौलवी बैठाया गया है। यहां आम नागरिक से लेकर किसी भी खास व्यक्ति तक, हर किसी को इबादत करने का बिल्कुल समान अधिकार हासिल है। यहां के स्थानीय लोग गर्व के साथ कहते हैं, "यहां किसी पंडित या मौलवी का एकाधिकार नहीं है, बल्कि हर आदमी स्वतंत्र है।" इस जगह पर छुआछूत, भेदभाव या किसी भी तरह की हीन भावना के लिए कोई जगह नहीं है। हर श्रद्धालु अपनी पूरी आज़ादी और सुकून के साथ यहां आकर अपनी पूजा और इबादत संपन्न करता है।
व्यवस्था संभालने में भी बेहतरीन सहयोग
इतने बड़े और महत्वपूर्ण स्थान की व्यवस्था को संभालने का तरीका भी आपसी सहयोग की एक मिसाल पेश करता है। मजार की रोज़मर्रा की देखभाल और साफ-सफाई का पूरा ज़िम्मा आज भी नन्नू चाचा के परिवार वाले ही संभालते हैं। उनकी तीसरी पीढ़ी, यानी उनके पोते-पोतियां, पूरी शिद्दत और लगन के साथ इस मजार की सेवा में जुटे हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ, महादेव मंदिर के कामकाज, मैनेजमेंट और इसके आगे के विकास कार्यों को देखने के लिए एक स्थानीय कार्यकारिणी समिति का गठन किया गया है। यह समिति आपसी बातचीत और पूरे सहयोग के साथ मंदिर से जुड़े सारे काम देखती है।
त्यौहारों पर नज़र आता है अद्भुत नज़ारा
त्यौहारों के खास मौकों पर तो इस पूरे परिसर की छटा देखते ही बनती है। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के पर्वों पर यहां एक अनोखी रौनक देखने को मिलती है। हर सप्ताह मंगलवार और शनिवार के दिन हिंदू धर्म के सैकड़ों लोग यहां बड़ी तादाद में एकत्रित होते हैं। वे सब मिलकर सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। इसके अलावा, सावन के पवित्र महीने में इस जगह का नज़ारा और भी ज़्यादा अद्भुत हो जाता है। सावन के दौरान महादेव के दर्शन करने और उनका जलाभिषेक करने के लिए श्रद्धालुओं की इतनी भारी भीड़ उमड़ पड़ती है कि कई बार लोगों को अपनी बारी आने का बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ता है। हालांकि, इतनी बड़ी भीड़ होने के बावजूद सभी कार्यक्रम बेहद अनुशासित और शांतिपूर्ण तरीके से पूरे होते हैं।
मुस्लिम पर्वों पर भी रहती है पूरी आज़ादी
इसी तरह, मुस्लिम समुदाय के त्यौहारों पर भी मजार का नज़ारा काफी खास होता है। जब भी कोई मुस्लिम पर्व आता है या पठान साहब का उर्स मनाया जाता है, तो समुदाय के लोग पूरे उत्साह के साथ यहां जुटते हैं। वे पूरी आज़ादी और बिना किसी भी तरह की रोक-टोक के मजार पर लोबान और धुनी जलाकर अपनी अकीदत पेश करते हैं। इस दौरान दूसरे पक्ष की तरफ से कभी कोई हस्तक्षेप या ऐतराज़ नहीं जताया जाता। दोनों ही धर्मों के लोग एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का पूरा सम्मान करते हैं।
अनेकता में एकता की शानदार मिसाल
कोटा शहर के निवासियों का यह पक्का दावा है कि पूरे शहर में यह अपनी तरह का इकलौता और सबसे अनोखा स्थान है। यह सिर्फ इसलिए खास नहीं है कि मंदिर और मजार का रास्ता एक ही है, बल्कि दोनों धार्मिक ढांचे बिल्कुल एक-दूसरे से सटे हुए खड़े हैं। 40 सालों का एक बहुत बड़ा समय बीत जाने के बाद भी यहां कभी भी दोनों पक्षों के बीच किसी भी बात को लेकर कोई दखलंदाज़ी या मनमुटाव देखने को नहीं मिला है। यह पवित्र स्थान भारत की मशहूर साझा संस्कृति और अनेकता में एकता का एक जीता-जागता और खूबसूरत उदाहरण है। वर्तमान समय में ऐसे प्रतीकों को सहेजने और इनकी कहानी को दुनिया भर के सामने लाने की बहुत बड़ी आवश्यकता है।




















