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उदयपुर के शंभू निवास में गूंजे वैदिक मंत्र, मेवाड़ राजघराने ने शारदीय नवमी पर की तीन खास अश्वों की पूजाराजस्थान
20 अक्तू॰ 2026, 6:31 am (1 घंटे पहले)· 0

उदयपुर के शंभू निवास में गूंजे वैदिक मंत्र, मेवाड़ राजघराने ने शारदीय नवमी पर की तीन खास अश्वों की पूजा

शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर उदयपुर में मेवाड़ राजपरिवार ने सदियों पुरानी सूर्यवंशी परंपरा निभाते हुए राजसी ठाठ-बाट के साथ अश्व पूजन अनुष्ठान पूरा किया।

राजस्थान की ऐतिहासिक धरा उदयपुर में शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर सदियों पुरानी राजसी परंपराएं आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही हैं। रियासतकालीन गौरव और शौर्य के प्रतीक मेवाड़ राजपरिवार ने महानवमी के मौके पर सूर्यवंशी मर्यादाओं का पालन करते हुए पारंपरिक अश्व पूजन संपन्न किया। राजमहल के शंभू निवास प्रांगण में आयोजित इस भव्य अनुष्ठान में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अश्वों की पूजा की गई। इस पावन अवसर पर महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने विधि-विधान से पूजा की बागडोर संभालते हुए पूर्वजों से चली आ रही इस विशिष्ट संस्कृति को आगे बढ़ाया।

वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधियों से हुआ अनुष्ठान

अश्व पूजन के इस पावन आयोजन के लिए विशेष रूप से सजाए गए तीन चुनिंदा अश्वों को प्रांगण में लाया गया। इन अश्वों के नाम 'राजस्वरूप', 'राजमुकुट' और 'नागराज' हैं। राजसी परिधानों और आभूषणों से सज्जित होकर पहुंचे इन अश्वों का स्वागत वैदिक ऋचाओं के सस्वर पाठ के साथ किया गया। महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने शास्त्रों में वर्णित विधि के अनुसार एक-एक करके तीनों अश्वों के मस्तक पर कुंकुम का तिलक लगाया और अक्षत अर्पित किए। इसके उपरांत सुगंधित पुष्पमालाएं पहनाकर उनका वंदन किया गया।

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पूजा के अगले चरण में राजपरिवार के सदस्यों ने अश्वों की आरती उतारकर परिवार, राज्य और समाज की सुख-शांति व सुरक्षा की मंगलकामना की। पूजन संपन्न होने के बाद अश्वों को विशेष रूप से तैयार किया गया पौष्टिक आहार कराया गया और उन्हें नवीन वस्त्रादि भेंट किए गए। अनुष्ठान की संपूर्णता के प्रतीक स्वरूप अश्वों को नवरात्रि में बोई गई हरी ज्वारें धारण करवाई गईं। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उपस्थित लोगों को मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सनातन परंपरा के अनूठे संगम का जीवंत अनुभव हुआ।

शौर्य, स्वामिभक्ति और युद्ध कौशल का प्रतीक

मेवाड़ की ऐतिहासिक गाथाओं में अश्वों का स्थान केवल सामान्य सवारी या साधन तक सीमित कभी नहीं रहा। यहां के क्षत्रिय इतिहास में घोड़े को पराक्रम, रणकौशल और अटूट स्वामिभक्ति का सजीव स्वरूप माना गया है। हल्दीघाटी के ऐतिहासिक समर में महाराणा प्रताप और उनके निष्ठावान अश्व चेतक की वीरता की कहानियां आज भी जन-जन की जुबान पर हैं। मेवाड़ के वीर योद्धाओं ने हर संकट में अपने अश्वों को युद्ध का अभिन्न साथी माना है।

इसीलिए शारदीय नवरात्रि की नवमी पर की जाने वाली यह पूजा केवल एक धार्मिक औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि यह उन मूक योद्धाओं के प्रति राजपरिवार की कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है जिन्होंने युद्धक्षेत्रों में अपने स्वामियों के प्राणों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह परंपरा आज की नई पीढ़ी को भी अपनी वीरगाथाओं और ऐतिहासिक जड़ों से जोड़े रखने का काम करती है।

राजसी आभूषणों से अलंकृत हुए मारवाड़ी अश्व

शंभू निवास प्रांगण में आयोजित इस उत्सव का मुख्य आकर्षण अश्वों का मनोहारी और वैभवशाली शृंगार रहा। पूजा के लिए लाए गए अश्वों को पारंपरिक राजस्थानी कलात्मकता के अनुरूप सजाया गया था। उनके गलों में विशेष कंठी पहनाई गई थी और कानों तथा माथे के पास चांदी के बारीक काम वाले छोगे झूल रहे थे। इसके अलावा उनके चेहरों को पारंपरिक मुखभूषणों और कलात्मक लगाम से सुशोभित किया गया था, जबकि उनके पार्श्व में चंवर डुलाए जा रहे थे।

जब यह अनुष्ठान चल रहा था, तब प्रांगण में नगाड़ों की गूंज और शहनाई की मंगल ध्वनियों ने समूचे वातावरण को एक अलौकिक और राजसी रूप दे दिया। वाद्य यंत्रों की थाप और वैदिक मंत्रों की सम्मिलित ध्वनि ने वहां उपस्थित हर व्यक्ति को राजपूताना के स्वर्णिम युग की याद दिला दी। इस दौरान प्रत्येक अश्व की चाल-ढाल और भव्यता देखते ही बन रही थी।

17वीं शताब्दी के ऐतिहासिक अस्तबल में संरक्षण

मेवाड़ राजघराने का यह अनुष्ठान मात्र एक दिवसीय आयोजन नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक धरोहर और दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण का एक गहरा संकल्प भी जुड़ा हुआ है। सिटी पैलेस परिसर में स्थित सत्रहवीं सदी के ऐतिहासिक अस्तबल में आज भी मारवाड़ी नस्ल के उच्च कोटि के घोड़ों का विधिवत संवर्धन और संरक्षण किया जा रहा है।

मारवाड़ी नस्ल के अश्व अपनी गठीली शारीरिक बनावट, सहनशीलता, तेज गति और अंदर की ओर विशेष रूप से मुड़े हुए कानों के लिए पूरी दुनिया में विख्यात हैं। राजपरिवार ने सदियों से इस अनूठी नस्ल की शुद्धता को बनाए रखने का जिम्मा उठाया है। सदियों पुराने अस्तबलों में आज भी इन अश्वों की देखरेख ठीक उसी राजसी विधि से की जाती है जैसे रियासतकाल में की जाती थी। यह निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि उदयपुर का राजपरिवार आधुनिकता के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान, जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान और पुरातात्विक परंपराओं को कितनी निष्ठा से संजोए हुए है।

सवाल-जवाब

मेवाड़ राजपरिवार में अश्व पूजन का आयोजन कब और कहां किया गया?
यह अनुष्ठान शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि पर उदयपुर स्थित राजमहल के शंभू निवास प्रांगण में संपन्न हुआ।
इस वर्ष अश्व पूजन का धार्मिक अनुष्ठान किसने संपन्न कराया?
सूर्यवंशी परंपरा का पालन करते हुए महाराज कुमार हरितराज सिंह मेवाड़ ने विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा संपन्न की।
पूजा के लिए किन तीन विशेष अश्वों को लाया गया था?
इस अवसर पर 'राजस्वरूप', 'राजमुकुट' और 'नागराज' नाम के तीन राजसी अश्वों को पूजन के लिए सजाकर लाया गया था।
अश्वों का राजसी शृंगार किन आभूषणों से किया गया था?
अश्वों को कंठी, चांदी के छोगों, पारंपरिक मुखभूषण, कलात्मक लगाम और चंवर से सुसज्जित किया गया था।
मेवाड़ राजघराने के ऐतिहासिक अस्तबल में किस नस्ल के घोड़ों का संरक्षण होता है?
सिटी पैलेस परिसर के 17वीं सदी के अस्तबल में मुड़े हुए कानों वाली दुर्लभ मारवाड़ी नस्ल के अश्वों का संरक्षण किया जाता है।
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टिप्पणियाँ 5

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·11 मिनट पहले

मेवाड़ की इस पुरानी परंपरा को आज भी ऐसे निभाते देखना वाकई बहुत अच्छा लगा।

Ravikash Gupta@ravikash·30 मिनट पहले

मेवाड़ की परंपराओं में आज भी इतिहास और आधुनिकता का ऐसा मेल दिखता है, जो शायद ही कहीं और मिले। चेतक की वफादारी की कहानियों के बीच घोड़ों की ऐसी देखरेख देखकर सुकून मिला।

Arjun Mehta@arjun-mehta·29 मिनट पहले

रविकेश जी, बात तो आपकी ठीक है पर क्या ये तीनों घोड़े केवल इसी एक दिन के लिए तैयार होते हैं या साल भर इनकी ऐसी ही शाही खातिरदारी होती है?

Karan Malhotra@karan-malhotra·52 मिनट पहले

इतिहास और परंपराओं को सहेजकर रखना अच्छी बात है, लेकिन कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच ऐसे आयोजनों में भीड़ प्रबंधन पर भी पूरा ध्यान रहना चाहिए।

Rohan Verma@rohan-verma·52 मिनट पहले

करण भाई, भीड़ की बात सही है, पर राजघरानों के ऐसे निजी कार्यक्रमों में आम तौर पर चुनिंदा लोग ही होते हैं, इसलिए वहां कानून-व्यवस्था का कोई बड़ा संकट नहीं होना चाहिए।

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