सिनेमा जगत में अपने सहज अभिनय और बिंदास मिजाज के लिए पहचानी जाने वाली अदाकारा मौसमी चटर्जी ने पारिवारिक जीवन, आधुनिक रिश्तों और महिलाओं की आत्मनिर्भरता पर अपने प्रगतिशील विचार साझा किए हैं। दशकों तक बड़े पर्दे पर विविध भूमिकाएं निभाने वाली इस अनुभवी कलाकार का मानना है कि बदलती दुनिया के साथ समाज और खासकर महिलाओं की सोच का बदलना बेहद जरूरी है। पत्रकार नयनदीप रक्षित के साथ एक विस्तृत परिचर्चा में उन्होंने अपने निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, मातृत्व की जिम्मेदारियों और युवा पीढ़ी के सामने मौजूद मानसिक तनाव पर खुलकर अपनी राय रखी। उनका यह नजरिया आज के सामाजिक ढांचे में नए सिरे से संतुलन तलाशने की दिशा में एक अहम विमर्श खड़ा करता है।
महिलाओं को खुद की प्राथमिकताओं को आगे रखना होगा
कार्यक्रम के दौरान मौसमी चटर्जी ने इस बात पर जोर दिया कि वह अपने विचारों में पूरी तरह आधुनिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण रखती हैं। उन्होंने आज की युवतियों और कामकाजी महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में अपनी भलाई और मानसिक शांति को आगे रखना कोई गलत बात नहीं है। उन्होंने कहा कि आज के समय में थोड़ा सावधान रहिए और थोड़ा सा स्वार्थी तथा आत्मकेंद्रित बनिए क्योंकि वक्त बदल चुका है। अपने इस विचार के समर्थन में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक संदेश का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि परिवर्तन ही संसार का शाश्वत नियम है।
पितृसत्तात्मक सोच पर तीखा प्रहार करते हुए उन्होंने समाज में लड़कों और लड़कियों के पालन-पोषण में किए जाने वाले दोहरे मानदंडों पर गंभीर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि भारतीय परिवारों में बेटियों को तो बचपन से ही घर की देखभाल, चूल्हा-चौका और ससुराल में सामंजस्य बैठाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, लेकिन उसी घर के बेटों को घरेलू कामकाज में हाथ बंटाना कभी नहीं सिखाया जाता। यह सामाजिक धारणा बन चुकी है कि घर के सारे काम केवल महिलाओं के हिस्से ही आते हैं। इसके अलावा उन्होंने आज के कामकाजी युवाओं की जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अत्यधिक भागदौड़ और मानसिक दबाव के कारण नई पीढ़ी अपने जीवन के खूबसूरत पलों को महसूस करने का मौका गंवा रही है और उनके पास अपने लिए बिल्कुल समय नहीं बचता।
कम उम्र का विवाह और व्यक्तिगत गलतियों से लिया गया सबक
मौसमी चटर्जी का अपना व्यक्तिगत सफर भी संघर्षों और आकस्मिक मोड़ों से भरा रहा है। फिल्म 'बालिका वधू' से अप्रत्याशित सफलता और लोकप्रियता पाने वाली इस अदाकारा का विवाह बहुत ही कच्ची उम्र में कर दिया गया था। जब वह अपने करियर की शुरुआत कर रही थीं, तभी लगभग 12 से 15 साल की आयु में उनके परिजनों ने उनका विवाह प्रख्यात संगीतकार और गायक हेमंत कुमार के बेटे जयंत मुखर्जी के साथ तय कर दिया था। अदाकारा ने कभी इस बात को छुपाया नहीं कि पारिवारिक जीवन, वैवाहिक दायित्व और मातृत्व उनके जीवन में उस समय आ गए थे जब वह खुद एक बच्ची थीं।
अपने इन्हीं व्यक्तिगत अनुभवों की रोशनी में उन्होंने युवाओं को जीवन जीने का व्यावहारिक फलसफा समझाया। 70 साल की आयु का पड़ाव पार कर चुकीं अभिनेत्री ने कहा कि वही काम करना चाहिए जो अंतरात्मा को पसंद हो, लेकिन किसी भी स्थिति में किसी चीज की अति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि हर इंसान की तरह उन्होंने भी अपने जीवन में कई गलतियां की हैं, परंतु एक बार अपनी भूल का अहसास होने के बाद उन्होंने कभी उसे दोबारा नहीं दोहराया। उनका मानना है कि इंसान के भीतर उसका जमीर होता है और इंसान को निरंतर आत्ममंथन करते रहना चाहिए।
इसी खुलेपन के साथ उन्होंने अपनी छोटी बेटी मेघा मुखर्जी के साथ अपने संवाद के बारे में बताते हुए कहा कि आधुनिक रिश्तों को सामाजिक बाध्यता का शिकार नहीं होना चाहिए। उन्होंने अपनी बेटी को स्पष्ट हिदायत दी है कि जीवन में साथी चुनना एक निजी फैसला है, पर यदि आपका कोई साथी या बॉयफ्रेंड है तो इसका यह कतई अर्थ नहीं निकलता कि आपको अनिवार्य रूप से उसी व्यक्ति से विवाह भी करना पड़े। विवाह का निर्णय पूरी परिपक्वता और स्वतंत्र इच्छा से ही लिया जाना चाहिए।
बड़ी संतान के असमय चले जाने का कभी न भरने वाला दर्द
चर्चा के दौरान जब परिवार और संतानों का प्रसंग आया, तो अभिनेत्री काफी भावुक नजर आईं। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी पायल के असामयिक निधन की गहरी टीस को साझा किया। लंबे समय से चल रही गंभीर बीमारी और मधुमेह की जटिलताओं के चलते वर्ष 2019 में पायल का देहांत हो गया था। इस अप्रत्याशित घटना ने उनके पूरे परिवार को एक गहरे अवसाद और शून्य में धकेल दिया था।
पारिवारिक संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी दोनों बेटियों, पायल और मेघा के बीच लगभग 8 वर्ष की उम्र का अंतर था। इस आयु अंतर के कारण पायल अपनी छोटी बहन मेघा को एक मां की तरह दुलारती थीं और उसका ध्यान रखती थीं। मौसमी चटर्जी ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि इस अपूरणीय क्षति से उनका परिवार आज भी पूरी तरह उबर नहीं पाया है। उनके पति जयंत आज भी अक्सर आधी रात को अचानक उठ बैठते हैं और सिसकते हुए पायल का नाम पुकारने लगते हैं। किसी माता-पिता के लिए अपनी संतान को खो देने से बड़ा कोई आघात नहीं होता और यह ऐसा गहरा घाव है जिसे कोई समय पूरी तरह नहीं भर सकता।



















