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अलीगढ़ में मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने मृत व्यक्ति के नाम पर भोजन कराने को लेकर की बातधर्म
27 सित॰ 2026, 12:38 am (34 मिनट पहले)· 0

अलीगढ़ में मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने मृत व्यक्ति के नाम पर भोजन कराने को लेकर की बात

अलीगढ़ में उत्तर प्रदेश के मुख्य मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने मरे हुए व्यक्ति के नाम पर खाना खिलाने को लेकर इस्लामी नजरिया स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया कि सही नीयत से गरीबों को भोजन कराना जायज है, लेकिन दिखावे और तय तिथियों की रस्में गलत हैं।

अलीगढ़ में मौत के बाद किसी व्यक्ति के नाम पर भोजन कराने की प्रथा को लेकर समाज में विभिन्न प्रकार की मान्यताएं और परंपराएं देखने को मिलती हैं। कुछ जगहों पर इसे पुण्य कमाने का माध्यम माना जाता है तो अन्य स्थानों पर यह धार्मिक अनुष्ठान का रूप ले चुका है। इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने इस्लामी दृष्टिकोण से इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है और इससे जुड़े सभी पहलुओं की जानकारी दी है।

क्या मृतक के नाम पर भोजन कराना जायज है

इस बारे में जानकारी साझा करते हुए मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने बताया कि इस्लाम धर्म में इंसान की नीयत यानी उसका इरादा और अकीदा यानी विश्वास अत्यधिक महत्व रखता है। यदि किसी दिवंगत व्यक्ति की आत्मा की शांति और उसकी ओर से पुण्य प्राप्त करने के उद्देश्य से भोजन का वितरण किया जाता है, और इसके पीछे केवल ईश्वर की प्रसन्नता हासिल करने की भावना होती है, तो ऐसा करना पूरी तरह से जायज माना गया है।

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मौलाना ने आगे स्पष्ट किया कि इस प्रकार तैयार किया जाने वाला भोजन परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, परिचितों के साथ-साथ समाज के जरूरतमंद लोगों, गरीबों, अनाथों और बेसहारा व्यक्तियों को कराया जा सकता है। इस्लामिक परंपराओं में अन्नदान या भोजन कराने को बहुत बड़ा पुण्य बताया गया है, बशर्ते इसके पीछे का उद्देश्य पूरी तरह से पवित्र हो और केवल ईश्वर की रजा तथा दिवंगत आत्मा को सवाब पहुँचाने की मंशा शामिल हो।

दिखावे और तय तिथियों की रस्मों का विरोध

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि इस तरह के आयोजन के पीछे का उद्देश्य समाज में केवल दिखावा करना है या फिर इसे किसी विशेष प्रकार की परंपरा बना दिया गया है, तो यह तरीका पूरी तरह से गलत है। उदाहरण के तौर पर किसी निधन के बाद बीसवें, तीसवें, चालीसवें दिन या फिर किसी अन्य निर्धारित तिथि पर धार्मिक कार्यक्रम के रूप में आयोजन करना उचित नहीं माना गया है।

इस्लाम में इस तरह की बनावटी रस्मों और परंपराओं के लिए कोई स्थान नहीं है। मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने लगातार चालीस दिनों तक मृतक के घर भोजन भेजने की प्रथा को भी सिरे से खारिज किया और बताया कि इस्लामी ग्रंथों के अनुसार ऐसा करना जायज नहीं है।

कבר पर भोजन रखने से जुड़ी मान्यताएं

इसी तरह से कब्र पर जाकर भोजन रखना या फिर यह सोचना कि मरे हुए इंसान खुद आकर उस भोजन को ग्रहण करते हैं, पूरी तरह से इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत है। इस प्रकार के सभी कार्य वर्जित और गैर-कानूनी माने गए हैं। उन्होंने अंत में यही संदेश दिया कि सही मार्ग वही है जिसमें व्यक्ति की नीयत साफ हो, उसका विश्वास अडिग हो और हर कार्य केवल ईश्वर की रजा प्राप्त करने के लिए ही किया जाए।

सवाल-जवाब

मृतक के नाम पर खाना खिलाना किस स्थिति में जायज है?
यदि नीयत अल्लाह की रज़ा हासिल करने और उसका सवाब मरहूम को पहुँचाने की हो, तो खाना खिलाना जायज है।
यह खाना किसे खिलाया जा सकता है?
यह खाना रिश्तेदारों, परिचितों, समाज के जरूरतमंदों, गरीबों, यतीमों और मिसकीनों को खिलाया जा सकता है।
क्या 20वें, 30वें या 40वें दिन का धार्मिक कार्यक्रम सही है?
नहीं, इस्लाम में ऐसी रस्मों और तय तारीखों पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने की कोई हैसियत नहीं है।
क्या कब्र पर खाना रखना या मरे हुए लोगों के खाने की मान्यता सही है?
कبر पर खाना देना या यह मानना कि मरहूम खुद खाना खाते हैं, इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ और नाजायज है।
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टिप्पणियाँ 3

Meera Joshi@meera-joshi·अभी

दादी के जाने के बाद हमारे यहाँ भी ऐसा ही विवाद हुआ था। मौलाना साहब ने बिल्कुल ठीक कहा है कि मदद दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सच्ची नीयत से होनी चाहिए।

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 मिनट पहले

चालीसवें दिन या तय तारीखों पर होने वाले दिखावे पर मुफ्ती साहब ने बिल्कुल सही बात कही है।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·19 मिनट पहले

करण, बात तो बिल्कुल सही है। पर क्या आम लोग सच में इन तय तारीखों वाली रस्मों को छोड़ पाएंगे?

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