सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए विशेष तीर्थों का विधान बताया गया है। मध्य भारत की जीवनरेखा मानी जाने वाली पुण्यसलिला नर्मदा का उद्गम धाम अमरकंटक इसी कड़ी में सर्वोपरि आध्यात्मिक केंद्र के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस पावन धरा पर प्रवाहित होने वाले जल से किया गया तर्पण साधारण अनुष्ठान न होकर अनंत काल तक फल देने वाला अनुष्ठान बन जाता है। इस स्थान की पावनता केवल किसी एक युग तक सीमित नहीं है, बल्कि सृष्टि के प्रारंभ से ही इसे पितरों की तृप्ति और आत्मिक शुद्धि का परम स्थल स्वीकार किया गया है।
पितरों की मानसी कन्या के रूप में नर्मदा का अनुपम स्वरूप
वायु पुराण की संहिताओं में इस बात का स्पष्ट प्रतिपादन मिलता है कि पापनाशिनी नर्मदा साक्षात पितरों की मानसी कन्या हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी वंशावली के दिवंगत पूर्वजों के निमित्त उनकी ही पुत्री के पावन प्रवाह में जल, काले तिल और कुश अर्पित करता है, तो वह तर्पण कभी निष्फल नहीं होता। धार्मिक मान्यताओं में इसे अक्षय तर्पण की संज्ञा दी गई है, जिसका तात्पर्य यह है कि इस विधि से दी गई तिलांजलि पितरों को कभी न समाप्त होने वाली तृप्ति प्रदान करती है। यही कारण है कि पितृपक्ष की पावन तिथियों पर देश भर से श्रद्धालु देव कार्यों और पितृ कार्यों की सिद्धि के लिए अमरकंटक पहुंचते हैं।
आरंडी संगम और पिंडदान का सनातन महात्म्य
अमरकंटक स्थित विभिन्न घाटों के अलावा विशेष रूप से आरंडी संगम पर श्राद्ध विधि संपन्न करने को शास्त्रों में सर्वोत्तम माना गया है। वायु पुराण में इस पवित्र भूभाग पर पिंडदान का उल्लेख सबसे प्राचीन और प्रमाणिक संदर्भ के तौर पर मिलता है। विधान के अनुसार जब कोई साधक पूरी श्रद्धा के साथ पितरों का स्मरण कर उन्हें पिंड और जल अर्पित करता है, तो इससे कुंडली में उपस्थित गंभीर पितृदोष भी शांत हो जाते हैं। ऐसा अनुष्ठान करने वाले परिवार में न केवल सुख, शांति और वंश वृद्धि होती है, बल्कि साधक सांसारिक जीवन में तीनों प्रकार के ऋणों में सबसे कठिन माने जाने वाले पितृ ऋण से भी सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
शास्त्रों में वर्णित दर्शन मात्र से मोक्ष का अलौकिक प्रभाव
अन्य पवित्र नदियों की तुलना में इस धारा की आध्यात्मिक शक्ति को शास्त्रों में बेहद विलक्षण माना गया है। स्कंद पुराण के अंतर्गत रेवा खंड में नदियों के स्नान फल का विशद विवेचन किया गया है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि सरस्वती के जल में तीन दिन डुबकी लगाने से, यमुना के जल में पूरे सात दिन स्नान करने से और भागीरथी गंगा के स्पर्श मात्र या तत्काल स्नान से शरीर पवित्र होता है। इसके विपरीत, इस पावन जलधारा के प्रति यह मान्यता प्रतिष्ठित है कि इसके शुद्ध दर्शन भर से मनुष्य के कई जन्मों के संचित पाप जलकर भस्म हो जाते हैं।
भगवान शिव की मानस पुत्री और कंकड़ में शंकर का वरदान
आध्यात्मिक गाथाओं में इस नदी को देवाधिदेव महादेव की मानस पुत्री भी कहा गया है। विंध्य और सतपुड़ा के मध्य स्थित मैकाल पर्वत से प्रकट होने की वजह से लोकमानस इन्हें मैकलसुता के नाम से भी पुकारता है। पथरीली चट्टानों से टकराते हुए बहने पर जो मधुर कलकल ध्वनि गूंजती है, उसी से इनका प्रसिद्ध नाम रेवा पड़ा। महादेव ने अपनी इस पुत्री को वरदान दिया था कि महाप्रलय की घड़ी में भी इस धारा का अस्तित्व समाप्त नहीं होगा, जिससे इन्हें 'प्रलयेषु न मृता सा नर्मदा' कहा जाता है। शिव के इसी वरदान का प्रताप है कि इस धारा से निकला प्रत्येक पत्थर बिना किसी वैदिक प्राण-प्रतिष्ठा के स्वयं नर्मदेश्वर शिवलिंग बन जाता है। इसी से यह कहावत अमर हो गई कि इस जल का हर कंकर साक्षात शंकर का स्वरूप है। भारत में किसी अन्य जलधारा पर स्वतंत्र पुराण की रचना नहीं हुई, किंतु इस नदी की महिमा का गुणगान करने के लिए नर्मदा पुराण की अलग से रचना की गई।
अनोखी परिक्रमा और विपरीत दिशा में बहने का प्राकृतिक चमत्कार
भूगोल और भूगर्भ शास्त्र के नजरिए से देखें तो यह नदी भारतीय उपमहाद्वीप की अधिकांश नदियों से बिल्कुल अलग आचरण करती है। जहां बाकी नदियां पश्चिम से पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, वहीं यह एक रिफ्ट वैली यानी भ्रंश घाटी से गुजरते हुए पूर्व से पश्चिम की ओर विपरीत दिशा में बहती है और अरब सागर की खंभात की खाड़ी में समाहित होती है। दुनिया भर में यह अकेली ऐसी जलधारा है जिसकी दोनों तटों से संपूर्ण पैदल परिक्रमा की जाती है। साधु-संतों और गृहस्थों की प्राचीन परिपाटी के मुताबिक, तीन वर्ष, तीन महीने और तेरह दिनों में नंगे पांव चलकर इस विशाल परिक्रमा को पूरा किया जाता है, जो साधक के अंतर्मन से अहंकार को पूरी तरह मिटा देती है।
नागपुर और रीवा रियासत द्वारा निर्मित मंदिर और कलचुरी वास्तुकला
अमरकंटक में जहां से यह अविरल धारा निकलती है, वहां वर्तमान में एक अत्यंत भव्य श्वेत नर्मदा उद्गम कुंड सुशोभित है। इस कुंड और इसके इर्द-गिर्द खड़े लगभग चौबीस देवालयों के संकुल को नागपुर के भोंसले राजाओं तथा रीवा के महाराजा गुलाब सिंह ने तैयार कराया था। इसी उद्गम स्थल के समीप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की देखरेख में सुरक्षित ग्यारहवीं सदी के कलचुरी कालीन मंदिरों का एक भव्य समूह भी मौजूद है। इन उत्कृष्ट पाषाण मंदिरों को कलचुरी वंश के राजा कर्णदेव ने बनवाया था। यहां स्थापित पातालेश्वर महादेव मंदिर, मछेंद्रनाथ मंदिर और तीन मुखों वाला भव्य कर्ण मंदिर उस युग की बेमिसाल स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व और औषधीय संपदा
आध्यात्मिक गरिमा के साथ-साथ यह पावन क्षेत्र प्राकृतिक विविधता के मामले में भी अनुपम है। यह पूरा इलाका अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व का प्रमुख भाग है, जिसे वर्ष 2012 में यूनेस्को के प्रसिद्ध 'मैन एंड द बायोस्फीयर' कार्यक्रम की वैश्विक सूची में सम्मिलित किया गया था। यहां के सघन वनों में कई दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियां मिलती हैं। इनमें विशेष रूप से गुलबकावली और काली हल्दी जैसे अत्यंत दुर्लभ वनस्पतियां प्रचुरता में पाई जाती हैं, जिनका प्रयोग प्राचीन काल से ही जटिल और असाध्य व्याधियों के उपचार में किया जाता रहा है।



















