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राधा कुंड में पूर्वजों के मोक्ष की सदियों पुरानी परंपरा, जानिए गोवर्धन से क्यों जुड़ा है मणिपुर का अटूट रिश्ताधर्म
25 सित॰ 2026, 12:39 pm (1 घंटे पहले)· 0

राधा कुंड में पूर्वजों के मोक्ष की सदियों पुरानी परंपरा, जानिए गोवर्धन से क्यों जुड़ा है मणिपुर का अटूट रिश्ता

मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालु सदियों से गोवर्धन स्थित राधा कुंड और शिव कुंड में पिंडदान, तर्पण और अस्थि विसर्जन करने पहुंचते हैं। 18वीं शताब्दी के राजा भाग्यचंद्र के समय से चली आ रही यह अनूठी परंपरा पूर्वजों की मुक्ति का प्रमुख माध्यम मानी जाती है।

ब्रज क्षेत्र और भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के बीच का गहरा आध्यात्मिक संबंध सदियों से अक्षुण्ण बना हुआ है। सामान्य तौर पर देश भर में पितरों की मुक्ति के लिए बिहार के गयाजी जाने की परंपरा है, परंतु मणिपुर के वैष्णव समाज के लिए उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित गोवर्धन धाम ही पूर्वजों की आत्मिक शांति का सबसे बड़ा केंद्र है। गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित राधा कुंड और शिव कुंड सदियों से मणिपुरी श्रद्धालुओं के लिए केवल पूजनीय तीर्थ ही नहीं, बल्कि अंतिम संस्कारों और श्राद्ध कर्म की पावन भूमि रहे हैं। इस वर्ष पितृपक्ष की तिथियां 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या तक चलेंगी, जिसके चलते इस पवित्र क्षेत्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की धार्मिक मान्यताएं फिर चर्चा में हैं।

मणिपुरी परंपरा में राधा कुंड को प्राप्त है गयाजी जैसा दर्जा

मणिपुर के वैष्णव समुदाय में अश्विन मास के दौरान पड़ने वाले पितृपक्ष अथवा वर्ष के अन्य शुभ दिनों में पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु पिंडदान और जल अर्पण का विशेष विधान माना जाता है। मणिपुरी बोली में इस तर्पण अनुष्ठान को स्थानीय रूप से ‘तर्पों’ कहकर पुकारा जाता है। पूर्वोत्तर के इस राज्य के भक्त राधा कुंड को ठीक उसी तरह परम पावन धाम स्वीकार करते हैं जैसे अन्य हिंदू परंपराओं में गयाजी को माना जाता है। वहां के लोगों का ऐसा दृढ़ विश्वास है कि राधा कुंड के पवित्र जल में श्रद्धापूर्वक तर्पण, पूजन और ध्यान करने से मृत पूर्वजों को भगवान श्री राधा और कृष्ण के चरण कमलों में नित्य वास प्राप्त होता है। इसी कारण राधा कुंड क्षेत्र में स्थित श्राद्ध कुंड के गया घाट पर जाकर विधिपूर्वक पितृ शांति के कर्मकांड संपन्न किए जाते हैं।

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शिव कुंड पर अस्थि विसर्जन और पीपल तले दफनाने की अनूठी रीति

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर सिद्धेश्वर स्वरूप में विराजित भगवान शिव का पवित्र धाम शिव कुंड भी मणिपुरी श्रद्धालुओं के लिए अत्यधिक पूजनीय है। वैष्णव धर्मग्रंथों में महादेव को वैष्णवों का परम गुरु अथवा पथप्रदर्शक निरूपित किया गया है। इसी आस्था के आधार पर जब मणिपुर में किसी परिवार के सदस्य का देहावसान होता है, तो उनकी अस्थियों का एक हिस्सा गंगा नदी में प्रवाहित किया जाता है, जबकि शेष पवित्र अंश को ब्रज में लाकर शिव कुंड, मानसी गंगा अथवा राधा कुंड के आसपास के जल स्रोतों में समर्पित किया जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि महादेव की कृपा से आत्मा को जन्म और मृत्यु के सांसारिक बंधनों से सदा के लिए छुटकारा मिल जाता है।

स्थानीय निवासी दीपू जोशी बताते हैं कि मणिपुर से आने वाले भक्त अपने पूर्वजों के अवशेषों को यहां लाकर राधा रानी के चरणों में अर्पित करते हैं। दीपू जोशी के अनुसार, श्रद्धालु ढोल और नगाड़ों की पारंपरिक ध्वनि के बीच पीपल के वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर अस्थियों को सुरक्षित रूप से गाड़ देते हैं और पेड़ पर पवित्र वस्त्र बांधकर प्रस्थान करते हैं। यह क्रिया पीढ़ियों से निरंतर बिना रुके इसी स्वरूप में निभाई जाती रही है।

18वीं सदी के राजा भाग्यचंद्र से जुड़ा है यह ऐतिहासिक गठबंधन

मणिपुर और ब्रज धाम के इस गहरे सांस्कृतिक जुड़ाव की ऐतिहासिक जड़ें 18वीं शताब्दी में स्थापित हुई थीं। मणिपुर के तत्कालीन शासक महाराज भाग्यचंद्र, जिन्हें जय सिंह नाम से भी जाना जाता है, ने गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की दीक्षा ली थी। उनके वैष्णव धर्म अपनाने के उपरांत पूरे राज्य में कृष्ण भक्ति का व्यापक प्रसार हुआ और ब्रजभूमि के साथ एक अटूट सेतु निर्मित हो गया। राधा कुंड के पास आज भी स्थित गोपाल मणिपुरी मंदिर और प्राचीन संतों के समाधि स्थल इस ऐतिहासिक संबंध के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। वर्तमान समय में भी बड़ी संख्या में मणिपुरी वृद्धजन अपने जीवन के अंतिम दिनों में ब्रजवास की कामना लेकर और पूर्वजों के उद्धार की प्रार्थना करते हुए यहां डेरा डालते हैं।

पितृपक्ष 2026 की महत्वपूर्ण तिथियों का संपूर्ण विवरण

इस वर्ष पितृपक्ष का प्रारंभ 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध के अनुष्ठान के साथ होने जा रहा है। इसके उपरांत नियमित प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर, रविवार को आयोजित होगा। आगामी तिथियों में 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध तथा 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध के साथ महाभरणी का योग रहेगा। इसके बाद 30 सितंबर को चतुर्थी एवं पंचमी श्राद्ध एक साथ संपन्न होंगे।

अक्टूबर के पहले पखवाड़े में 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध, 3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध, 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध और 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध का विधान तय है। आगे बढ़ते हुए 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर को द्वादशी एवं मघा श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध तथा 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध पड़ेगा। अंत में 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस 15 दिवसीय पितृ मोक्ष महापर्व का समापन होगा।

सवाल-जवाब

पितृपक्ष 2026 की शुरुआत और समापन किस दिन होगा?
पितृपक्ष 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध से शुरू होगा और 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा।
मणिपुर के लोग गोवर्धन के राधा कुंड में श्राद्ध क्यों करते हैं?
मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालु राधा कुंड को गयाजी के समान मोक्षदायिनी तीर्थ मानते हैं और विश्वास करते हैं कि यहां तर्पण करने से पूर्वजों को राधा-कृष्ण के चरणों में स्थान मिलता है।
मणिपुरी भाषा में तर्पण को किस नाम से पुकारा जाता है?
मणिपुरी भाषा में पूर्वजों के लिए किए जाने वाले तर्पण अनुष्ठान को स्थानीय रूप से 'तर्पों' कहा जाता है।
शिव कुंड पर अस्थि विसर्जन के पीछे क्या मान्यता है?
शास्त्रों में भगवान शिव को वैष्णवों का परम गुरु माना गया है, इसलिए मान्यता है कि शिव कुंड में अस्थियां विसर्जित करने से दिवंगत आत्मा को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है।
मणिपुर का ब्रज धाम से ऐतिहासिक संबंध किस काल में स्थापित हुआ?
यह संबंध 18वीं शताब्दी में तब स्थापित हुआ जब मणिपुर के महाराज भाग्यचंद्र (जय सिंह) ने गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की दीक्षा ग्रहण की थी।
राधा कुंड के समीप मणिपुरी श्रद्धालुओं द्वारा अस्थियां रखने का क्या नियम है?
श्रद्धालु पूर्वजों की अस्थियों को राधा रानी को अर्पित करने के बाद पीपल के वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर गाड़ देते हैं और पेड़ पर कपड़ा बांधते हैं।
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