घर पहुंचने से 40 किमी पहले सड़क दुर्घटना में सेना के जवान मोतीसिंह तंवर का निधन, रामदेवरा में सैन्य सम्मान से विदाईकमजोर हड्डियों और जोड़ों के दर्द से राहत दिला सकती है पारंपरिक हड़जोड़ की चटनीमत्स्य पालन में मुनाफा बढ़ाने के आधुनिक तरीके, सीमित जमीन और पानी में भी तैयार होगा बंपर उत्पादनबिग बॉस 20 में कनिका पर भद्दी टिप्पणी करने पर काजी तौकीर पर बरसे सलमान खानइंटरमीडिएट के तुरंत बाद बनाएं सुरक्षित भविष्य, सरकारी और निजी क्षेत्र के सबसे सुलभ रोजगार विकल्पमानसून की विदाई के बाद दिल्ली-एनसीआर में बढ़ी गर्मी और उमस, हवा भी हुई जहरीलीदुबई से सोना तस्करी मामले में कस्टम्स का बड़ा एक्शन, रान्या राव और सहयोगियों पर 244 करोड़ से ज्यादा की पेनल्टीएशियन गेम्स फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ गरजा अभिषेक शर्मा का बल्ला, टी20 में रचा नया कीर्तिमानरणथंभौर में वन्यजीवों का अनोखा संसार: दिल्ली से सफर और सफारी बुकिंग की पूरी जानकारीजनआंदोलनों को एकजुट करने के लिए राहुल गांधी ने शुरू किया 'सत्याग्रह' डिजिटल मंच
मत्स्य पालन में मुनाफा बढ़ाने के आधुनिक तरीके, सीमित जमीन और पानी में भी तैयार होगा बंपर उत्पादनराजस्थान
3 अक्तू॰ 2026, 12:04 pm (34 मिनट पहले)· 1

मत्स्य पालन में मुनाफा बढ़ाने के आधुनिक तरीके, सीमित जमीन और पानी में भी तैयार होगा बंपर उत्पादन

खेती और जलीय कृषि में आए आधुनिक बदलावों से अब सीमित संसाधनों में भी मछली पालन संभव हो गया है। पांच उन्नत प्रणालियों के वैज्ञानिक प्रबंधन से किसान अपनी आय और उत्पादन में कई गुना बढ़ोतरी कर सकते हैं।

पारंपरिक खेती और पशुपालन के तौर-तरीकों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़े तकनीकी बदलाव दर्ज किए गए हैं। पहले जहां मत्स्य पालन केवल बड़े ग्रामीण तालाबों, नदियों या नहरों तक ही सीमित माना जाता था, वहीं अब नई विधियों ने इसे किसी भी छोटे भूखंड पर संचालित होने वाले लाभकारी उद्यम में बदल दिया है। पानी की कमी और सीमित जमीन से जूझ रहे किसान अब पूरी तरह नियंत्रित परिस्थितियों में जलीय जीवों का संवर्धन कर रहे हैं। अगर किसान अपने क्षेत्र में पानी की स्थिति, उपलब्ध पूंजी, जगह और स्थानीय बाजार की मांग का सही आकलन करके उपयुक्त तकनीक चुनें, तो जलीय कृषि से होने वाला मुनाफा कई गुना तक बढ़ सकता है।

बायोफ्लॉक तकनीक से कम जगह और कम पानी में अधिक संवर्धन

प्रगतिशील किसान मोर मुकुट सिंह के अनुसार, जैव फ्लॉक यानी बायोफ्लॉक प्रणाली सीमित संसाधनों के अधिकतम उपयोग का एक सटीक उदाहरण है। इस पद्धति में कंक्रीट या तारपोलिन से बने टैंकों के भीतर पानी भरकर उसमें विशेष लाभकारी बैक्टीरिया तैयार किए जाते हैं। ये सूक्ष्मजीव पानी में मौजूद मछलियों के मलमूत्र और अवांछित अपशिष्ट को उपयोगी जैविक तत्वों और प्रोटीन में रूपांतरित करने का कार्य करते हैं।

ये भी पढ़ें

इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि मछलियां उसी परिवर्तित प्रोटीन को दोबारा अपने आहार के तौर पर ग्रहण कर लेती हैं। नतीजतन, कृत्रिम चारे की खपत कम होती है और टैंक का पानी बार-बार खाली करने की मजबूरी समाप्त हो जाती है। बहुत कम क्षेत्रफल में मछलियों का अधिक घनत्व बनाए रखने के लिए यह तकनीक बेहद कारगर सिद्ध होती है। हालांकि, इस प्रणाली में लगातार बिजली, कृत्रिम ऑक्सीजन की आपूर्ति, पानी के तापमान और तकनीकी मापदंडों पर चौबीसों घंटे निगरानी रखना बेहद अनिवार्य होता है।

प्राकृतिक जलाशयों में केज कल्चर का बढ़ता दायरा

केज कल्चर तकनीक के तहत कृत्रिम तालाब खोदने के बजाय खुले प्राकृतिक जलस्रोतों का उपयोग किया जाता है। इसमें टिकाऊ और मजबूत जालों से निर्मित बड़े आकार के पिंजरे तैयार किए जाते हैं, जिन्हें झीलों, बड़े बांधों, जलाशयों या सदानीरा जलधाराओं में सुरक्षित तरीके से स्थापित कर दिया जाता है। मछलियां पूरी तरह पिंजरों के सुरक्षित दायरे में रहती हैं, जबकि प्राकृतिक जल उनके आर-पार निर्बाध रूप से बहता रहता है।

लगातार बहने वाले ताजे पानी के कारण मछलियों को प्राकृतिक घुलित ऑक्सीजन और सूक्ष्म पोषक तत्व बिना किसी अतिरिक्त ऊर्जा लागत के मिलते रहते हैं। खुले पानी की यह प्राकृतिक गतिशीलता मछलियों की शारीरिक वृद्धि दर को काफी तेज कर देती है। जिन क्षेत्रों में बड़े सार्वजनिक या निजी जलाशय उपलब्ध हैं, वहां बिना किसी बड़े भूमि अधिग्रहण के भारी मात्रा में मत्स्य उत्पादन हासिल करने के लिए यह व्यवस्था बेहद उपयोगी साबित होती है।

आरएएस: जल पुनर्चक्रण आधारित नियंत्रित एक्वाकल्चर प्रणाली

रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) आधुनिक इंजीनियरिंग और जीव विज्ञान का एक समन्वित रूप है। इस प्रणाली की मूल विशेषता यह है कि इसमें उपयोग किए गए पानी को बाहर फेंकने के बजाय विशेष फिल्टरों की सहायता से साफ करके बार-बार उपयोग में लाया जाता है। सिस्टम में लगे यांत्रिक और जैविक फिल्ट्रेशन तंत्र पानी से ठोस कचरा अलग करते हैं और हानिकारक अमोनिया को निष्प्रभावी बनाते हैं।

पानी की गंभीर किल्लत और महंगी जमीन वाले इलाकों में आरएएस तकनीक जलीय कृषि को वर्षभर जारी रखने की सुविधा देती है। यह पूरा सेटअप बंद शेड या नियंत्रित कक्ष के भीतर संचालित होता है, जिससे बाहरी मौसम, दूषित हवा और परजीवी संक्रमण का खतरा नगण्य हो जाता है। किसान हर समय पानी की गुणवत्ता और मछलियों के स्वास्थ्य की सटीक निगरानी कर सकते हैं, जिससे आकस्मिक बीमारियों से होने वाला नुकसान पूरी तरह रुक जाता है।

नदी जैसा तेज बहाव देने वाला रेसवे सिस्टम

रेसवे तकनीक मुख्य रूप से उन जलीय प्रजातियों के लिए आदर्श मानी जाती है जिन्हें जीवित रहने और तेजी से बढ़ने के लिए तीव्र जल प्रवाह की आवश्यकता होती है। इस प्रणाली में लंबे, संकरे और ढलानदार कंक्रीट के जल चैनल तैयार किए जाते हैं। इन चैनलों के एक सिरे से पानी तेजी से प्रवेश कराया जाता है और दूसरे सिरे से बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे बिल्कुल प्राकृतिक पहाड़ी नदी जैसा वातावरण बन जाता है।

तेज गति से बहता पानी अपने साथ उच्च स्तर की घुलित ऑक्सीजन लेकर आता है और मछलियों के मल को तुरंत बहाकर चैनल से बाहर कर देता है। अपशिष्ट जमा न होने के कारण जल स्वच्छ बना रहता है और मछलियों पर तनाव नहीं पड़ता। सही वैज्ञानिक देखरेख, चारे के समुचित वितरण और निरंतर जल प्रवाह प्रबंधन के सहारे इस व्यवस्था से बहुत कम समय में भारी वजन वाली मछलियां तैयार की जा सकती हैं।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग: खेती, पशुधन और मत्स्य पालन का साझा चक्र

इंटीग्रेटेड यानी एकीकृत मत्स्य पालन एक पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल समग्र दृष्टिकोण है, जिसमें जलीय कृषि को अन्य कृषि गतिविधियों के साथ जोड़ा जाता है। इसके तहत किसान अपने खेतों में धान की पैदावार के साथ, अथवा मेड़ों पर मुर्गी पालन, बत्तख पालन और बकरी पालन के साथ मछली पालन का संचालन करते हैं। इस मॉडल की सबसे अनूठी बात यह है कि एक घटक का कचरा दूसरे घटक के लिए बहुमूल्य संसाधन बन जाता है।

उदाहरण के लिए, पानी के ऊपर बनाए गए शेड में रहने वाली बत्तखों या मुर्गियों का अपशिष्ट सीधे पानी में गिरता है, जो पानी में प्राकृतिक प्लैंकटन विकसित करने और मछलियों के पोषण के लिए बेहतरीन जैविक खाद का काम करता है। इससे महंगे कृत्रिम चारे पर निर्भरता घटती है और अलग से रासायनिक खाद डालने का खर्च भी बचता है। एक ही भूखंड से एक साथ कई तरह की उपज मिलने के कारण किसानों की वित्तीय सुरक्षा काफी मजबूत हो जाती है।

सवाल-जवाब

बायोफ्लॉक तकनीक में पानी बार-बार बदलने की जरूरत क्यों नहीं पड़ती?
इस तकनीक में लाभकारी बैक्टीरिया मछलियों की गंदगी को उपयोगी जैविक पदार्थ और प्रोटीन में बदल देते हैं, जिसे मछलियां खा लेती हैं और पानी स्वच्छ बना रहता है।
केज कल्चर तकनीक किन स्थानों के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त है?
केज कल्चर तकनीक बड़ी झीलों, जलाशयों, बांधों और उपयुक्त प्राकृतिक जलस्रोतों वाले क्षेत्रों में मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए सबसे मुफीद मानी जाती है।
आरएएस तकनीक की मुख्य विशेषता क्या है?
आरएएस यानी रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम में आधुनिक फिल्ट्रेशन द्वारा पानी को साफ करके बार-बार मछली पालन में इस्तेमाल किया जाता है।
रेसवे सिस्टम में मछलियां तेजी से क्यों बढ़ती हैं?
लंबे और संकरे चैनलों में पानी के लगातार तेज प्रवाह से पर्याप्त घुलित ऑक्सीजन मिलती है और अपशिष्ट तुरंत बाहर बह जाता है, जिससे मछलियां तेजी से विकसित होती हैं।
इंटीग्रेटेड मछली पालन से किसानों को क्या अतिरिक्त फायदा होता है?
इसमें बत्तख, मुर्गी या बकरी पालन के अपशिष्ट का इस्तेमाल मछलियों के भोजन के रूप में हो जाता है, जिससे चारे की लागत बचती है और अतिरिक्त आमदनी होती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·19 मिनट पहले

मोर मुकुट सिंह ने बायोफ्लॉक का जो गणित समझाया है, वो वाकई कमाल का है। टैंक के मलमूत्र से दोबारा प्रोटीन बनना और बार-बार पानी न बदलना पड़े, ये छोटे किसानों का बहुत बड़ा खर्च बचाएगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 मिनट पहले

रोहन भाई, मोर मुकुट जी की बात बिल्कुल सही है। पिछले साल जब मैं एक गांव में गया था, तो वहां एक किसान ने ऐसे ही टैंक में मछली पाल रखी थी और उसका खर्च सचमुच बहुत कम आया था।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp