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चातुर्मास का समापन और मांगलिक कार्यों की वापसी, जानें देव उठनी एकादशी की सही तिथि व अनुष्ठानअध्यात्म
3 अक्तू॰ 2026, 2:29 am (1 घंटे पहले)· 0

चातुर्मास का समापन और मांगलिक कार्यों की वापसी, जानें देव उठनी एकादशी की सही तिथि व अनुष्ठान

भगवान विष्णु के चार महीने की योगनिद्रा से जागने के साथ ही विवाह और गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्य फिर शुरू होंगे। इस वर्ष देव उठनी एकादशी का निर्जला व्रत 1 नवंबर 2025 को रखा जाएगा।

वैदिक पंचांग के अनुसार कार्तिक मास में पड़ने वाली बड़ी एकादशी के आगमन के साथ ही सनातन परंपरा में चार माह से थमे मांगलिक अनुष्ठान दोबारा गति पकड़ने लगते हैं। पूरे संवत्सर में आने वाले चौबीस व्रतों में इस पर्व का स्थान बेहद खास माना गया है, क्योंकि इस पावन बेला पर सृष्टि के संरक्षक श्रीहरि योगनिद्रा से जागृत होते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से आरंभ हुआ चातुर्मास इसी तिथि पर पूर्ण होता है, जिसके उपरांत विवाह, नवीन गृह में प्रवेश, चूड़ाकर्म और यज्ञोपवीत जैसे पवित्र आयोजनों के लिए मुहूर्त खुल जाते हैं।

साल 2025 में किस दिन मनेगा यह महापर्व

पंचांग गणना और ज्योतिषीय विश्लेषण के मुताबिक आगामी वर्ष में देवोत्थान का यह उत्सव शनिवार, 1 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर ज्योतिष विभाग के प्रमुख डॉ. कुणाल कुमार झा ने स्पष्ट किया है कि तिथि गणना के अनुसार इसी दिन भक्तजन उपवास रखकर जगत के पालनहार को जगाने की परंपरा निभाएंगे। चार मास तक साधना और संयम में लीन रहने के बाद यह दिन गृहस्थ जीवन में नई उमंग और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

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कठिन निर्जला तप और पारण की शास्त्रसम्मत विधि

इस व्रत की आचार संहिता अत्यंत कठोर और अनुशासित मानी गई है। डॉ. कुणाल कुमार झा के अनुसार, "देव उठनी एकादशी के दिन जल भी ग्रहण नहीं किया जाता।" सूर्योदय से लेकर संध्याकाल तक श्रद्धालु बिना अन्न और जल के पूर्ण संयम का पालन करते हैं। शाम के समय जब नारायण का विधिपूर्वक आह्वान कर उन्हें जगा दिया जाता है, उसके उपरांत ही फल और कंदमूल का अल्पाहार ग्रहण करने का विधान है।

व्रत का विधिवत समापन अगले दिन यानी रविवार, 2 नवंबर 2025 की सुबह पारण के साथ होगा। पारण अनुष्ठान के दौरान तुलसी दल अथवा बेलपत्र का स्पर्श कराकर संकल्प खोला जाता है। इसके साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराने और दक्षिणा अर्पित करने के उपरांत ही साधक स्वयं अन्न ग्रहण करते हैं, जिससे व्रत का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।

शंख ध्वनि और स्तुति मंत्रों से भगवान का जागरण

संध्या पूजन के दौरान श्रीहरि के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करते हुए शंख, चक्र, गदा और पद्म के प्रतीकों के समक्ष विशेष आराधना की जाती है। श्रद्धालु पारंपरिक स्तुति मंत्रों का उच्चारण करते हुए प्रभु से योगनिद्रा त्यागने की विनम्र प्रार्थना करते हैं। श्लोक के माध्यम से भक्त नारायण से विनती करते हैं कि हे गोविंद, तीनों लोकों के कल्याण और ब्रह्मांड के संचालन के लिए आप अपनी चार महीने की निद्रा को समाप्त कर जागृत हो जाइए। घर-आंगन में रंगोली, ईख के मंडप और दीपकों की रोशनी के बीच सामूहिक कीर्तन, भजन और सत्यनारायण कथा का श्रवण किया जाता है।

सामाजिक उत्साह और शुभ मुहूर्तों का शुभारंभ

धार्मिक अनुष्ठानों के अतिरिक्त यह तिथि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी व्यापक बदलाव लाती है। चातुर्मास के दौरान मांगलिक कार्यों पर लगा विराम हटने से समाज में उत्सव का माहौल बन जाता है। परिवारों में शादी-ब्याह की तैयारियां जोर पकड़ने लगती हैं, नए मकानों की नींव रखी जाती है और घरों में पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं। यह पर्व हर व्यक्ति को आत्मिक जागृति, कर्तव्यों के प्रति निष्ठा और धर्मसम्मत आचरण को जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्रदान करता है।

सवाल-जवाब

वर्ष 2025 में देव उठनी एकादशी किस तारीख को मनाई जाएगी?
देव उठनी एकादशी शनिवार, 1 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी।
इस एकादशी के दिन व्रत रखने के क्या नियम हैं?
इस दिन पूरे दिन निर्जल व्रत रखा जाता है और शाम को भगवान विष्णु को जगाने के बाद ही फलाहार ग्रहण किया जाता है।
व्रत का पारण कब और किस प्रकार किया जाएगा?
पारण 2 नवंबर 2025 की सुबह तुलसी या बेलपत्र के साथ और ब्राह्मण भोजन के उपरांत किया जाएगा।
देव उठनी एकादशी के बाद कौन से कार्य शुरू हो जाते हैं?
इस दिन चातुर्मास समाप्त होने के बाद विवाह, गृहप्रवेश और मुंडन जैसे सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।
भगवान विष्णु की पूजा किस विधि से की जाती है?
पूजा में शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ स्तुति मंत्रों का उच्चारण कर भगवान को योगनिद्रा से जगाया जाता है।
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