दस दिनों तक चलने वाले पावन गणेश उत्सव का आज यानी अनंत चतुर्दशी पर पूर्ण रूप से समापन हो रहा है। गणेश चतुर्थी से शुरू हुए इस धार्मिक अनुष्ठान के अंतिम दिन देश भर में श्रद्धालु अपने आराध्य भगवान गणेश को श्रद्धापूर्वक विदाई दे रहे हैं। इस अवसर पर घरों और पूजा पंडालों में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जहाँ भक्तगण बप्पा की विधिवत पूजा और उत्तर पूजा संपन्न करने के बाद उन्हें अगले बरस जल्दी आने का न्योता देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दस दिनों में भगवान गणेश अपने भक्तों के सभी संकट और विघ्न हर लेते हैं, जिससे घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। विसर्जन यात्रा के दौरान गणपति बप्पा मोरया और अगले बरस तू जल्दी आ के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठता है।
गणेश विसर्जन से पहले इस तरह करें उत्तर पूजा
भगवान गणेश को विदा करने से पहले घर या पूजा स्थल पर उनकी दोबारा पूजा करने का विधान है, जिसे उत्तर पूजा कहा जाता है। इस विशेष पूजा की शुरुआत में सबसे पहले गणपति को स्नान कराया जाता है या फिर उन्हें पवित्र गंगाजल अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात उन्हें साफ वस्त्र, ताजे फूल, पवित्र दूर्वा, सिंदूर और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। बप्पा को उनके प्रिय भोग के रूप में मोदक, लड्डू, ताजे फल और अन्य नैवेद्य श्रद्धा के साथ चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद धूप और दीप प्रज्वलित करके आरती की जाती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर भगवान गणेश से सुख, शांति, समृद्धि और जीवन के सभी विघ्न दूर करने की प्रार्थना करते हैं। इस पूजन के दौरान जाने-अनजाने में हुई किसी भी भूल या गलती के लिए गणपति से क्षमा मांगने की पुरानी परंपरा भी निभाई जाती है। उत्तर पूजा संपन्न होने के बाद ही गणेश प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाने की तैयारी शुरू की जाती है.
बप्पा की विदाई के समय तैयार की जाती है विशेष पोटली
भगवान गणेश को उनके गंतव्य के लिए विदा करते समय एक छोटी सी लाल या पीले रंग के कपड़े में विशेष सामग्री बांधकर पोटली दी जाती है। इस विदाई पोटली में कई पवित्र चीजें शामिल होती हैं जो जीवन में शुभता लाती हैं। इस पोटली में भगवान को प्रिय भोग के रूप में मोदक या लड्डू रखे जाते हैं, जो उनकी पसंदीदा मिठाई माने जाते हैं। इसके अलावा श्रीगणेश को बेहद प्रिय हरी घास यानी दूर्वा भी इसमें डाली जाती है। जीवन में शुभता और समृद्धि बनाए रखने के लिए हल्दी की गांठ को इस पोटली का हिस्सा बनाया जाता है। अखंडता और पूजन की पूर्णता के प्रतीक के रूप में एक सुपारी भी रखी जाती है। पूर्णता और अक्षुण्णता के प्रतीक के तौर पर अक्षत यानी चावल शामिल किए जाते हैं। इसके साथ ही श्रद्धा स्वरूप थोड़े सिक्के या दक्षिणा भी इस पोटली में बांधी जाती है ताकि बप्पा की विदाई पूरी विधि और सत्कार के साथ संपन्न हो सके.
गणेश विसर्जन के लिए पंचांग आधारित उत्तम और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार आज के दिन कई शुभ मुहूर्त और योग बन रहे हैं जिनका उपयोग विसर्जन के लिए किया जा सकता है। लाभ चौघड़िया का समय सुबह 7:41 से 9:12 बजे तक रहेगा। अमृत चौघड़िया का समय सुबह 9:12 से 10:42 बजे तक निर्धारित किया गया है। शुभ चौघड़िया का लाभ दोपहर 12:13 से 1:43 बजे तक उठाया जा सकता है। चर एवं लाभ मुहूर्त दोपहर 12:15 बजे से दोपहर 03:18 बजे तक प्रभावी रहेगा। इसके अलावा गणेश विसर्जन के लिए समग्र रूप से उत्तम मुहूर्त सुबह 06:02 बजे से लेकर दोपहर 02:36 बजे के बीच का बताया गया है। प्रातः काल का शुभ मुहूर्त सुबह 06:12 बजे से सुबह 10:42 बजे तक रहेगा। दिन के विशेष मुहूर्तों में अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:48 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक और विजय मुहूर्त दोपहर 02:14 पी एम से 03:02 पी एम तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 06:15 पी एम से 06:39 पी एम तक रहेगा जबकि रवि योग सुबह 06:12 ए एम से 11:22 ए एम तक मान्य रहेगा।
विसर्जन के दौरान इन जरूरी बातों का रखें विशेष ध्यान
गणेश प्रतिमा को पंडाल या घर से विसर्जन स्थल तक पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ ले जाना चाहिए। पानी में प्रतिमा प्रवाहित करने से ठीक पहले एक बार फिर आरती उतारें और परिवार के सभी सदस्य मिलकर बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करें। सुरक्षा और नियमों को ध्यान में रखते हुए केवल प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थल का ही इस्तेमाल करना चाहिए। पर्यावरण की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए केवल मिट्टी की बनी प्रतिमा और प्राकृतिक सामग्री का ही उपयोग करना बेहतर माना जाता है। पूजा में उपयोग होने वाले फूल-माला और अन्य सामग्री को सीधे जल में डालने के बजाय स्थानीय प्रशासन द्वारा बनाए गए निर्धारित स्थान पर ही रखना चाहिए। नदी, तालाब या समुद्र में प्रतिमा विसर्जित करते समय पानी की गहराई का पूरा ध्यान रखें और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किए गए सभी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा से बचा जा सके.
















