गणेश उत्सव के अंतिम चरण में भक्त अपने आराध्य भगवान गणेश को भावभीनी विदाई देने की तैयारी कर रहे हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी की पावन तिथि विदाई अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक फलदायी स्वीकार की गई है। इस वर्ष यह प्रमुख तिथि 25 सितंबर को पड़ रही है। जो श्रद्धालु गणेश चतुर्थी के पावन दिन पर अपने आवास में गजानन की सुंदर प्रतिमा स्थापित करते हैं, वे दस दिनों की अनवरत भक्ति के पश्चात पूरे विधि-विधान से उन्हें विदा करते हैं। विसर्जन कर्म केवल जल में प्रतिमा प्रवाहित करना नहीं है, बल्कि यह कृतज्ञता, क्षमा और अगले वर्ष शीघ्र पुनः आगमन की प्रार्थना का एक संपूर्ण आध्यात्मिक विधान है।
विदाई पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
भगवान गणेश को विदा करने से पूर्व उनका आदरपूर्वक अंतिम पूजन किया जाता है, जिसके लिए कुछ अनिवार्य वस्तुओं को पहले से जुटाकर रखना आवश्यक होता है।
- शुद्ध घी और दीपक प्रज्वलित करने के साधन
- सुगंधित धूप तथा अगरबत्तियां
- पवित्र गंगाजल और ताजे जल से भरा एक कलश
- रोली, कुमकुम, लाल सिंदूर तथा चंदन का लेप
- साबुत अक्षत और सुगंधित ताजे फूल अथवा मालाएं
- नैवेद्य के लिए ताजे फल और बप्पा के प्रिय मोदक
- आरती संपन्न करने के लिए शुद्ध कपूर
चरणबद्ध विसर्जन विधान एवं परंपराएं
विदाई अनुष्ठान आरंभ करने से पहले स्थापित गणपति की चौकी के समक्ष बैठें। सबसे पहले भगवान के मस्तक पर रोली, चंदन और सिंदूर का तिलक लगाएं। इसके पश्चात उन्हें अक्षत तथा प्रिय दूर्वा घास अर्पित करें। भगवान को मोदक और मिष्ठान्न का भोग अर्पित करने के बाद पुष्पों से सजाएं और घी का दीपक प्रज्वलित करें।
इसके बाद पूरे कुटुंब के साथ मिलकर गणपति बप्पा की मंगलकारी आरती गाएं। आरती के उपरांत हाथ जोड़कर पूजा के दौरान जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करें। इसके बाद आदर सहित प्रतिमा को चौकी से उठाएं। बप्पा के साथ एक विशेष लाल कपड़े की पोटली अवश्य बांधकर रखें। इस पोटली में अक्षत, पंचमेवा तथा कुछ मिष्ठान्न सुरक्षित रखे जाते हैं, जिसे परंपरागत रूप से देव की विदाई यात्रा का पाथेय माना जाता है।
परिवारजन एवं श्रद्धालु भक्तिभाव से 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' का उद्घोष करते हुए विसर्जन स्थल की ओर प्रस्थान करते हैं। नदी, तालाब, समुद्र अथवा कृत्रिम विसर्जन कुंड पर पहुंचकर अंतिम बार धूप-दीप से छोटी आरती की जाती है और फिर श्रद्धापूर्वक प्रतिमा का प्रवाह जल में किया जाता है।
घर के भीतर टब अथवा बाल्टी में विसर्जन का सरल तरीका
यदि आपके निवास के समीप कोई प्राकृतिक जलस्रोत, नदी अथवा सरोवर उपलब्ध न हो, तो श्रद्धालु अपने घर पर ही सुगमता से विसर्जन अनुष्ठान पूरा कर सकते हैं। यह विधि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत उत्तम मानी जाती है।
इसके लिए आंगन अथवा बालकनी में एक बड़ा साफ टब या स्वच्छ बाल्टी रखें। इसमें पर्याप्त मात्रा में शुद्ध जल भरें और साथ ही उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। जल की सतह पर ताजे पुष्प बिखेर दें। विसर्जन से पूर्व विग्रह पर सुसज्जित वस्त्र और कृत्रिम आभूषण सावधानी से उतार लें। इसके पश्चात प्रतिमा को जलपात्र के भीतर धीरे-धीरे तीन बार आंशिक रूप से डुबोकर बाहर निकालें। अंत में चौथी बार मंगल जयकारे के साथ प्रतिमा को पूर्णतः जलमग्न कर दें। जब मिट्टी पूरी तरह घुल जाए, तब उस पवित्र जल को घर के गमलों अथवा बगीचे के पौधों में अर्पित किया जा सकता है।
अनंत चतुर्दशी 2026 के दिन विसर्जन के चार शुभ मुहूर्त
पंचांग के आधार पर 25 सितंबर को पूरे दिन विभिन्न चौघड़िया मुहूर्तों में विसर्जन कार्य संपन्न किया जा सकता है। भक्त अपनी सुविधा और अनुकूलता के अनुसार उपयुक्त कालखंड का चयन कर सकते हैं।
- प्रातःकालीन वेला (चर, लाभ तथा अमृत चौघड़िया): सुबह 06:11 AM से लेकर 10:42 AM तक
- दोपहर का समय (शुभ चौघड़िया): दोपहर 12:13 PM से 01:43 PM तक
- अपराह्न काल (चर चौघड़िया): शाम 04:44 PM से 06:14 PM तक
- रात्रिकालीन मुहूर्त (लाभ चौघड़िया): रात्रि 09:14 PM से 10:43 PM तक



















