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अरावली की पहाड़ियों में स्थित 800 साल पुराना भूतेश्वर महादेव मंदिर, महाभारत काल और पांडवों से जुड़ा है गहरा इतिहासधर्म
20 सित॰ 2026, 11:10 pm (10 दिन पहले)· 1

अरावली की पहाड़ियों में स्थित 800 साल पुराना भूतेश्वर महादेव मंदिर, महाभारत काल और पांडवों से जुड़ा है गहरा इतिहास

राजस्थान के सिरोही जिले में अरावली की शांत वादियों में स्थित प्राचीन भूतेश्वर महादेव मंदिर, जिसे अब कर्णिकेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है, अपनी अनूठी मान्यताओं और महाभारत कालीन इतिहास के लिए विख्यात है।

राजस्थान के सिरोही जिले में आबू राज क्षेत्र की अरावली पर्वतमालाओं के बीच कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद हैं। इन्हीं वादियों में स्थित ओमनी का प्राचीन भूतेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। आधुनिक दौर में इस पवित्र धाम को कर्णिकेश्वर महादेव मंदिर के रूप में पहचाना जाता है, हालांकि इसका ऐतिहासिक और मूल नाम भूतेश्वर महादेव ही है। इस नामकरण के पीछे एक खास वजह जुड़ी हुई है। मंदिर परिसर के बिल्कुल पास में एक पुराना श्मशान घाट मौजूद था, जिसके कारण इसे भूतेश्वर नाम मिला। स्थानीय श्रद्धालुओं में यह मान्यता रही है कि रात्रि के समय इस निर्जन क्षेत्र में आत्माओं और भूतों का डेरा रहता था, जिसके खौफ के चलते लोग शाम ढलने के बाद यहां कदम रखने से कतराते थे।

पुराना स्वरूप और 800 साल का इतिहास

क्षेत्र के स्थानीय श्रद्धालु निखिल कुमार के अनुसार, भले ही आज बोलचाल में इसे कर्णिकेश्वर महादेव कहा जाता है, लेकिन इसके ऐतिहासिक गौरव का प्रमाण आज भी मुख्य प्रवेश द्वार पर देखा जा सकता है, जहां प्राचीन नाम भूतेश्वर महादेव स्पष्ट रूप से अंकित है। समूचे स्थल की धार्मिक परंपरा भले ही हजारों साल पुरानी मानी जाती हो, लेकिन मौजूदा मंदिर की संरचना लगभग 700 से 800 वर्ष पुरानी बताई जाती है। समय बीतने के साथ विभिन्न कालों में इस धाम की देखरेख के तहत इसका पुनर्निर्माण और आवश्यक जीर्णोद्धार कार्य संपन्न कराया जाता रहा है, जिससे इसकी प्राचीनता आज भी सुरक्षित है।

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जंगल, वन्यजीव और उपेक्षित बावड़ी

मंदिर के ठीक सामने एक प्राचीन बावड़ी और कुछ लघु देवालय स्थित हैं। वर्तमान में नियमित रखरखाव की कमी के चलते ये संरचनाएं जंगली झाड़ियों और वनस्पतियों से घिर चुकी हैं। चूंकि यह संपूर्ण क्षेत्र सघन वन संपदा से आच्छादित है, इसलिए रात होते ही यहां जंगली जानवरों की आवाजाही बढ़ जाती है। परिसर के भीतर कई बार भालुओं के विचरण की घटनाएं सामने आई हैं, जबकि दिन के समय लंगूर और अन्य वन्य प्राणी सहजता से घूमते नजर आ जाते हैं। यह संपूर्ण परिक्षेत्र आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है, क्योंकि इसके निकट ही प्रसिद्ध ऋषिकेश मंदिर और सनका महादेव मंदिर भी स्थापित हैं। इसके अलावा यह पवित्र भूमि जूना अखाड़ा के तपस्वी साधु-संतों की साधना स्थली भी रही है।

पांडवों का अज्ञातवास और स्वयंभू शिवलिंग

मंदिर के मुख्य पुजारी के मुताबिक, इस पावन धाम का ताल्लुक महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। जब पांडव अपने अज्ञातवास की कठिन अवधि गुजार रहे थे, तब उन्होंने इस शांत वन क्षेत्र में विश्राम किया था। उसी ऐतिहासिक दौर में यहां शिवलिंग की स्थापना हुई थी। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित अति प्राचीन मूर्तियों के साथ-साथ स्वयंभू प्रकट हुए शिवलिंग की विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न होती है। इसके अतिरिक्त मुख्य देवालय के समीप ही बने एक छोटे मंदिर में एक प्राकृतिक शिवलिंग भी प्रतिष्ठित है। हर वर्ष श्रावण मास के पावन दिनों और महाशिवरात्रि के महापर्व पर यहां भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

सवाल-जवाब

भूतेश्वर महादेव मंदिर राजस्थान के किस जिले में स्थित है?
यह प्राचीन मंदिर राजस्थान के सिरोही जिले में आबू राज क्षेत्र की अरावली वादियों में स्थित है।
मंदिर का नाम भूतेश्वर महादेव क्यों पड़ा था?
मंदिर परिसर के पास में पुराना श्मशान घाट होने और रात में भूतों के वास की स्थानीय मान्यताओं के कारण इसे यह नाम मिला था।
इस मंदिर को वर्तमान में किस नाम से जाना जाता है?
वर्तमान समय में इस धाम को कर्णिकेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
मौजूदा मंदिर की संरचना कितनी पुरानी बताई जाती है?
मौजूदा मंदिर लगभग 700 से 800 वर्ष पुराना बताया जाता है, जिसका समय-समय पर जीर्णोद्धार होता रहा है।
मंदिर का संबंध किस ऐतिहासिक काल से बताया जाता है?
पुजारी के अनुसार इस स्थल का संबंध महाभारत काल से है, जब पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहां विश्राम किया था।
मंदिर परिसर में रात के समय कौन से वन्यजीव दिखाई देते हैं?
जंगल का इलाका होने के कारण रात में परिसर में भालू घूमते देखे गए हैं, जबकि दिन में लंगूर नजर आते हैं।
इस मंदिर के समीप कौन से अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मौजूद हैं?
मंदिर के पास ही प्रसिद्ध ऋषिकेश मंदिर और सनका महादेव मंदिर स्थित हैं, साथ ही यह जूना अखाड़ा के साधुओं की तपस्या स्थली भी रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·9 दिन पहले

अरावली की पहाड़ियों में स्थित यह 800 साल पुराना मंदिर न केवल हमारी पौराणिक विरासत और महाभारत काल की मान्यताओं को सहेजता है, बल्कि इसके संरक्षण की सख्त आवश्यकता को भी उजागर करता है। यदि इस क्षेत्र का समय पर जीर्णोद्धार और बुनियादी बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया गया, तो पर्यावरण और वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही के बीच यह अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षा की भेंट चढ़ सकती है।

Rajesh Kumar@rajesh-kumar·9 दिन पहले

अरावली की पहाड़ियों में स्थित इस 800 साल पुराने भूतेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी खबर धार्मिक पर्यटन और ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाती है। खबर में जिस तरह रखरखाव के अभाव में प्राचीन बावड़ी और लघु देवालयों के झाड़ियों में छिपने तथा जंगली जानवरों के खतरे का जिक्र किया गया है, वह प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है। यदि इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए, तो यह स्थल पर्यटन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·9 दिन पहले

इस ऐतिहासिक स्थल की सुरक्षा और वन्यजीवों की आवाजाही के बीच संतुलन बनाना स्थानीय प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। एक ओर जहाँ जुना अखाड़ा और पांडवकाल से जुड़ी यह धार्मिक धरोहर सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व रखती है, वहीं दूसरी ओर रात के समय भालुओं का विचरण तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की सुरक्षा पर सीधा सवाल खड़े करता है। यदि पर्यटन विकास के साथ वन विभाग और जिला प्रशासन मिलकर कोई ठोस सुरक्षा और बुनियादी ढांचागत नीति नहीं बनाते हैं, तो यह लापरवाही किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·9 दिन पहले

अरावली की पहाड़ियों में स्थित यह 800 वर्ष पुराना भूतेश्वर महादेव मंदिर न केवल धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सिरोही क्षेत्र के पर्यटन और स्थानीय आर्थिकी को भी एक नया आयाम दे सकता है। महाभारत काल से जुड़े इस ऐतिहासिक स्थल और आसपास के धार्मिक सर्किट का यदि सुनियोजित विकास किया जाए, तो यह सांस्कृतिक पर्यटन का एक बड़ा केंद्र बन सकता है, बशर्ते इसके संरक्षण और बुनियादी ढांचे के सुधार पर तुरंत ध्यान दिया जाए।

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·9 दिन पहले

अरावली की वादियों में स्थित इस ऐतिहासिक मंदिर और इसके आसपास के धार्मिक सर्किट का यदि सुनियोजित विकास किया जाए, तो यह सिरोही क्षेत्र में सांस्कृतिक और इको-पर्यटन को एक नया आयाम दे सकता है। हालांकि, इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले मंदिर परिसर और आसपास की उपेक्षित ऐतिहासिक संरचनाओं के संरक्षण, नियमित रखरखाव तथा वहां आने वाले श्रद्धालुओं व पर्यटकों के लिए बुनियादी ढांचे के सुधार पर तुरंत ध्यान देना होगा।

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