सस्ते कबाड़ के झांसे में 9 लाख की डकैती, 12 जिलों में 1300 किमी पीछा कर दबोचे गए 7 बदमाशपितृ पक्ष में लोहे के बर्तनों और दान से क्यों बचना चाहिए, जानिए धार्मिक कारणशारदीय नवरात्र से पूर्व उत्तराभाद्रपद में शनि का प्रवेश, सप्तम भाव के गोचर से साझेदारी और कारोबार पर असरसपोटरा के गज्जूपुरा में राज्य स्तरीय खो-खो टूर्नामेंट का आगाज, 86 टीमों की 1032 छात्राएं दिखाएंगी दमउत्तर भारत से मानसून की विदाई तेज, पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों में भारी बारिश का अलर्टनोंगस्टोइन स्टाफ नर्स भर्ती विवाद: वीपीपी ने एमडीसी के हस्तक्षेप को ठहराया सही, निष्पक्ष जांच की उठाई मांगअजमेर में बस चालक से मारपीट पर रोडवेज कर्मियों का फूटा गुस्सा, अंबेडकर सर्किल पर बसें रोक लगाया जामबालाघाट में रहस्यमयी बीमारी के बाद हरकत में प्रशासन, 50 गांवों में 43 हजार से अधिक लोगों का हुआ स्वास्थ्य परीक्षणमिथुन राशिफल 1 अक्टूबर 2026: बजट संभालें और बातचीत में बरतें स्पष्टता, मानसिक शांति बनाए रखने पर दें जोरवोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के नियमों में बदलाव, कई राज्यों में फॉर्म-6 से हटी एसआईआर घोषणा
अरावली की वादियों में स्थित इस ऐतिहासिक धाम में होती है भगवान शिव और दशानन रावण की अनोखी आराधनाधर्म
6 अग॰ 2026, 4:04 pm (55 दिन पहले)· 2

अरावली की वादियों में स्थित इस ऐतिहासिक धाम में होती है भगवान शिव और दशानन रावण की अनोखी आराधना

उदयपुर के झाड़ोल क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों के बीच बने कमलनाथ महादेव मंदिर में भगवान शिव के साथ रावण की भी पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां रावण ने शिवजी को अपना शीश अर्पित किया था, जिसके बाद इस स्थान का नाम कमलनाथ पड़ा।

राजस्थान के उदयपुर जिले में झाड़ोल क्षेत्र की अरावली श्रृंखलाओं के मध्य बसा कमलनाथ महादेव मंदिर आस्था और अद्भुत पौराणिक परंपराओं का एक अनोखा केंद्र है। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पावन स्थल देश के उन दुर्लभ मंदिरों में गिना जाता है, जहां महादेव के साथ ही दशानन रावण की भी नियमित रूप से पूजा की जाती है। श्रावण मास के पावन अवसर पर यहां श्रद्धालुओं और पर्यटकों का तांता लगा रहता है, जो प्राकृतिक छटा के बीच इस प्राचीन मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

108 कमल के संकल्प और शीश दान की पौराणिक कथा

कमलनाथ महादेव मंदिर की स्थापना से जुड़ी पौराणिक कथा बेहद रोचक और भक्ति भावना से ओतप्रोत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण भगवान शिव का अत्यंत अनन्य भक्त था। एक बार उसने अपनी कठोर तपस्या के दौरान महादेव को प्रसन्न करने हेतु 108 कमल के पुष्प अर्पित करने का संकल्प धारण किया था। पूजा के दौरान जब अनुष्ठान चल रहा था, तब एक कमल कम पड़ गया। अपने संकल्प को किसी भी परिस्थिति में अधूरा न छोड़ने के उद्देश्य से रावण ने बिना हिचकिचाए अपना शीश काटकर शिवजी के चरणों में समर्पित कर दिया। रावण की इस अगाध श्रद्धा और कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने उसके शीश को पुनः धड़ से जोड़ दिया। इस पावन घटना के बाद ही इस स्थान को कमलनाथ महादेव के नाम से प्रसिद्धि मिली।

ये भी पढ़ें

रावण की प्रतिमा और युगों पुरानी परंपरा

इस पावन धाम का सबसे अनूठा पहलू यह है कि मंदिर परिसर में भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा भी स्थापित है। भारतवर्ष में ऐसे गिने-चुने धार्मिक स्थल ही मौजूद हैं जहां भगवान के साथ उनके परम भक्त रावण की आराधना की जाती है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, मंदिर आने वाले हर श्रद्धालु सबसे पहले भगवान शिव के दर्शन करते हैं और तत्पश्चात रावण की प्रतिमा के समक्ष भी नतमस्तक होते हैं। यह परंपरा किसी एक कालखंड की नहीं बल्कि पीढ़ियों से निरंतर चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाया जाता है।

स्थानीय आदिवासी समाज का समर्पण और दायित्व

कमलनाथ महादेव मंदिर की देखरेख, दैनिक पूजा-अर्चना और व्यवस्था में क्षेत्र के स्थानीय आदिवासी समुदाय की केंद्रीय भूमिका रही है। यहां रहने वाला आदिवासी समाज प्राचीन काल से ही भगवान शिव और रावण दोनों की समान निष्ठा के साथ पूजा करता आ रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह अनोखी परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही एक अनमोल धरोहर है। सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि के पर्व तथा अन्य धार्मिक तिथियों पर यहां विशेष पूजा आयोजनों के साथ भव्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

स्वयंभू शिवलिंग और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम

धार्मिक जनश्रुति के अनुसार, मंदिर में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना गया है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी व्यक्ति यहां आकर निष्कपट और सच्चे मन से प्रार्थना करता है, महादेव उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं। यह स्थान केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण पर्यटन के नक्शे पर भी विशेष स्थान रखता है। चारों तरफ फैली अरावली की हरियाली, शांत वातावरण और बरसाती मौसम में पहाड़ियों का मनोरम दृश्य श्रद्धालुओं को एक अलौकिक और आध्यात्मिक शांति का अहसास कराता है। यही कारण है कि राजस्थान के विभिन्न जिलों के अलावा देश के अन्य कोनों से भी बड़ी संख्या में प्रकृति प्रेमी और दर्शनार्थी यहां खिंचे चले आते हैं।

सवाल-जवाब

कमलनाथ महादेव मंदिर राजस्थान में कहां स्थित है?
यह मंदिर उदयपुर जिले के झाड़ोल क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित है, जो उदयपुर शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर है।
कमलनाथ महादेव मंदिर में किस अनोखी परंपरा का पालन किया जाता है?
इस मंदिर में भगवान शिव के साथ-साथ लंकापति रावण की भी प्रतिमा स्थापित है और श्रद्धालुओं द्वारा दोनों की पूजा की जाती है।
इस मंदिर का नाम 'कमलनाथ महादेव' कैसे पड़ा?
मान्यता के अनुसार, 108 कमल अर्पित करने के संकल्प में एक कमल कम पड़ने पर रावण ने अपना शीश काटकर शिवजी को चढ़ाया था। शिवजी ने प्रसन्न होकर शीश पुनः जोड़ दिया, जिसके बाद यह स्थान कमलनाथ महादेव कहलाया।
कमलनाथ महादेव मंदिर की देखरेख में किसकी महत्वपूर्ण भूमिका है?
इस मंदिर की देखभाल और पूजा-अर्चना में स्थानीय आदिवासी समुदाय की मुख्य भूमिका है, जो पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहा है।
मंदिर के शिवलिंग के बारे में क्या मान्यता है?
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है और सच्चे मन से की गई प्रार्थनाएं भगवान शिव स्वीकार करते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp