सनातन धर्म में पितृपक्ष का समय पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और उनके तर्पण के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में इस पवित्र अवधि की शुरुआत हो चुकी है, जो आने वाले समय में सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगी। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पवित्र नदियों और तीर्थ स्थलों पर जाकर तर्पण और पिंडदान की रस्मों को पूरा करते हैं। मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी उज्जैन इस कार्य के लिए एक परम पावन केंद्र के रूप में पहचानी जाती है। शिप्रा नदी के तट पर स्थित इस प्राचीन नगरी में पितरों की मुक्ति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों की एक अत्यंत समृद्ध और प्राचीन परंपरा रही है। महाकाल की इस पावन भूमि पर आकर लोग अपने पितरों की तृप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं ताकि उनके परिवार पर पूर्वजों का आशीर्वाद सदैव बना रहे।
सिद्धवट का पौराणिक महत्व और माता पार्वती का संबंध
उज्जैन के प्रमुख धार्मिक स्थलों में सिद्धवट का स्थान बेहद विशिष्ट और पूजनीय माना जाता है। उज्जैन मुख्य शहर से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर शिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धवट को स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में एक अत्यंत पावन और चमत्कारी स्थल का दर्जा प्राप्त है। उज्जैन जिला प्रशासन के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पवित्र स्थान को 'पापमोचन तीर्थ' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पापों से मुक्ति दिलाने वाला स्थान। इस स्थान पर एक अति प्राचीन वट वृक्ष यानी बरगद का पेड़ मौजूद है, जिसके बारे में यह लोक मान्यता है कि इसे स्वयं माता पार्वती ने रोपित किया था और इसकी नियमित पूजा-अर्चना की थी। इसी महान पौराणिक विरासत के कारण इस स्थान पर पिंडदान और तर्पण करने का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। श्रद्धालु यहां आकर श्राद्ध, पिंड अर्पण, तर्पण और विशेष रूप से त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक कर्मकांडों को संपन्न करते हैं। माना जाता है कि सिद्धवट के इस पावन वृक्ष के नीचे किए गए अनुष्ठान सीधे पितरों तक पहुंचते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
रामघाट पर भगवान राम द्वारा माता-पिता का पिंडदान
पिंडदान की इस महान श्रृंखला में उज्जैन का रामघाट भी एक विशेष श्रद्धा का केंद्र है। सामान्यतः पिंडदान की प्रक्रिया में जौ या चावल के आटे से बने पिंडों को पूर्वजों को अर्पित किया जाता है और उसके बाद जल से तर्पण किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान श्रद्धापूर्वक किए गए इस दान से पूर्वजों की आत्मा को परम शांति और परम तृप्ति मिलती है। उज्जैन में बहने वाली मोक्षदायिनी शिप्रा नदी, बाबा महाकालेश्वर का मंदिर और यहां के अन्य ऐतिहासिक घाट आपस में एक गहरे आध्यात्मिक सूत्र से जुड़े हुए हैं। इसी कड़ी में शिप्रा नदी के तट पर स्थित रामघाट का एक बहुत ही सुंदर और प्रसिद्ध धार्मिक प्रसंग मिलता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान राम स्वयं इस स्थान पर पधारे थे और उन्होंने अपने पूज्य माता-पिता की आत्मा की शांति के लिए इसी घाट पर पिंडदान का अनुष्ठान किया था। भगवान राम के इसी पावन आगमन और अनुष्ठान के कारण इस स्थान का नाम सदैव के लिए 'रामघाट' पड़ गया, और तब से आज तक यहां पितरों की तृप्ति के लिए जल अर्पित करने की अटूट परंपरा चली आ रही है।
इस वर्ष 15 दिनों में संपन्न होंगे 16 तिथियों के श्राद्ध
इस वर्ष का पितृपक्ष खगोलीय और ज्योतिषीय गणनाओं के लिहाज से थोड़ा विशेष होने जा रहा है। आमतौर पर श्राद्ध पक्ष पूरे 16 दिनों का होता है, लेकिन इस बार तिथि के क्षय होने के कारण यह अवधि केवल 15 दिनों की होगी। इस बदलाव का मुख्य कारण यह है कि चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन यानी 30 सितंबर को संपन्न किया जाएगा। इसे धार्मिक शब्दावली में तिथि का क्षय होना कहा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप इस बार का महालय कुल 15 दिनों की अवधि में ही पूरा हो जाएगा। सनातन परंपरा के अनुसार, पितृपक्ष की शुरुआत हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है और इसका समापन आश्विन मास की अमावस्या तिथि को होता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या के रूप में जाना जाता है। इस बार यह संपूर्ण कालखंड सितंबर के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक चलेगा, जिसमें श्रद्धालु अपनी-अपनी तिथियों के अनुसार पूर्वजों का स्मरण करेंगे।
पितृपक्ष 2026 की महत्वपूर्ण तिथियों का विवरण
पितृपक्ष के दौरान प्रत्येक तिथि का अपना एक विशेष महत्व होता है और लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि के अनुसार इन दिनों में श्राद्ध कर्म करते हैं। वर्ष 2026 के पितृपक्ष की सभी प्रमुख तिथियों और उनके दिनों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है
- 27 सितंबर, रविवार: आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से श्राद्ध की शुरुआत होगी। इस दिन प्रतिपदा श्राद्ध का अनुष्ठान किया जाएगा।
- 28 सितंबर, सोमवार: इस दिन द्वितीया तिथि का श्राद्ध संपन्न किया जाएगा, जिसमें इस तिथि पर दिवंगत हुए पूर्वजों का स्मरण किया जाता है।
- 29 सितंबर, मंगलवार: तृतीया तिथि का श्राद्ध होने के साथ-साथ इस दिन महाभरणी का विशेष योग भी रहेगा, जिसे बेहद फलदायी माना जाता है।
- 30 सितंबर, बुधवार: इस दिन तिथि क्षय के कारण चतुर्थी और पंचमी दोनों ही तिथियों का श्राद्ध एक साथ किया जाएगा।
- 1 अक्टूबर, गुरुवार: इस दिन षष्ठी तिथि का श्राद्ध पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न किया जाएगा।
- 2 अक्टूबर, शुक्रवार: आश्विन कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि का श्राद्ध इस दिन निर्धारित किया गया है।
- 3 अक्टूबर, शनिवार: इस दिन अष्टमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।
- 4 अक्टूबर, रविवार: नवमी तिथि के श्राद्ध का अनुष्ठान इस दिन होगा, जिसे मातृ नवमी भी कहा जाता है।
- 5 अक्टूबर, सोमवार: दशमी तिथि के श्राद्ध कर्म इस दिन पूरे किए जाएंगे।
- 6 अक्टूबर, मंगलवार: इस दिन एकादशी तिथि का श्राद्ध संपन्न होगा।
- 7 अक्टूबर, बुधवार: द्वादशी तिथि का श्राद्ध होने के साथ ही इस दिन मघा श्राद्ध का भी विशेष महत्व रहेगा।
- 8 अक्टूबर, गुरुवार: इस दिन त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक किया जाएगा।
- 9 अक्टूबर, शुक्रवार: चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध इस दिन संपन्न होगा।
- 10 अक्टूबर, शनिवार: पितृपक्ष का अंतिम दिन यानी सर्वपितृ अमावस्या होगी, जिस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का तर्पण किया जाएगा।



















