मिर्जापुर में पितृपक्ष का समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए बेहद खास माना जाता है। यदि आप अपने पैतृक स्थान से दूर किसी दूसरे शहर या विदेश में निवास कर रहे हैं और ऐसी स्थिति में अपने पितरों को तर्पण अर्पित करना चाहते हैं, तो यह पूरी जानकारी आपके लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। विंध्यधाम के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य अनुपम महाराज ने घर से बाहर रहते हुए भी तर्पण संपन्न करने के बेहद सरल और प्रभावी तौर-तरीके साझा किए हैं। उनका कहना है कि यदि आप अपने घर पर मौजूद नहीं हैं और पारंपरिक व्यवस्थाओं का अभाव है, तो भी आप अपनी मौजूदा जगह से ही पूरी श्रद्धा के साथ पितरों का स्मरण कर सकते हैं और उनके निमित्त तर्पण दे सकते हैं।
विभिन्न प्रकार के तर्पण और दिशाओं का महत्व
विंध्यधाम के विद्वान आचार्य अनुपम महाराज के अनुसार, यदि व्यक्ति अपने गांव या मूल निवास स्थान पर है, तो वह अपने पुरोहित, गुरु या किसी योग्य ब्राह्मण को आमंत्रित करके विधि-विधान से यह कार्य पूरा करवा सकता है। तर्पण मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित होता है, जिन्हें देव तर्पण, पितृ तर्पण और प्रेत तर्पण के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा ऋषि तर्पण को सबसे उत्तम माना गया है, जिसे उत्तर दिशा की ओर मुख करके किया जाता है। देवताओं को समर्पित देव तर्पण हमेशा पूर्व दिशा की तरफ मुख करके संपन्न किया जाता है। वहीं पितृ और प्रेत तर्पण हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके ही किया जाना चाहिए।
तर्पण करने की विशेष दिशा और पूजन सामग्रियां
पितरों के निमित्त तर्पण करते समय दक्षिण दिशा की ओर मुख रखना आवश्यक होता है और जल में काला तिल मिलाया जाता है, जिसे अंगूठे की तरफ से प्रवाहित किया जाता है। पूर्व दिशा में देवताओं के लिए तर्पण करते वक्त जल में जौ मिलाया जाता है और उसे भाग के अग्रभाग से अर्पित किया जाता है। उत्तर दिशा में किए जाने वाले ऋषि तर्पण में दोनों उंगलियों के मध्य भाग का उपयोग किया जाता है और इसमें अक्षत यानी चावल का प्रयोग किया जाता है। इन सभी छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखकर कोई भी व्यक्ति पूरी शुद्धता के साथ अनुष्ठान को आगे बढ़ा सकता है।
अभाव की स्थिति में बेहद सरल विधि
आचार्य अनुपम महाराज ने स्पष्ट किया कि यदि आपके पास कोई पंडित उपलब्ध नहीं है और किसी भी तरह की बड़ी व्यवस्था करने का साधन नहीं है, तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी परिस्थिति में सुबह के समय स्नान करने के बाद केवल शुद्ध जल लें और अपना मुख दक्षिण दिशा की ओर कर लें। यदि आपके पास जनेऊ उपलब्ध है, तो उसे अपने शरीर पर ऊपर से धारण कर लें। अपसव्य स्थिति अपनाते हुए बाईं करवट रहें और अपने हाथ में जल लेकर अपने माता-पिता या अन्य दिवंगत परिजनों का स्मरण करें।
इसके बाद अपने हाथ में जल लेकर ‘तर्पयामि तर्पयामि’ बोलते हुए और उनका नाम लेते हुए अपनी श्रद्धा के अनुसार तीन, पांच या सात बार जल अर्पित कर दें। इसके साथ ही थोड़ा सा अक्षत हाथ में लेकर अपने पूर्वजों की मंगलकामना करते हुए केवल तीन बार श्री विष्णवे नमः का उच्चारण कर लें। आचार्य का कहना है कि इस आसान सी प्रक्रिया को पूरा करने से पूर्वज अवश्य तृप्त होते हैं और इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं रखना चाहिए।
ब्राह्मण भोजन और दान का महत्व
पितृपक्ष के पूरे पंद्रह दिनों के दौरान रोजाना कम से कम एक ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। यदि पंद्रह दिनों तक ऐसा करना संभव न हो पाए, तो जिस खास तिथि पर आपके घर में श्राद्ध या अनुष्ठान हो, उस दिन पांच, ग्यारह या इक्कीस ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराएं। इस अवसर पर उन्हें सफेद वस्त्र, छाता, कंबल, पहनने के लिए जूते या चप्पल और बर्तन दान में देने चाहिए। ब्राह्मणों को उनकी क्षमता के अनुसार अच्छे से अच्छे कपड़े भेंट करें और अपनी सामर्थ्य के मुताबिक अधिक से अधिक दक्षिणा दें ताकि पूर्वज प्रसन्न हो सकें।
इसके अलावा भोजन बनाते समय कुत्ता, कौवा और गाय के नाम से तीन अलग-अलग हिस्सों में भोजन जरूर निकालना चाहिए। यदि किन्हीं कारणों से ऐसा करना भी संभव न हो पाए, तो मानसिक रूप से उनका ध्यान करते हुए भोजन का एक हिस्सा निकालकर या तो किसी श्वान को या फिर गोमाता को अवश्य खिला देना चाहिए। इन सभी उपायों को अपनाने से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और पितरों का आशीर्वाद हमेशा प्राप्त होता रहता है।



















