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झारखंड और बिहार की सीमा पर सोन नदी के बीच स्थित है प्राचीन दशशीशानाथ महादेव मंदिर, जानें रावण और खरवार राजा प्रताप धवल देव से जुड़ी पौराणिक गाथाधर्म
22 अग॰ 2026, 8:25 am (40 दिन पहले)· 2

झारखंड और बिहार की सीमा पर सोन नदी के बीच स्थित है प्राचीन दशशीशानाथ महादेव मंदिर, जानें रावण और खरवार राजा प्रताप धवल देव से जुड़ी पौराणिक गाथा

पलामू में बिहार और झारखंड की सीमा पर स्थित दशशीशानाथ महादेव मंदिर त्रेतायुग की मान्यताओं और प्राचीन शिलालेखों के लिए प्रसिद्ध है, जहां सावन में भक्त सोन नदी की धारा के बीच शिवलिंग का जलार्पण करते हैं।

झारखंड के पलामू जिले में बिहार और झारखंड की भौगोलिक सीमा पर एक ऐसा अलौकिक शिवधाम स्थित है, जहां भगवान शिव किसी मंदिर के गर्भगृह में नहीं बल्कि सोन नदी की बहती जलधारा के बीच विराजमान हैं। सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही चारों तरफ हर-हर महादेव का जयघोष सुनाई देने लगता है और इस प्राचीन स्थल पर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। दशशीशानाथ महादेव के नाम से विख्यात यह पवित्र स्थान केवल जन-आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि अपने भीतर सदियों पुराना इतिहास और गहरे धार्मिक रहस्य भी समेटे हुए है। वर्षा ऋतु और सावन के दिनों में जब चारों ओर हरियाली और अपार जलराशि होती है, तब भक्तजन नाव के माध्यम से या पानी में पैदल उतरकर भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक करने पहुंचते हैं।

त्रेतायुग से जुड़ा है पौराणिक इतिहास और रावण का संबंध

क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान का इतिहास त्रेतायुग की एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा से गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यान के अनुसार, लंकापति रावण ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था और वरदान स्वरूप शिवलिंग लेकर लंका की ओर प्रस्थान कर रहा था। यात्रा के दौरान जब वह सोन नदी के मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र से गुजर रहा था, तब उसे तीव्र लघुशंका महसूस हुई। रावण ने शिवलिंग को भूमि पर रखने से बचने के लिए वहां मौजूद एक स्थानीय चरवाहे को थोड़ी देर के लिए शिवलिंग पकड़ने की जिम्मेदारी सौंपी। चरवाहे ने भार सहन न कर पाने के कारण शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। जब रावण वापस लौटा और उसने शिवलिंग को पुनः उठाने का प्रयास किया, तो वह अपनी जगह से रत्ती भर भी नहीं हिला। इसके बाद महादेव की इच्छा मानकर शिवलिंग को उसी स्थान पर स्थापित मान लिया गया और तब से भगवान शिव सोन नदी के तटवर्ती क्षेत्र में ही निवास कर रहे हैं।

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दशशीशानाथ महादेव नामकरण के पीछे की मान्यता

स्थानीय निवासियों का कहना है कि दशशीशानाथ महादेव नाम पड़ने के पीछे लंकापति रावण और भगवान शिव के स्वरूप का अनूठा संगम है। रावण दस सिर वाला अर्थात दशशीश था और वह महादेव का अनन्य भक्त माना जाता था। रावण द्वारा इस पावन शिवलिंग की स्थापना किए जाने के कारण इस स्थान के नाम में दशशीश शब्द जुड़ा। दूसरी ओर, भगवान शिव को सभी जीवों का नाथ और भोलेनाथ कहा जाता है। इस प्रकार रावण के दश शीश और भगवान शिव के नाथ स्वरूप को मिलाकर यह पावन धाम दशशीशानाथ महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तीन नदियों का संगम और सोन नदी की मध्य धारा में स्थापना

इस मंदिर स्थल की भौगोलिक बनावट बेहद अद्वितीय और रमणीय है। मंदिर के निकट कोयल नदी, सरस्वती नदी और सनहा नदी की धाराएं आपस में मिलती हैं। इन तीनों नदियों का पवित्र संगम आगे चलकर सोन नदी की मुख्य जलधारा में विलीन हो जाता है। इसी विशाल सोन नदी के बिल्कुल बीचों-बीच भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित है। चारों तरफ से कल-कल बहती नदी की धारा के बीच स्थापित शिवलिंग का दर्शन करना श्रद्धालुओं के लिए एक अद्भुत और अविस्मरणीय धार्मिक अनुभव होता है। सावन के महीने में प्राकृतिक वातावरण और नदी का विहंगम दृश्य इस स्थल की आध्यात्मिक सुंदरता में चार चांद लगा देता है।

प्रकृति द्वारा निरंतर जलाभिषेक और उफनती नदी की आस्था

प्राकृतिक स्थिति के अनुसार, हर साल वर्षा ऋतु के दौरान भारी बारिश के कारण सोन नदी का जलस्तर काफी बढ़ जाता है। वर्ष के कई महीनों तक नदी का जल शिवलिंग को पूरी तरह से अपने आगोश में समेटे रहता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं गंगा मैया निरंतर महादेव का जलाभिषेक कर रही हों। जब मानसून का प्रभाव कम होता है और नदी का जलस्तर घटता है, तब श्रद्धालुओं को शिवलिंग के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त होते हैं। स्थानीय लोगों की अटूट आस्था है कि प्राकृतिक परिस्थितियां और नदी का उफान चाहे कितना भी भीषण क्यों न हो, महादेव का यह पावन स्वरूप अपने स्थान पर सदा अडिग और अचल रहता है।

प्राचीन शिलालेख और खरवार राजा प्रताप धवल देव की वंशावली

दशशीशानाथ महादेव केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्व है। मंदिर परिसर और इसके आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न प्राचीन कालखंडों से संबंधित शिलालेख और पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, यहां खरवार राजा प्रताप धवल देव की वंशावली से जुड़े महत्वपूर्ण लेख अंकित हैं। विभिन्न समय चक्रों में यहां आने वाले राजाओं, महाराजाओं और आम श्रद्धालुओं द्वारा की गई पूजा-अर्चना के साक्ष्य इस बात को सिद्ध करते हैं कि यह स्थान प्राचीन काल से ही एक प्रमुख सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र रहा है।

सावन और महाशिवरात्रि पर उमड़ती है अपार भीड़

सावन के पूरे महीने और महाशिवरात्रि के पर्व पर बिहार तथा झारखंड के कोने-कोने से हजारों की संख्या में भक्त बाबा के दरबार में माथा टेकने आते हैं। नदी के बीच तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु नाव का सहारा लेते हैं या फिर उथले पानी में उतरकर बाबा दशशीशानाथ का जलाभिषेक करते हैं। मन में मन्नत लेकर आने वाले भक्त मन्नत पूरी होने के बाद दोबारा यहां आभार व्यक्त करने पहुंचते हैं। कबरा कला के स्थानीय निवासी लक्ष्मण चौधरी का कहना है कि यह एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध धार्मिक स्थल है, जहां विभिन्न पुरानी लिपियों में लिखे ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं। लोगों का दृढ़ विश्वास है कि जो भी भक्त यहां सच्चे हृदय से प्रार्थना करता है, महादेव उसकी हर मुराद पूरी करते हैं।

सवाल-जवाब

दशशीशानाथ महादेव मंदिर कहां स्थित है?
यह प्राचीन शिव मंदिर झारखंड के पलामू जिले में बिहार और झारखंड की सीमा पर सोन नदी की जलधारा के बीच स्थित है।
दशशीशानाथ महादेव से रावण की क्या कथा जुड़ी है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, लंकापति रावण लंका जाते समय शिव पूजा के लिए शिवलिंग लाया था। सोन नदी क्षेत्र में लघुशंका के दौरान उसने शिवलिंग चरवाहे को दिया, जिसने उसे जमीन पर रख दिया और फिर वह वहां से नहीं हिला।
इस मंदिर का नाम दशशीशानाथ कैसे पड़ा?
दस सिर वाले रावण (दशशीश) द्वारा शिवलिंग की स्थापना किए जाने और भगवान शिव के नाथ स्वरूप के संगम के कारण इसका नाम दशशीशानाथ महादेव पड़ा।
मंदिर के पास किन नदियों का संगम होता है?
मंदिर स्थल के समीप कोयल, सरस्वती और सनहा नदियों की धाराएं आपस में मिलकर सोन नदी में समाहित होती हैं।
इस स्थान पर किस राजा के ऐतिहासिक शिलालेख मिले हैं?
यहाँ खरवार राजा प्रताप धवल देव की वंशावली और विभिन्न प्राचीन लिपियों में लिखे गए शिलालेख मौजूद हैं।
सावन में श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन कैसे करते हैं?
सावन के दौरान जलस्तर अधिक होने पर भक्त नाव के जरिए या पानी में पैदल चलकर सोन नदी के बीच स्थित शिवलिंग का जलार्पण करते हैं।
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