राजस्थान के सिरोही जिले में आबू राज क्षेत्र की अरावली पर्वतमालाओं के बीच कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद हैं। इन्हीं वादियों में स्थित ओमनी का प्राचीन भूतेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। आधुनिक दौर में इस पवित्र धाम को कर्णिकेश्वर महादेव मंदिर के रूप में पहचाना जाता है, हालांकि इसका ऐतिहासिक और मूल नाम भूतेश्वर महादेव ही है। इस नामकरण के पीछे एक खास वजह जुड़ी हुई है। मंदिर परिसर के बिल्कुल पास में एक पुराना श्मशान घाट मौजूद था, जिसके कारण इसे भूतेश्वर नाम मिला। स्थानीय श्रद्धालुओं में यह मान्यता रही है कि रात्रि के समय इस निर्जन क्षेत्र में आत्माओं और भूतों का डेरा रहता था, जिसके खौफ के चलते लोग शाम ढलने के बाद यहां कदम रखने से कतराते थे।
पुराना स्वरूप और 800 साल का इतिहास
क्षेत्र के स्थानीय श्रद्धालु निखिल कुमार के अनुसार, भले ही आज बोलचाल में इसे कर्णिकेश्वर महादेव कहा जाता है, लेकिन इसके ऐतिहासिक गौरव का प्रमाण आज भी मुख्य प्रवेश द्वार पर देखा जा सकता है, जहां प्राचीन नाम भूतेश्वर महादेव स्पष्ट रूप से अंकित है। समूचे स्थल की धार्मिक परंपरा भले ही हजारों साल पुरानी मानी जाती हो, लेकिन मौजूदा मंदिर की संरचना लगभग 700 से 800 वर्ष पुरानी बताई जाती है। समय बीतने के साथ विभिन्न कालों में इस धाम की देखरेख के तहत इसका पुनर्निर्माण और आवश्यक जीर्णोद्धार कार्य संपन्न कराया जाता रहा है, जिससे इसकी प्राचीनता आज भी सुरक्षित है।
जंगल, वन्यजीव और उपेक्षित बावड़ी
मंदिर के ठीक सामने एक प्राचीन बावड़ी और कुछ लघु देवालय स्थित हैं। वर्तमान में नियमित रखरखाव की कमी के चलते ये संरचनाएं जंगली झाड़ियों और वनस्पतियों से घिर चुकी हैं। चूंकि यह संपूर्ण क्षेत्र सघन वन संपदा से आच्छादित है, इसलिए रात होते ही यहां जंगली जानवरों की आवाजाही बढ़ जाती है। परिसर के भीतर कई बार भालुओं के विचरण की घटनाएं सामने आई हैं, जबकि दिन के समय लंगूर और अन्य वन्य प्राणी सहजता से घूमते नजर आ जाते हैं। यह संपूर्ण परिक्षेत्र आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है, क्योंकि इसके निकट ही प्रसिद्ध ऋषिकेश मंदिर और सनका महादेव मंदिर भी स्थापित हैं। इसके अलावा यह पवित्र भूमि जूना अखाड़ा के तपस्वी साधु-संतों की साधना स्थली भी रही है।
पांडवों का अज्ञातवास और स्वयंभू शिवलिंग
मंदिर के मुख्य पुजारी के मुताबिक, इस पावन धाम का ताल्लुक महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। जब पांडव अपने अज्ञातवास की कठिन अवधि गुजार रहे थे, तब उन्होंने इस शांत वन क्षेत्र में विश्राम किया था। उसी ऐतिहासिक दौर में यहां शिवलिंग की स्थापना हुई थी। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित अति प्राचीन मूर्तियों के साथ-साथ स्वयंभू प्रकट हुए शिवलिंग की विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न होती है। इसके अतिरिक्त मुख्य देवालय के समीप ही बने एक छोटे मंदिर में एक प्राकृतिक शिवलिंग भी प्रतिष्ठित है। हर वर्ष श्रावण मास के पावन दिनों और महाशिवरात्रि के महापर्व पर यहां भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।





















