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जीवित्पुत्रिका व्रत में क्यों जरूरी मानी जाती है जीमूतवाहन और चील-सियारिन की पौराणिक कथाधर्म
2 अक्तू॰ 2026, 3:22 pm (46 मिनट पहले)· 0

जीवित्पुत्रिका व्रत में क्यों जरूरी मानी जाती है जीमूतवाहन और चील-सियारिन की पौराणिक कथा

संतान की दीर्घायु और सुखद भविष्य के लिए रखा जाने वाला जितिया व्रत 3 अक्टूबर 2026 को संपन्न होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल की पूजा में जीमूतवाहन और चील-सियारिन की कथा सुने बिना यह अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता।

सनातन धर्म में संतान की खुशहाली, आरोग्य और लंबी उम्र की प्रार्थना के लिए माताओं द्वारा रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत अत्यंत पवित्र और कठिन माना जाता है। वर्ष 2026 में यह उपवास 3 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस दिन उपवास रखने वाली महिलाएं प्रदोष काल के दौरान पूरे विधि विधान के साथ भगवान जीमूतवाहन का अर्चन करती हैं। जितिया के पूरे अनुष्ठान में चील और सियारिन की कथा के साथ-साथ जीमूतवाहन के महान त्याग की पौराणिक कथा सुनने का विशेष धार्मिक विधान है। परंपरा के अनुसार इन पावन प्रसंगों के श्रवण अथवा पाठ के बिना यह व्रत पूर्ण फलदायी नहीं माना जाता, इसी कारण हर व्रती महिला पूजा के समय इन कथाओं का ध्यानपूर्वक श्रवण करती है।

चील और सियारिन की पौराणिक कथा और व्रत के नियम का महत्व

प्राचीन काल की एक कथा के अनुसार किसी घने जंगल में एक चील और एक सियारिन निवास करती थीं। दोनों के बीच बहुत प्रगाढ़ मित्रता थी और वे अक्सर साथ रहा करती थीं। एक दिन उस जंगल के समीप कुछ महिलाएं एकत्र हुईं और वे आपस में जीवित्पुत्रिका व्रत के महात्म्य और उसके नियमों की चर्चा कर रही थीं। उन महिलाओं की बातें सुनकर चील के हृदय में भी अपने मातृत्व भाव के तहत यह व्रत रखने का संकल्प जागा। चील ने तत्काल अपनी घनिष्ठ सखी सियारिन को इस उपवास की जानकारी दी और दोनों ने परस्पर सहमति बनाकर पूर्ण विधि-विधान से जितिया का निर्जला उपवास व पूजन आरंभ किया।

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पूजा अर्चना संपन्न होने के कुछ समय बाद ही दोनों को अत्यंत तीव्र भूख सताने लगी। चील ने अपने आत्मबल और संकल्प के सहारे भूख को सहन करने का भरपूर प्रयास किया और अपने व्रत के नियमों पर अडिग रही। दूसरी तरफ सियारिन भूख की पीड़ा बिल्कुल सहन नहीं कर सकी और उसने अपने धैर्य को खो दिया। भूख के वशीभूत होकर वह चुपचाप वन के भीतर चली गई और वहां शिकार करके मांस का भक्षण कर लिया। जब चील ने अपनी सखी सियारिन को इस प्रकार मांस खाते और व्रत की मर्यादा को भंग करते देखा, तो उसने उसे अत्यंत फटकार लगाई और बहुत डांटा। इस कृत्य के चलते सियारिन का जीवित्पुत्रिका व्रत खंडित हो गया, जबकि चील ने संयम और निष्ठा का परिचय देते हुए अपने व्रत को सफलतापूर्वक पूरा किया।

पूर्व जन्म का फल और बहनों का नया जन्म

कालचक्र बीतने के बाद अगले जन्म में वे दोनों आत्माएं दो सगी बहनों के रूप में उत्पन्न हुईं। पूर्व जन्म की सियारिन का विवाह एक संपन्न राजघराने के राजकुमार से हुआ और वह राजमहल की रानी बनी, जबकि पूर्व जन्म की चील का विवाह उसी राज्य के राजमंत्री के सुपुत्र के साथ संपन्न हुआ। कुछ समय पश्चात राजमहल में रानी बनी सियारिन ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। दुर्भाग्यवश जन्म के कुछ ही दिनों के उपरांत उस बालक की मृत्यु हो गई। इसके बाद जब भी उसके यहां संतान पैदा होती, वह जीवित नहीं बचती थी।

दूसरी ओर मंत्री पुत्र की पत्नी बनी चील ने भी एक पुत्र को जन्म दिया। चील का पुत्र पूरी तरह स्वस्थ, बलवान और दीर्घायु रहा। अपनी बहन के आंगन में खेलते स्वस्थ बालक को देखकर और अपने सूने घर को निहारकर सियारिन के मन में भीषण ईर्ष्या और द्वेष की भावना जाग उठी। जलन की आग में अंधी होकर सियारिन ने अपनी बहन के पुत्र और उसके पति दोनों को समाप्त करने के लिए कई षड्यंत्र रचे और उन्हें मरवाने की गुप्त योजना बनाई। ईश्वर की कृपा और पूर्व जन्म के पुण्यों के प्रभाव से चील के पति और पुत्र दोनों हर संकट से सकुशल बच गए और षड्यंत्र विफल हो गए।

देवी का स्वप्न संदेश और क्षमा याचना

एक रात्रि जब सियारिन अपनी संतानों के वियोग और ईर्ष्या के दुख में सो रही थी, तब साक्षात देवी मां उसके स्वप्न में प्रकट हुईं। देवी ने उससे कहा कि यह सब तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों का ही दुष्परिणाम है। तुमने पूर्व जन्म में चील के साथ जितिया का संकल्प लिया था किंतु भूख के आगे घुटने टेककर मांस खा लिया था और व्रत को खंडित कर दिया था। उसी पाप कर्म के प्रभाव से तुम्हारी कोई भी संतान जीवित नहीं रह पाती। देवी ने समाधान बताते हुए कहा कि यदि तुम अपनी इस दुर्दशा से मुक्ति पाना चाहती हो और संतान सुख की कामना रखती हो, तो सच्चे अंतःकरण से पुनः जितिया का व्रत धारण करो।

प्रातःकाल जागने पर सियारिन ने अपने इस स्वप्न का पूरा विवरण अपने पति को सुनाया। उसके पति ने उसे अपनी भूल सुधारने और अपनी बहन के पास जाकर क्षमा मांगने का सुझाव दिया। सियारिन तत्काल अपनी बहन चील के पास पहुंची और अपने पिछले द्वेष व षड्यंत्रों के लिए फूट-फूटकर रोते हुए क्षमा याचना करने लगी। चील ने अपनी बहन के सच्चे पश्चाताप को देखा तो उसका हृदय पिघल गया और उसने उसे सहर्ष क्षमा कर दिया। इसके बाद जब अगला जीवित्पुत्रिका व्रत आया, तब दोनों बहनों ने एक साथ मिलकर पूरे आदर, निष्ठा और संयम के साथ जितिया का उपवास रखा। माता जितिया के दिव्य आशीर्वाद से सियारिन को पुनः एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके उपरांत दोनों बहनें प्रेमपूर्वक और सुख-शांति के साथ अपना जीवन व्यतीत करने लगीं।

भगवान जीमूतवाहन का आत्मबलिदान और नागवंश की रक्षा

जीवित्पुत्रिका व्रत की दूसरी सबसे प्रमुख कथा धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी हुई है। जब जीमूतवाहन के पिता वृद्धावस्था में पहुंचे, तो उन्होंने राजकाज और सांसारिक वैभव का परित्याग कर वानप्रस्थ आश्रम में जाने का निर्णय किया। उस समय जीमूतवाहन के भीतर राजसिंहासन प्राप्त करने अथवा राजभोग का आनंद लेने की कोई अभिलाषा नहीं थी। उन्होंने संपूर्ण राज्य का कार्यभार अपने अन्य भाइयों को सौंप दिया और स्वयं अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा सुश्रूषा करने के उद्देश्य से वन की ओर प्रस्थान कर गए। वन में रहते हुए उनका विवाह मलयवती नाम की एक राजकन्या से हुआ।

एक दिन भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन वन के एक एकांत मार्ग से जा रहे थे, तभी उन्हें एक वृद्ध स्त्री के अत्यंत करुण विलाप और रोने की ध्वनि सुनाई दी। दयालु जीमूतवाहन उसके निकट पहुंचे और उससे उसके रोने का कारण पूछा। बातचीत के दौरान उन्हें ज्ञात हुआ कि वह वृद्ध महिला नागवंश से संबंध रखती है। वृद्धा ने अत्यंत व्यथित होकर बताया कि नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत पक्षियों के राजा गरुड़ को प्रतिदिन भोजन के रूप में नाग जाति की ओर से एक नाग की बलि दी जाती है। वृद्धा ने रोते हुए कहा कि आज समझौते के अनुसार उसके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बलि देने की बारी आ गई है, जिससे वह अपने कुल के दीपक को खोने वाली है।

गरुड़ राज का हृदय परिवर्तन और व्रत का आरंभ

वृद्ध माता के विलाप और पुत्र-मोह की पीड़ा को देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उस नाग माता को ढांढस बंधाया और वचन दिया कि वे उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं अपने प्राणों की बलि दे देंगे। इसके पश्चात जीमूतवाहन ने शंखचूड़ से वह लाल वस्त्र प्राप्त किया जो बलि दिए जाने वाले नाग को ओढ़ाया जाता था। लाल कपड़े में स्वयं को ढंककर जीमूतवाहन उस वध-शिला पर जाकर लेट गए जहां गरुड़ अपने शिकार को उठाने आते थे।

नियत समय पर पक्षीराज गरुड़ आकाश मार्ग से वहां पहुंचे। लाल वस्त्र में लिपटे जीव को देखकर उन्होंने उसे नाग समझकर अपने तीक्ष्ण पंजों में दबा लिया और ऊंची पहाड़ी की चोटी की ओर उड़ चले। गरुड़ के पंजों की भीषण पीड़ा के कारण जब जीमूतवाहन के मुख से कराहने और वेदना की ध्वनि निकली, तब गरुड़ चकित रह गए क्योंकि सामान्यतः नाग चीखते नहीं थे बल्कि भयभीत रहते थे। गरुड़ ने रुककर ध्यान से देखा और जीमूतवाहन से उनका वास्तविक परिचय पूछा कि वे कौन हैं और नागों के वध स्थल पर लाल वस्त्र ओढ़कर क्यों उपस्थित हुए हैं।

जीमूतवाहन ने बिना किसी संकोच के पक्षीराज गरुड़ को नाग माता के विलाप, अपने दिए वचन और शंखचूड़ की रक्षा के लिए किए गए अपने संकल्प की संपूर्ण सत्य गाथा सुना दी। एक सर्वथा अपरिचित प्राणी के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को अर्पित कर देने वाले जीमूतवाहन के इस अप्रतिम साहस, असीम करुणा और परोपकारी त्याग को देखकर गरुड़ राज अत्यंत प्रभावित और प्रसन्न हुए। गरुड़ राज ने न केवल जीमूतवाहन के शरीर को मुक्त करते हुए उन्हें नवजीवन का वरदान दिया, बल्कि यह प्रतिज्ञा भी की कि भविष्य में वे कभी भी किसी भी नाग की बलि नहीं लेंगे और नागों पर अत्याचार नहीं करेंगे। जनश्रुति और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी ऐतिहासिक और त्यागपूर्ण प्रसंग के उपरांत माताओं द्वारा अपनी संतानों के संकटों से बचाव के लिए भगवान जीमूतवाहन की आराधना और जीवित्पुत्रिका व्रत करने की अटूट परंपरा आरंभ हुई।

सवाल-जवाब

वर्ष 2026 में जितिया व्रत किस तारीख को रखा जाएगा?
वर्ष 2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर को रखा जाएगा।
जितिया व्रत में किस देवता की पूजा की जाती है?
इस पावन व्रत में प्रदोष काल के दौरान भगवान जीमूतवाहन की विधि विधान से पूजा की जाती है।
चील और सियारिन की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
इस कथा से शिक्षा मिलती है कि उपवास के दौरान भूख या प्रलोभन में आकर व्रत की मर्यादा नहीं तोड़नी चाहिए, क्योंकि सियारिन का व्रत टूटने से उसे कष्ट झेलने पड़े थे।
भगवान जीमूतवाहन ने किसका जीवन बचाने के लिए स्वयं को अर्पित किया था?
भगवान जीमूतवाहन ने नागवंश की वृद्धा के पुत्र शंखचूड़ के प्राणों की रक्षा के लिए गरुड़ के समक्ष अपना बलिदान देने का निर्णय लिया था।
क्या जितिया व्रत में कथा सुनना अनिवार्य है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीमूतवाहन और चील-सियारिन की कथा सुने बिना जीवित्पुत्रिका का व्रत अधूरा माना जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

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