संतान की लंबी आयु, बेहतर स्वास्थ्य और जीवन में आने वाले संकटों से रक्षा की कामना के साथ रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत इस वर्ष 2 अक्टूबर से आरंभ हो रहा है। सनातन परंपरा में माताओं द्वारा रखा जाने वाला यह उपवास बेहद कठिन माना जाता है, जिसमें लगभग चौबीस घंटे से अधिक समय तक बिना अन्न और जल के रहना होता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान का समापन 4 अक्टूबर को पारण के साथ होगा। मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के कुछ इलाकों में यह पर्व अपार निष्ठा और विधि-विधान से मनाया जाता है।
जितिया व्रत 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 3 अक्टूबर को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर होगी। यह तिथि अगले दिन 4 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 51 मिनट तक प्रभावी रहेगी। शास्त्रों में उदयातिथि की महत्ता होने के कारण निर्जला व्रत 3 अक्टूबर दिन शनिवार को ही रखा जाएगा।
प्रयागराज की पंडित शिप्रा सचदेव के अनुसार पर्व की समय-सारणी इस प्रकार निर्धारित है
- प्रथम दिन (2 अक्टूबर, शुक्रवार): नहाय-खाय के साथ तीन दिवसीय अनुष्ठान का आरंभ।
- द्वितीय दिन (3 अक्टूबर, शनिवार): उदयातिथि के अनुसार पूरे दिन और रात का निर्जला व्रत तथा भगवान जीमूतवाहन का विधिवत पूजन।
- तृतीय दिन (4 अक्टूबर, रविवार): नवमी तिथि में सुबह 7 बजकर 32 मिनट के उपरांत पारण के साथ व्रत की पूर्णता।
पर्व का आरंभ: नहाय-खाय की परंपरा
तीन दिवसीय इस व्रत का पहला चरण नहाय-खाय कहलाता है, जो 2 अक्टूबर दिन शुक्रवार को पड़ रहा है। इस दिन महिलाएं सुबह सवेरे उठकर पवित्र नदियों या जलाशयों में स्नान करती हैं अथवा घर पर ही शुद्ध जल से स्नान-ध्यान संपन्न करती हैं। स्नान के पश्चात पूरी सात्विकता के साथ भोजन बनाया और ग्रहण किया जाता है। कई आंचलिक क्षेत्रों में इस दिन कद्दू-भात बनाने और खाने का विशेष विधान प्रचलित है। नहाय-खाय का मूल उद्देश्य शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ अगले दिन के अत्यंत कठिन और निर्जला उपवास के लिए मानसिक रूप से तैयार होना है।
भगवान जीमूतवाहन की आराधना और निर्जला उपवास
पर्व का दूसरा और सबसे अहम दिन 3 अक्टूबर दिन शनिवार को होगा। इस दिन व्रत रखने वाली माताएं सुबह संकल्प लेकर चौबीस घंटे से भी अधिक समय तक अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती हैं। यह कठोर तपस्या संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए की जाती है।
शाम के समय यानी प्रदोष काल में विशेष पूजा का आयोजन होता है। इस दौरान भगवान जीमूतवाहन का पूरे विधि-विधान से स्मरण किया जाता है। महिलाएं एकत्र होकर समूह में भगवान जीमूतवाहन की पावन कथा का श्रवण करती हैं और अपने बच्चों की दीर्घायु तथा सुरक्षा का आशीष मांगती हैं। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार पूरी श्रद्धा से इस व्रत को करने पर संतानों के जीवन में आने वाली हर बाधा दूर होती है।
पारण का समय और व्रत का समापन
कठिन निर्जला तप के उपरांत व्रत का समापन 4 अक्टूबर दिन रविवार को नवमी तिथि में होगा। पंडित शिप्रा सचदेव ने बताया कि सूर्योदय के पश्चात पारण का शुभ समय सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद तय है। इस निर्धारित समय के पश्चात ही माताएं पूजा संपन्न कर अन्न और जल ग्रहण करेंगी, जिससे यह तीन दिवसीय पावन अनुष्ठान पूर्ण होगा।

















