धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में पहचानी जाने वाली शिव नगरी काशी में मोक्ष प्राप्ति के लिए सदियों से श्रद्धालुओं का तांता लगता रहा है। इस प्राचीन नगरी में केवल जीवित व्यक्तियों के कल्याण की ही व्यवस्था नहीं है, बल्कि भटकती आत्माओं, प्रेत बाधाओं और पिशाच योनि में फंसे पूर्वजों को मुक्ति दिलाने के लिए भी एक विशेष तीर्थ सदियों से आस्था का केंद्र बना हुआ है। पितृ पक्ष की पंद्रह दिवसीय अवधि में इस स्थान का महत्व कई गुना बढ़ जाता है, जहां लोग अपने पूर्वजों की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और विशेष कर्मकांड संपन्न कराने दूर-दराज से पहुंचते हैं। सामान्य दिनों में भी इस पवित्र परिसर में श्राद्ध की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, लेकिन पितृ पक्ष के दौरान यहां का माहौल पूरी तरह अनुष्ठानिक आस्था में लीन नजर आता है।
बाबा विश्वनाथ दरबार से तीन किलोमीटर दूर स्थित है पावन कुंड
काशी के मुख्य आध्यात्मिक केंद्र बाबा विश्वनाथ मंदिर से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर यह ऐतिहासिक पिशाच मोचन तीर्थ अवस्थित है, जिसे पौराणिक संदर्भों में विमल तीर्थ के नाम से भी पुकारा जाता है। धार्मिक इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव के अनन्य उपासक कपर्दी ने इस स्थल की नींव रखी थी। उनकी अत्यंत कठोर तपस्या और साधना के फलस्वरूप ही यहां कपर्दीश्वर महादेव का प्राकट्य हुआ था। इस तीर्थ की महत्ता से जुड़ा एक प्रसंग यह भी है कि महर्षि वाल्मीकि के निर्देश पर एक ब्राह्मण को, जो अपने पूर्व जन्म के कर्मफलों के चलते प्रेत योनि का कष्ट भुगत रहा था, इसी स्थान पर आकर मुक्ति प्राप्त हुई थी।
गंगा के आगमन से भी पुराना माना जाता है इस स्थल का इतिहास
इस कुंड की महिमा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विस्तृत उल्लेख काशी खंडोक्त के साथ-साथ गरुड़ पुराण में भी प्रमुखता से मिलता है। तीर्थ के पुरोहित मुन्ना महाराज के अनुसार, इस पवित्र कुंड का अस्तित्व काशी की धरती पर मां गंगा के अवतरण से भी पहले का माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस पूरे भूभाग पर पिशाच मोचन कुंड वह अनूठा स्थल है जहां पितरों के निमित्त त्रिपंडी श्राद्ध और पिंडदान संपन्न करने से उन्हें भटकती प्रेत योनि से स्थाई छुटकारा मिलता है। परिवार में जिन लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है, उनके उद्धार के लिए इस तीर्थ पर विशेष रूप से नारायण बलि और त्रिपंडी श्राद्ध कराने की परंपरा है, जिससे उनकी आत्मा की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
गया तीर्थ के समान माना जाता है काशी का यह मोक्ष धाम
पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति अनुष्ठानों के संदर्भ में बिहार के गया तीर्थ के बाद काशी के इस स्थान को देश का सबसे प्रमुख और पावन केंद्र स्वीकार किया गया है। पितृ पक्ष के पंद्रह दिनों के दौरान विभिन्न राज्यों से प्रतिदिन लगभग 25 से 30 हजार श्रद्धालु यहां तर्पण और श्राद्ध क्रिया संपन्न करने पहुंचते हैं। यह तीर्थ मुख्य रूप से पितृ दोष, ब्रह्म दोष और प्रेत योनि से पीड़ित आत्माओं के निवारण के लिए ख्याति प्राप्त है।
भगवान विष्णु के वरदान से जुड़ी पौराणिक कथा
पिशाच योनि से मुक्ति का द्वार खोलने वाले इस पौराणिक कुंड को लेकर कई आध्यात्मिक गाथाएं लोकमानस में रची-बसी हैं। बैकुंठ के अधिपति श्री हरि विष्णु से जुड़ा एक प्रमुख आख्यान बताता है कि स्वयं भगवान विष्णु ने इस सरोवर को पिशाच मोचन का दिव्य वरदान प्रदान किया था। इस वरदान के प्रभाव से यह मान्यता स्थापित हुई कि जो भी भक्त सच्चे और निष्कपट भाव से इस कुंड के पावन जल में स्नान करता है, उसके पितरों से संबंधित सभी प्रकार के दोष, बाधाएं और कष्ट सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं।



















