वैदिक ज्योतिष और सनातन परंपरा में शरद पूर्णिमा के पर्व को विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का दिन स्वीकार किया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वर्ष भर में केवल इसी एक तिथि पर चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर पृथ्वी के सबसे निकट होता है। पौराणिक आख्यानों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस पावन रात्रि में चंद्रमा की किरणों से पृथ्वी पर साक्षात अमृत रस बरसता है। चंद्रमा के इस असाधारण रूप से बलशाली और तेजस्वी स्वरूप के कारण यह तिथि जन्मपत्रिका में उपस्थित चंद्र दोष के निवारण हेतु सबसे अधिक प्रभावशाली मानी गई है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा का यह महत्वपूर्ण अवसर 25 अक्टूबर 2026 को पड़ रहा है, जिस दिन विशेष धार्मिक क्रियाएं संपन्न करके अशुभ प्रभावों को दूर किया जा सकता है।
जन्म कुंडली में चंद्र दोष के निर्माण के ज्योतिषीय आधार
ज्योतिषीय गणना के अनुसार मनुष्य के मन, भावनाओं और मानसिक शांति का सीधा संबंध चंद्रमा से होता है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा किसी प्रतिकूल ग्रह संयोग में फंस जाता है, तो वहां चंद्र दोष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह दोष मुख्य रूप से तब निर्मित होता है जब चंद्रमा शनि, राहु अथवा केतु जैसे क्रूर और पापी ग्रहों के साथ एक ही भाव में युति बनाकर बैठ जाए। इसके अतिरिक्त यदि इन क्रूर ग्रहों की सीधी दृष्टि भी चंद्रमा पर पड़ रही हो, तब भी चंद्र पीड़ा का सामना जातक को करना पड़ता है।
चंद्रमा के कमजोर होने का एक बड़ा कारण उसकी राशिगत स्थिति भी होती है। चंद्रमा जब अपनी नीच राशि वृश्चिक में संचरण करता है, तो वह अपने शुभ फल देने की क्षमता खो बैठता है और यह स्थिति चंद्र दोष का बड़ा कारण बन जाती है। इसके साथ ही ज्योतिष का अत्यंत चर्चित केमद्रुम योग भी चंद्र दोष की श्रेणी में आता है। केमद्रुम योग उस समय बनता है जब चंद्रमा के आगे वाले यानी दूसरे भाव और पीछे वाले यानी बारहवें भाव में कोई भी शुभ या अशुभ ग्रह उपस्थित न हो, तथा किसी भी अन्य ग्रह की दृष्टि भी चंद्रमा पर न पड़ रही हो। इस एकाकी अवस्था के कारण जातक को जीवन में विभिन्न अभावों का सामना करना पड़ता है।
चंद्र दोष के जातक के जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव
कुंडली में चंद्रमा के पीड़ित होने पर व्यक्ति को सबसे अधिक मानसिक और भावनात्मक स्तर पर कष्ट सहने पड़ते हैं। ऐसा व्यक्ति अक्सर अत्यधिक मानसिक अस्थिरता, घबराहट और अकारण उपजे भय से ग्रस्त रहता है। उसकी उचित समय पर सही निर्णय लेने की स्वाभाविक क्षमता काफी कमजोर हो जाती है, जिससे उसे हर क्षेत्र में भटकाव देखना पड़ता है।
ज्योतिष में चंद्रमा को माता का स्वाभाविक कारक ग्रह माना गया है, इसलिए चंद्र दोष के प्रभाव से जातक के अपनी माता के साथ संबंध तनावपूर्ण हो जाते हैं या फिर माता के स्वास्थ्य को लेकर निरंतर परेशानियां बनी रहती हैं। इसके साथ ही व्यक्ति को धन के ठहराव में बाधा आती है और निरंतर आर्थिक उतार चढ़ाव तथा वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
शरद पूर्णिमा की रात चंद्र शांति के पांच प्रमुख उपाय
शरद पूर्णिमा की शुभ बेला पर किए गए उपाय पीड़ित चंद्रमा को बलवान बनाकर जीवन की नकारात्मकता को दूर करने में सहायक सिद्ध होते हैं। इसके लिए शास्त्रों में पांच प्रमुख कर्म बताए गए हैं।
प्रथम उपाय के रूप में इस पावन रात्रि को मंत्र जप का विधान है। व्यक्ति को रात के समय जब चंद्रमा पूर्ण रूप से आकाश में प्रकाशित हो, तब उसकी धवल चांदनी में बैठकर 'ॐ सोम सोमाय नमः' अथवा तांत्रिक मंत्र 'ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः' का श्रद्धापूर्वक जप करना चाहिए। चंद्रमा की शीतल रोशनी में मंत्र का उच्चारण करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और चंद्र दोष की प्रतिकूलता समाप्त होती है।
दूसरा उपाय चंद्र यंत्र की स्थापना से जुड़ा है। शरद पूर्णिमा के दिन घर के पूजन स्थल में विधिवत चंद्र यंत्र स्थापित करना अत्यधिक मंगलकारी माना जाता है। इस यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा और नियमित पूजा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और व्यक्ति को जीवन के विभिन्न संकटों से छुटकारा मिलता है।
तीसरे उपाय में दान कर्म का विधान आता है। शरद पूर्णिमा की तिथि पर चंद्रमा से संबंधित श्वेत वस्तुओं का दान करना चाहिए। जातक को सफेद चावल, शुद्ध दूध, चीनी और सफेद वस्त्रों का दान किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक अर्पित करना चाहिए। श्वेत पदार्थों के दान से चंद्रमा की अनुकूलता शीघ्र प्राप्त होती है।
चौथा उपाय चंद्रमा को अर्घ्य देने का है। रात्रि के समय एक स्वच्छ लोटे में शुद्ध जल भरें और उसमें थोड़ा कच्चा दूध तथा अक्षत यानी साबुत चावल के दाने मिला लें। इसके पश्चात खुले आकाश के नीचे खड़े होकर चंद्रमा की ओर मुख करके श्रद्धा भाव से यह अर्घ्य अर्पित करें। यह साधारण सा दिखने वाला अर्घ्य कुंडली में चंद्रमा की स्थिति को तत्काल बलवान बनाता है और जीवन में शुभ फलों की वृद्धि करता है।
पांचवां और अत्यंत फलदायी उपाय भगवान शिव की आराधना है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा भगवान देवाधिदेव महादेव के अनन्य भक्त हैं और शिव जी ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर रखा है। अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान शिव का विधिवत पूजन करना और उनके पंचाक्षरी अथवा अन्य कल्याणकारी मंत्रों का निरंतर जप करना चंद्र दोष के समस्त बुरे प्रभावों को पूरी तरह समाप्त कर देता है।



















