सनातन धर्म में त्रयोदशी तिथि पर पड़ने वाले प्रदोष व्रत को अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में यह उपवास 23 अक्टूबर, शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। शुक्रवार के संयोग से इस व्रत को शुक्र प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती की आराधना करने से साधक के दांपत्य जीवन में मधुरता आती है, पारिवारिक अशांति दूर होती है और व्यापार में तरक्की के नए रास्ते खुलते हैं।
त्रयोदशी तिथि का विस्तार और व्रत की तिथि
पंचांग गणना के मुताबिक, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 23 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 36 मिनट पर होगा। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 24 अक्टूबर, शनिवार को दोपहर 1 बजकर 37 मिनट पर होगा। वैदिक धर्मग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र के नियमों के अनुसार, प्रदोष व्रत उसी दिन मान्य होता है जिस दिन सूर्यास्त के बाद का समय अर्थात प्रदोष काल त्रयोदशी तिथि में पड़ता हो। 23 अक्टूबर की संध्या वेला में त्रयोदशी तिथि उपस्थित रहेगी, जिसके चलते शुक्र प्रदोष का उपवास 23 अक्टूबर को ही विधिपूर्वक रखा जाएगा।
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त और कुल समय
प्रदोष व्रत में मुख्य आराधना संध्या काल में की जाती है, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है। 23 अक्टूबर को भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना के लिए सबसे अनुकूल समय शाम 5 बजकर 43 मिनट से लेकर रात्रि 8 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालुओं को विधिवत अर्चना करने के लिए कुल 2 घंटे 33 मिनट की शुभ अवधि प्राप्त होगी। इस निर्धारित समयावधि में मंत्र जप, रुद्राभिषेक और स्तुति पाठ करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
शुक्र प्रदोष व्रत की संपूर्ण पूजा विधि
इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दिन की शुरुआत करनी चाहिए। स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन को शांत रखें। पूजा के कमरे अथवा घर के ईशान कोण को अच्छी तरह साफ करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी स्थापित करके उस पर लाल या पीले रंग का नया वस्त्र बिछाएं। चौकी पर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर को आदरपूर्वक विराजित करें। पवित्र गंगाजल का छिड़काव करते हुए पूरे श्रद्धा भाव से व्रत का संकल्प लें।
प्रतिमा पर ताजे सुगंधित पुष्प, बेलपत्र और पुष्पमाला अर्पित करें। घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित कर देवताओं का आह्वान करें। पूरे दिन अन्न का त्याग करते हुए व्रत के नियमों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करें। शाम के समय पुनः स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें और पूजा की तैयारी करें। भक्त चाहें तो शिवालय जाकर या फिर घर के पूजा स्थल पर ही अनुष्ठान कर सकते हैं। शिवलिंग पर गाय के कच्चे दूध, दही, शक्कर, शहद और शुद्ध देसी घी का अभिषेक करें, जिसे पंचामृत स्नान कहा जाता है।
अभिषेक के पश्चात भगवान भोलेनाथ को चंदन, अक्षत और बेलपत्र अर्पित करें तथा माता पार्वती को चुनरी व शृंगार सामग्री भेंट करें। इसके बाद शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें और शुक्र प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा का पाठ करें या श्रवण करें। अंत में कर्पूर अथवा घी के दीपक से शिव जी और माता पार्वती की मंगल आरती करें तथा प्रसाद वितरण करके पूजा का समापन करें।
दिन के चौघड़िया मुहूर्त का विवरण
पूजा और अन्य शुभ संकल्पों के लिए दिन के चौघड़िया मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे
- चर (सामान्य): प्रातः 06:27 बजे से प्रातः 07:51 बजे तक
- लाभ (उन्नति): प्रातः 07:51 बजे से प्रातः 09:16 बजे तक
- अमृत (सर्वोत्तम): प्रातः 09:16 बजे से प्रातः 10:41 बजे तक (वार वेला)
- काल (अशुभ): प्रातः 10:41 बजे से दोपहर 12:05 बजे तक (काल वेला / राहुकाल)
- शुभ (उत्तम): दोपहर 12:05 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक
- रोग (हानिकारक): दोपहर 01:30 बजे से दोपहर 02:54 बजे तक
- उद्वेग (कष्टप्रद): दोपहर 02:54 बजे से शाम 04:19 बजे तक
- चर (सामान्य): शाम 04:19 बजे से शाम 05:44 बजे तक
रात्रि के चौघड़िया मुहूर्त की समय सारणी
शाम और रात्रि के समय पड़ने वाले चौघड़िया की सूची इस प्रकार है
- रोग (हानिकारक): शाम 05:44 बजे से शाम 07:19 बजे तक
- काल (अशुभ): शाम 07:19 बजे से रात्रि 08:55 बजे तक
- लाभ (उन्नति): रात्रि 08:55 बजे से रात्रि 10:30 बजे तक (काल रात्रि)
- उद्वेग (कष्टप्रद): रात्रि 10:30 बजे से मध्यरात्रि 12:06 बजे तक (24 अक्टूबर)
- शुभ (उत्तम): मध्यरात्रि 12:06 बजे से देर रात 01:41 बजे तक (24 अक्टूबर)
- अमृत (सर्वोत्तम): देर रात 01:41 बजे से तड़के 03:16 बजे तक (24 अक्टूबर)
- चर (सामान्य): तड़के 03:16 बजे से सुबह 04:52 बजे तक (24 अक्टूबर)
- रोग (हानिकारक): सुबह 04:52 बजे से सुबह 06:27 बजे तक (24 अक्टूबर)



















