शारदीय नवरात्र के सातवें दिन शनिवार को पूरे देश में मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की श्रद्धा और नियम के साथ आराधना की जाती है। इस पावन तिथि पर मां कालरात्रि और महाकाली का विशेष अनुग्रह पाने के लिए मध्यरात्रि में संपन्न होने वाली निशा पूजा की विशेष महत्ता मानी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रात्रि के इस खास पहर में पराशक्ति और दैवीय ऊर्जा का प्रभाव अपने चरम पर होता है। यही कारण है कि श्रद्धालु इस कालखंड में देवी के उग्र और प्रचंड रूप की उपासना कर उनका आशीर्वाद मांगते हैं। तांत्रिक परंपरा में भी यह समय विशेष अनुष्ठानों और गुप्त साधनाओं के लिए सर्वोपरि माना गया है, जिससे साधक को आंतरिक सामर्थ्य और अभय की प्राप्ति होती है।
काल और अंधकार के नाश का प्रतीक स्वरूप
नवरात्रि की सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है। नाम के अर्थ पर विचार करें तो 'काल' का तात्पर्य समय तथा मृत्यु से है, जबकि 'रात्रि' अंधकार को दर्शाती है। इस प्रकार मां कालरात्रि की आराधना जीवन के गहरे अज्ञान, आंतरिक भय और नकारात्मक ऊर्जाओं को जड़ से मिटाने वाली मानी जाती है। पौराणिक आख्यानों के मुताबिक, देवी ने रक्तबीज और चंड-मुंड जैसे महाबली दैत्यों का संहार किया था। मान्यता है कि इस रात्रि में पूजन करने से साधक के समस्त शत्रु परास्त होते हैं और जीवन की कठिन विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं। ज्योतिषीय और धार्मिक दृष्टि से मां कालरात्रि का सीधा संबंध न्याय के अधिपति शनि ग्रह से भी जोड़ा जाता है। इनकी उपासना करने से शनि ग्रह से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों और जीवन के कष्टों से राहत मिलती है।
निशीथ काल में चार घंटे की साधना और स्वरूप
धार्मिक परंपरा के अनुसार, आधी रात यानी निशीथ काल के गहरे सन्नाटे में की जाने वाली यह निशा पूजा लगभग 4 घंटे तक चलती है। इस कालखंड में की गई आराधना साधक को मानसिक स्थिरता, अदम्य साहस और सहस्रार चक्र को जाग्रत करने की दिशा में अग्रसर करती है। मां कालरात्रि का रूप अत्यंत उग्र, रौद्र और प्रभावशाली चित्रित किया गया है। वे गर्दभ यानी गधे की सवारी करती हैं, उनके केश खुले व बिखरे रहते हैं और जिह्वा बाहर निकली हुई दिखाई देती है। रूप उग्र होने के बाद भी वे अपने सच्चे भक्तों को सदैव शुभ, मंगलकारी और अभय फल प्रदान करती हैं, जिसके कारण उन्हें 'शुभंकारी' के नाम से भी पुकारा जाता है।
पूजन सामग्री, मंत्र और प्रतीकात्मक बलि का विधान
निशा पूजा के दौरान देवी कालरात्रि को रात्रि में खिलने वाले सुगंधित पुष्प, गुड़ और गुड़ से निर्मित पारंपरिक पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है। साथ ही देवी को संपूर्ण शृंगार सामग्री चढ़ाई जाती है। तांत्रिक और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों में इस रात्रि सांकेतिक एवं पारंपरिक बलि देने की सुदीर्घ परंपरा रही है। इस बलि विधान में किसी जीव को क्षति नहीं पहुंचाई जाती, बल्कि पेठा (कूष्मांड), नारियल अथवा अन्य पारंपरिक वस्तुओं की सांकेतिक बलि दी जाती है। इस अनुष्ठान का मूल उद्देश्य साधक के भीतर और आसपास व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्तियों की आहुति देकर स्वयं को शुद्ध करना होता है। संपूर्ण साधना के दौरान देवी के बीज मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः' का निरंतर और एकाग्रता से जाप किया जाता है।
देशभर के प्रमुख शक्तिपीठों और सिद्ध मंदिरों में आयोजन
महासप्तमी की रात्रि को देश के कई ऐतिहासिक और सिद्ध देवी शक्तिपीठों में निशा पूजा का भव्य अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। पश्चिम बंगाल के विभिन्न कालीबाड़ी मंदिरों और तारापीठ जैसे महातीर्थों में यह पूजन अत्यंत श्रद्धा से होता है। इसी प्रकार पूर्वोत्तर में असम स्थित कामाख्या मंदिर और त्रिपुरा के उदयपुर में स्थित मां त्रिपुरेश्वरी मंदिर में साधक तंत्र और वैदिक दोनों परंपराओं से निशा पूजा करते हैं। बिहार में यह अनुष्ठान गोपालगंज के थावे भवानी मंदिर, गया के मां मंगलागौरी मंदिर, मुजफ्फरपुर के मां कोटेश्वरी देवी मंदिर व बगलामुखी मंदिर, बेतिया के काली बाग मंदिर तथा मधुबनी के जयदुर्गा मंदिर में पूरी निष्ठा से किया जाता है। उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के कौशकी देवी मंदिर और कुशीनगर के मां केटेश्वरी देवी मंदिर में भी मध्यरात्रि की निशा पूजा संपन्न होती है। राजस्थान के जयपुर में स्थित आमेर महल के शिला माता मंदिर में भी महासप्तमी की रात विशेष पूजन की परंपरा निभाई जाती है।



















