देवभूमि के रूप में विख्यात कुल्लू घाटी अपनी अनूठी और प्राचीन धार्मिक परंपराओं के लिए पूरे देश में जानी जाती है। भगवान रघुनाथ के इस पावन केंद्र पर पहुंचने के बाद से ही यहां राम नवमी और कृष्ण जन्मोत्सव से जुड़े विभिन्न पर्व खासे उल्लास और गहरी श्रद्धा के साथ मनाए जाते हैं। इन्हीं आयोजनों में से एक प्रमुख परंपरा केसर डोल की है, जिसे हर साल कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रघुनाथ मंदिर के प्रांगण में संपन्न किया जाता है। यह विशेष धार्मिक अनुष्ठान जन्माष्टमी के ठीक तीन दिन बाद पड़ता है और स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच इसका आध्यात्मिक रूप से बहुत बड़ा स्थान है।
देशभर में जहां कृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में नन्हे बाल गोपाल को पालने में झुलाने की रीती निभाई जाती है, वहीं कुल्लू के इस ऐतिहासिक मंदिर में भी तीन दिनों तक पालना उत्सव का भव्य माहौल रहता है। इसके समापन के बाद एकादशी के दिन केसर डोल की रस्म पूरी की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पालना उत्सव के दौरान भगवान बाल रूप में रहते हैं और जब उनका यह स्वरूप पूर्णता यानी बड़े होने का प्रतीक बनता है, तब उनके राज्याभिषेक के भाव के साथ केसर डोल उत्सव का आयोजन किया जाता है।
उत्सव के इस खास दिन पर मंदिर परिसर के भीतर एक अत्यंत सुंदर और भव्य झूले को सजाया जाता है, जिस पर भगवान रघुनाथ की मूर्ति को आदर के साथ विराजमान किया जाता है। मंदिर के करदार यानी प्रबंधक दानवेंद्र सिंह के अनुसार इस अनुष्ठान की शुरुआत कुमकुम में केसर घोलकर भगवान रघुनाथ को तिलक अर्पित करने से होती है। इसके पश्चात राजपरिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य को यही केसर माथे पर लगाया जाता है और अंत में इसे प्रसाद के रूप में वहां मौजूद सभी भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। इस तिलक को भगवान का सीधा आशीर्वाद माना जाता है और इसे ग्रहण करना श्रद्धालुओं के लिए बेहद सौभाग्यशाली होता है।
दानवेंद्र सिंह ने यह भी जानकारी दी कि इस अनुष्ठान के दौरान राजपरिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य पारंपरिक सफेद पगड़ी धारण करके इस परंपरा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भगवान को केसर का तिलक अर्पित किए जाने के बाद राजगुरु द्वारा यही केसर उस वरिष्ठ सदस्य की पगड़ी पर लगाया जाता है, जिसे ईश्वरीय कृपा का विशेष प्रतीक माना जाता है। वर्तमान समय में राजपरिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य महेश्वर सिंह हैं और केसर डोल के इस महत्वपूर्ण अवसर पर राजगुरु द्वारा उन्हें यह तिलक लगाया जाता है। यह अनूठी रस्म कुल्लू की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अटूट भक्ति भाव का एक जीवंत हिस्सा है।
राजगुरु के घर से आती है सोंठ की पंजीरी
केसर डोल के इस पावन पर्व पर भगवान रघुनाथ को भोग लगाने के लिए विशेष प्रसाद के तौर पर सोंठ की पंजीरी तैयार की जाती है, जिसे विशेष रूप से राजगुरु के आवास से लाया जाता है। करदार दानवेंद्र सिंह ने बताया कि यह पवित्र प्रसाद सबसे पहले भगवान को अर्पित किया जाता है और उसके बाद वहां उपस्थित तमाम श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। इस समय महंत राजेंद्र दास राजगुरु के रूप में अपनी सेवा दे रहे हैं और वे वैरागी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उन्हीं के निवास स्थान पर यह विशेष सोंठ की पंजीरी तैयार की जाती है। इसके अलावा रामनवमी के पावन अवसर पर भी भगवान के लिए आने वाला भोग राजगुरु के घर से ही लाया जाता है, जो भक्तों के बीच आपसी एकता और गहरी आस्था को दर्शाता है।
साल में चार बार होता है केसर डोल का आयोजन
रघुनाथ मंदिर के पुजारी दिनेश ने इस परंपरा के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि इस मंदिर परिसर में पूरे वर्ष के दौरान कुल चार बार केसर डोल उत्सव का आयोजन किया जाता है। वर्ष का पहला केसर डोल होलिका दहन के तुरंत बाद आने वाले होला मोहल्ला के समय मनाया जाता है, जिसे फूल डोल के नाम से भी जाना जाता है और इस दौरान वैरागी समुदाय के लोग मंदिर में उपस्थित रहते हैं। दूसरा आयोजन रामनवमी के पावन पर्व पर होता है। तीसरा केसर डोल जन्माष्टमी के बाद एकादशी तिथि को संपन्न होता है, जिसमें भगवान को केसर का तिलक अर्पित किया जाता है। चौथा और अंतिम केसर डोल पंच भीष्म के समापन के बाद आयोजित किया जाता है, जिसमें भगवान को केसर के फूल चढ़ाए जाते हैं जो इसे बाकी आयोजनों से अलग बनाता है। इन सभी धार्मिक उत्सवों के कारण मंदिर की अध्यात्मिकता और परंपराओं का महत्व और अधिक बढ़ जाता है.
नग्गर के ठावा मंदिर में भी होती है केसर डोल की धूम
कुल्लू घाटी के अंतर्गत आने वाले नग्गर क्षेत्र में स्थित मूलीधर कृष्ण मंदिर, जिसे स्थानीय स्तर पर ठावा मंदिर के रूप में पहचाना जाता है, वहां भी जन्माष्टमी के पश्चात केसर डोल का भव्य आयोजन किया जाता है। इस दौरान मंदिर परिसर में एक बड़े समारोह का आयोजन होता है, जिसमें आसपास के तमाम गांवों से बड़ी संख्या में लोग शामिल होने पहुंचते हैं। यह उत्सव केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के लोगों को आपस में जोड़ने और एक साथ मिलकर जश्न मनाने का बेहतरीन अवसर भी प्रदान करता है।



















