फरीदाबाद में मौसम के बदले मिजाज ने उन गरीब परिवारों की उम्मीदों को तोड़कर रख दिया है, जो महीनों की कड़ी मेहनत के बाद दशहरे के पावन पर्व पर अपनी आजीविका चलाने का सपना देख रहे थे। सड़क किनारे झुग्गी-झोपड़ियों में रहकर रावण और कुंभकरण के विशाल पुतले तैयार करने वाले इन कारीगरों के लिए अचानक हुई बेमौसम बारिश एक बड़ी आपदा बनकर आई है। दो महीने की लंबी मशक्कत और दिन-रात के कठिन परिश्रम के बाद तैयार किए गए कई पुतले इस बारिश की भेंट चढ़ गए, जिससे अब इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
दो महीने पहले शुरू किया था निर्माण कार्य
दशहरे के त्योहारी सीजन में पुतलों की भारी मांग को ध्यान में रखते हुए इन कारीगरों ने करीब दो महीने पहले ही अपना काम शुरू कर दिया था। इन कलाकृतियों को आकार देने के लिए बांस, रंग-बिरंगे कागज और अन्य जरूरी सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। कारीगरों का कहना है कि इस प्रक्रिया में उन्हें शारीरिक रूप से भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है और कई बार काम करते समय हाथ-पैर तक छिल जाते हैं। इसके बावजूद पूरा परिवार इस उम्मीद में जुटा रहता है कि त्योहार के दिनों में होने वाली अच्छी बिक्री से उनके घर का खर्च चलेगा।
विभिन्न आकारों में बिकते हैं पुतले
इस कारोबार से जुड़े पिंटू ने जानकारी दी कि उनके यहां पांच फीट से लेकर 25 से 30 फीट तक के रावण के पुतले बनाए और बेचे जाते हैं। सामान्य तौर पर 10 फीट के एक पुतले की कीमत लगभग 10 हजार रुपये होती है, जबकि इससे बड़े और ऊंचे पुतले 13 हजार रुपये या उससे भी अधिक कीमत पर बिकते हैं। हालांकि पुतलों के आकार और डिजाइन के हिसाब से इनके दाम अलग-अलग तय होते हैं। लेकिन ताजा बारिश के कारण पानी लगने से कागज पूरी तरह भीग गए और गल गए, जिससे तैयार माल के नष्ट होने की नौबत आ गई है और उनकी लागत भी डूबने का खतरा पैदा हो गया है।
हजारों रुपये के नुकसान का अनुमान
मौसम की मार से इन मेहनतकश लोगों को कम से कम 50 हजार से 60 हजार रुपये तक का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है। इस नुकसान में मुख्य रूप से खराब हुए पुतलों की लागत और उन पर की गई उनकी अथक मेहनत शामिल है। इसे केवल मुनाफा न समझकर उनकी मूल लागत का नुकसान माना जाना चाहिए, क्योंकि पुतलों की बिक्री से जो कुल राशि मिलती है, उसमें से कच्चा माल और अन्य जरूरी खर्च भी चुकाने होते हैं। अब जबकि दशहरे का त्योहार बेहद करीब आ चुका है, ऐसे में इन कारीगरों के पास क्षतिग्रस्त पुतलों को सुधारने या नए सिरे से निर्माण करने के लिए बहुत कम समय बचा है।
दर्द बयां करते हुए बोले कारीगर
अपनी इस दयनीय स्थिति के बारे में बात करते हुए पिंटू ने दर्द बयां किया कि हालात जानने के लिए तो कई लोग आते हैं और पूछताछ करते हैं, लेकिन जब मदद करने का वक्त आता है तो कोई भी आगे नहीं बढ़ता। बारिश की वजह से कागज के बने पुतले पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं और अब उनके सामने अपने परिवार का पेट पालने की विकट समस्या पैदा हो गई है। एक अन्य कारीगर शिबा ने बताया कि इन पुतलों को बनाने में कितनी शारीरिक मेहनत लगती है और काम के दौरान हाथ-पैर तक जख्मी हो जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे हर साल त्योहार की तैयारी में पूरी शिद्दत से जुट जाते हैं क्योंकि यही उनकी आमदनी का एकमात्र मुख्य जरिया है।
रोजी-रोटी पर मंडराया संकट
ये सभी कारीगर परिवार सड़क के किनारे अस्थायी झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन गुजारने को मजबूर हैं। घर के छोटे-छोटे बच्चे भी इस काम में अपने बड़ों का हाथ बंटाते हैं ताकि त्योहार के दौरान कुछ अतिरिक्त कमाई हो सके। मगर बारिश ने इन मासूम उम्मीदों पर बड़ा प्रहार किया है। अब इन लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि वे इस भारी नुकसान की भरपाई कैसे करेंगे और अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे चलाएंगे। त्योहार से ठीक पहले अब इन कारीगरों को बस यही आस है कि उनके जो पुतले सुरक्षित बचे हैं, वे बिक जाएं ताकि उनकी लागत का कुछ हिस्सा वापस मिल सके।





















