पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ की पहचान सिर्फ 1857 की क्रांति से नहीं है, बल्कि इस शहर के आसपास कई ऐसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जिनका सीधा नाता रामायण और महाभारत काल से जोड़ा जाता है। मेरठ से करीब 20 किलोमीटर दूर बसा गगोल तीर्थ भी इसी विरासत की एक कड़ी है, जहां भगवान श्रीराम के आगमन से जुड़ी मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। गगोल तीर्थ के महंत शिवदास महाराज ने इस स्थान के इतिहास और उससे जुड़ी कथाओं को विस्तार से बताया।
महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली
महंत शिवदास महाराज के मुताबिक, गगोल तीर्थ को महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली माना जाता है और इसका जिक्र कई धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। मान्यता है कि महर्षि विश्वामित्र यहीं सप्तर्षियों के साथ बैठकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना और यज्ञ किया करते थे। इसी क्षेत्र को लेकर एक और मान्यता प्रचलित है कि मेरठ का यह इलाका कभी मय दानव के राज्य क्षेत्र में आता था। मय दानव को रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता के रूप में जाना जाता है, जिससे इस भूमि का संबंध लंका के राजपरिवार से भी जुड़ता है।
राक्षसों के आतंक से परेशान ऋषि-मुनि
कथा के अनुसार, उस दौर में इस इलाके में राक्षसों का आतंक हुआ करता था। ये राक्षस यज्ञ में विघ्न डालते और तपस्या में लीन ऋषि-मुनियों को लगातार परेशान करते थे, जिससे कोई भी यज्ञ पूरा नहीं हो पाता था। जब यह परेशानी हद से बढ़ गई तो ऋषि-मुनियों ने अपनी व्यथा महर्षि विश्वामित्र को सुनाई। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र खुद राजा दशरथ के दरबार में पहुंचे और उनसे भगवान श्रीराम को अपने साथ भेजने का आग्रह किया, ताकि यज्ञ की रक्षा की जा सके और राक्षसों के आतंक से मुक्ति मिल सके।
श्रीराम के बाण से जन्मा सरोवर
महंत शिवदास महाराज बताते हैं कि इसके बाद भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ गगोल तीर्थ पहुंचे थे। मान्यता है कि यहां उन्होंने राक्षसों का वध कर इस पूरे क्षेत्र को उनके आतंक से मुक्त करा दिया, जिसके बाद यहां दोबारा यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान होने लगे। एक और रोचक मान्यता यह भी है कि इसी दौरान लक्ष्मण जी को तेज प्यास लगी थी, लेकिन आसपास कहीं जल उपलब्ध नहीं था। ऐसे में भगवान श्रीराम ने अपने बाण से धरती पर प्रहार कर यहां जल की धारा प्रकट कर दी थी। आज वही स्थान एक सरोवर के रूप में मौजूद है, जो सदियों बाद भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
छठ पर्व पर उमड़ती है भीड़, बन रहा पर्यटन स्थल
छठ पर्व समेत कई धार्मिक अवसरों पर गगोल तीर्थ के इस सरोवर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। स्थानीय लोगों की गहरी आस्था को देखते हुए शासन की ओर से यहां लगातार विकास कार्य कराए जा रहे हैं, ताकि आने वाले समय में इस स्थान को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सके। इससे न सिर्फ श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि क्षेत्र में रोजगार और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
सप्तऋषियों की मूर्तियां और यज्ञशाला
गगोल तीर्थ परिसर में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी की प्रतिमाओं के साथ-साथ सप्तऋषियों की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं। यहां बनी यज्ञशाला में सप्तऋषियों को यज्ञ करते हुए दर्शाया गया है, जिससे श्रद्धालुओं को उस दौर की धार्मिक परंपरा की झलक मिलती है। इसके अलावा एक मान्यता यह भी प्रचलित है कि इस सरोवर में स्नान करने से त्वचा से जुड़ी कई तरह की परेशानियों में राहत मिलती है, जिसके चलते भी दूर-दूर से लोग यहां स्नान करने पहुंचते हैं।
मोक्ष धाम में स्वास्तिक आकार के शिवलिंग
गगोल तीर्थ परिसर में मोक्ष धाम के नाम से एक अलग और विशेष केंद्र भी विकसित किया गया है। यहां स्वास्तिक के आकार में सैकड़ों छोटे शिवलिंग बनाए गए हैं, जबकि इनके ठीक बीचोंबीच मुख्य शिवलिंग स्थापित है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु यहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग गगोल तीर्थ पहुंचकर यहां पूजा और दर्शन करते हैं, और इस स्थान से जुड़ी सदियों पुरानी आस्था आज भी उतनी ही मजबूत बनी हुई है।











