राजस्थान में भीलवाड़ा को भले ही टेक्सटाइल सिटी और मेवाड़ के प्रवेश द्वार के तौर पर जाना जाता हो, लेकिन इसी जिले का एक छोटा सा कस्बा गुलाबपुरा आस्था की एक अनोखी कहानी समेटे हुए है. यहां संत गुलाब बाबा की धूणी पिछले चार सौ वर्षों से बिना रुके जल रही है, और यही धूणी इस पूरे कस्बे की पहचान बन चुकी है. गुलाबपुरा को केवल एक कस्बा नहीं बल्कि आस्था, इतिहास और धार्मिक विश्वास का बड़ा केंद्र माना जाता है, जहां राजस्थान के अलावा देश के दूसरे हिस्सों से भी श्रद्धालु धूणी पर माथा टेकने आते हैं.
गुलाब बाबा कौन थे और कैसे पड़ा नगर का नाम
स्थानीय लोगों का मानना है कि गुलाबपुरा का नाम इसी महान तपस्वी संत गुलाब बाबा के नाम पर रखा गया है. वर्षों पहले उन्होंने इसी जगह कठोर तपस्या की थी, और उसी तपस्या ने इस स्थान को श्रद्धा का केंद्र बना दिया. धीरे धीरे यहां बस्ती बसती गई और लोग इसे गुलाब बाबा की नगरी यानी गुलाबपुरा के नाम से पुकारने लगे. स्थानीय निवासी केडी मिश्रा बताते हैं कि गुलाब बाबा एक ब्राह्मण परिवार से थे और बचपन में गुलाबपुरा के पास बसे भिनाय गांव में रहा करते थे.
भाभी के एक ताने ने बदल दी जिंदगी की दिशा
केडी मिश्रा के मुताबिक एक दिन गुलाब बाबा गाय चराने के लिए घर से निकलने वाले थे, तभी उन्होंने अपनी भाभी से रास्ते के लिए खाना बांधने को कहा. भाभी उस वक्त किसी और काम में उलझी थीं और खाना तैयार नहीं कर पाईं. इस बात पर छोटे गुलाब बाबा नाराज हो गए और जिद पकड़ बैठे कि खाना उन्हीं के हाथों बंधवाना है. तंग आकर भाभी ने मजाक में कह दिया कि साधु बन जाओगे तो खाना अपने आप मिलने लगेगा. यही एक वाक्य बालक गुलाब बाबा के मन में इस कदर बैठ गया कि उन्होंने उसी पल साधु बनने का फैसला कर लिया.
बारह साल की कठोर तपस्या और धूणी की स्थापना
ठान लेने के बाद गुलाब बाबा अपने एक मित्र के साथ घर छोड़कर निकल पड़े और मसूदा पहुंचकर वहां के एक संत के सामने शिष्य बनाने की गुहार लगाई. शुरुआत में संत ने उन्हें बच्चा समझकर बात को हल्के में लिया, लेकिन उनकी जिद और लगन देखकर आखिरकार तपस्या करने की इजाजत दे दी. इसके बाद गुलाब बाबा ने करीब बारह साल तक कठोर तपस्या की. उनकी साधना से संतुष्ट होकर संत ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे अपने गांव लौटें और वहीं धूणी स्थापित करें. आशीर्वाद पाकर गुलाब बाबा भिनाय लौटे और वहीं तपस्या करते हुए धूणी जलाई. उसी दिन से यह इलाका गुलाब बाबा की नगरी यानी गुलाबपुरा के नाम से जाना जाने लगा.
आज भी अखंड जल रही है 400 साल पुरानी धूणी
गुलाब बाबा की तपस्या और उनसे जुड़े चमत्कारों की बातें धीरे धीरे दूर दूर तक फैलती गईं. लोगों में यह विश्वास घर कर गया कि बाबा के आशीर्वाद से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यही वजह है कि आज भी बड़ी तादाद में लोग अपनी परेशानियों के हल और सुख समृद्धि की चाह लेकर बाबा की धूणी पर पहुंचते हैं. श्रद्धालु यहां धोक लगाकर परिवार की खुशहाली, कारोबार में तरक्की और अच्छी सेहत की दुआ मांगते हैं. गुलाब बाबा की धूणी आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा ठिकाना बनी हुई है. यहां रोज सुबह से शाम तक दर्शन के लिए लोगों की कतार लगी रहती है. अमावस्या, पूर्णिमा और खास धार्मिक मौकों पर तो हजारों की तादाद में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं.
हर साल लगता है भव्य मेला, उमड़ती है भीड़
धूणी पर पूजा अर्चना के बाद श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाते हैं और बाबा का आशीर्वाद लेकर लौटते हैं. लोगों का मानना है कि सच्चे मन से मांगी गई हर दुआ बाबा तक पहुंचती है और वे भक्तों की मुरादें जरूर पूरी करते हैं. हर साल यहां एक भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और कई दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मेले के दौरान धार्मिक कार्यक्रम, भजन कीर्तन, भंडारे और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, और पूरा इलाका भक्ति के रंग में रंग जाता है. स्थानीय व्यापारियों के लिए भी यह मेला बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि इस दौरान उमड़ने वाली भीड़ से बाजारों में खासी रौनक लौट आती है.
धार्मिक पर्यटन का केंद्र बन चुका गुलाबपुरा
आज गुलाबपुरा की पहचान सिर्फ एक औद्योगिक और व्यापारिक कस्बे तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह धार्मिक पर्यटन का भी एक बड़ा केंद्र बन चुका है. यहां आने वाले श्रद्धालु गुलाब बाबा की धूणी के दर्शन के साथ साथ इलाके की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी रूबरू होते हैं. गुलाब बाबा की कृपा और आशीर्वाद ने ही इस छोटे से कस्बे को खास पहचान दिलाई है. यही वजह है कि गुलाबपुरा का नाम आज सिर्फ राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के प्रतीक के तौर पर जाना जाता है.













