पश्चिम उत्तर प्रदेश का मेरठ शहर अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ धार्मिक महत्व के लिए भी देश भर में एक अलग पहचान रखता है। यहां ऐसे कई प्राचीन मंदिर मौजूद हैं जो त्रेतायुग यानी रामायण काल, द्वापरयुग और महाभारत काल के इतिहास को आज भी जीवंत बनाए रखते हैं। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक श्रृंखला में मेरठ के सूरजकुंड इलाके में स्थित कालूराम मंदिर का नाम बेहद खास तौर पर लिया जाता है।
केवट राज की मूर्ति और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था
सूरजकुंड पार्क के ठीक पास बने इस ऐतिहासिक कालूराम मंदिर में भगवान श्रीराम को अपनी नाव से गंगा पार कराने वाले केवट राज की प्रतिमा स्थापित है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के मन में इस स्थान के प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा देखने को मिलती है। यही कारण है कि दूर-दूर से भक्त यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने और शीश झुकाने के लिए पहुंचते हैं।
कश्यप समाज की विशेष भागीदारी और शोभायात्रा
इस मंदिर से विशेष रूप से कश्यप समाज के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। समाज के लोग यहां समय-समय पर बड़े धार्मिक आयोजनों का संचालन करते हैं, जिनमें केवट महाराज के सम्मान में निकाली जाने वाली भव्य शोभायात्रा का अपना एक अलग ही महत्व है। इस मंदिर की बनावट, वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत को देखने पर प्राचीन भारतीय कला की अनूठी छाप साफ नजर आती है।
पुश्तैनी सेवा और रामलीला से जुड़ा अनूठा प्रसंग
मंदिर की व्यवस्थाओं से जुड़े दयाचंद बताते हैं कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से इस धार्मिक स्थल की सेवा में पूरी निष्ठा के साथ जुटा हुआ है। उनका मानना है कि केवट महाराज की विशेष कृपा उनके पूरे परिवार पर सदैव बनी रहती है, जिसके चलते वे मंदिर की संपूर्ण देखरेख और व्यवस्था को संभालते हैं। उन्होंने जानकारी दी कि जैसे पूरे देश में भव्य रामलीला मंचन की परंपरा निभाई जाती है, वैसे ही इस मंदिर में भी वर्षों पुरानी परंपराओं का पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है।
जिमखाना मैदान रामलीला और गंगा पार का दृश्य
जब मेरठ शहर की रामलीला कमेटी द्वारा जिमखाना मैदान में रामलीला का मंचन किया जाता है, तो उसमें भगवान श्रीराम को गंगा नदी पार कराने वाला प्रसंग बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस विशेष प्रसंग का मंचन पारंपरिक रूप से कालूराम मंदिर परिसर में ही देखने को मिलता है, जिसे देखने के लिए स्थानीय नागरिकों और श्रद्धालुओं में भारी उत्साह रहता है।
सूरजकुंड पार्क का प्राचीन सरोवर और कर्ण का इतिहास
वर्तमान समय में जो सूरजकुंड पार्क शहरवासियों के लिए सैर-सपाटे और घूमने का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है, वहां कभी एक विशाल और पवित्र सरोवर हुआ करता था। यह प्राचीन स्थल अपनी भव्यता और ऐतिहासिक विरासत को आज भी समेटे हुए है। इस पार्क के चारों तरफ कई ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर बने हुए हैं, जिनसे तमाम धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
दानवीर कर्ण और पौराणिक ग्रंथों का उल्लेख
विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में सूरजकुंड पार्क का विस्तार से उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि दानवीर महाराज कर्ण ने इसी स्थान पर अपने प्रसिद्ध सोने के कुंडल दान में दिए थे। जब कोई पर्यटक या श्रद्धालु इस पार्क में आता है, तो उसे कालूराम जी के मंदिर के साथ-साथ कई अन्य प्राचीन मंदिर भी देखने को मिलते हैं, जिनके प्रति भक्तों की अटूट भावनाएं जुड़ी हैं। इससे यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस कालखंड में यह स्थान अपने आप में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल रहा होगा।
मंदिर के दर्शन का समय और आरती की परंपरा
यदि आप इस ऐतिहासिक मंदिर में दर्शन करने की इच्छा रखते हैं, तो इसके लिए निश्चित समय निर्धारित किया गया है। यहां सुबह 6:00 बजे से 10:00 बजे तक और शाम को 5:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक भक्त आसानी से दर्शन और पूजन कर सकते हैं। देश के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों की तरह ही यहां भी भगवान की आराधना के लिए विशेष आरती और स्तुति का विधान है, और मंदिर परिसर में केवट राज से जुड़ी आरती का पूरा विवरण भी अंकित किया गया है।



















