सावन के पवित्र महीने में शिवरात्रि के पावन पर्व पर यदि आप भी भगवान भोलेनाथ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के लिए किसी खास जगह की तलाश कर रहे हैं, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मेरठ में ऐसे कई शिवालय मौजूद हैं जिनका इतिहास हजारों साल पुराना है और जिनकी अपनी अलग पौराणिक महत्ता है।
बिलेश्वर नाथ मंदिर और रावण की पत्नी मंदोदरी
मेरठ के सबसे प्राचीन शिवालयों में बिलेश्वर नाथ मंदिर का नाम सबसे पहले आता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण की पत्नी मंदोदरी भी यहीं पर विधि-विधान के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना किया करती थीं। इसके बाद के कालखंड में मराठा शासकों द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था। अपनी प्राचीन सभ्यताओं और इतिहास के कारण यह मंदिर हमेशा चर्चा में रहता है और यहां आने वाले हर श्रद्धालु की मन्नतें पूरी होती हैं।
नेहरू रोड स्थित प्राचीन शिव मंदिर और आदियोगी की प्रतिमा
ऐसी ही गहरी मान्यताएं नेहरू रोड पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर से भी जुड़ी हुई हैं। इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ का प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जहां शिव भक्त पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ करते हैं। कुछ साल पहले इस परिसर में एक कुएं के ऊपर आदियोगी की एक भव्य मूर्ति भी स्थापित की गई है, जिसके प्रति भक्तों में अथाह आस्था देखने को मिलती है। इस अनोखे स्वरूप के दर्शन और पूजा के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं।
ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर और नेताओं की आस्था
मेरठ कैंट में स्थित ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर का महत्व प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आगाज से लेकर तमाम प्राचीन मान्यताओं तक फैला हुआ है। यहां हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, जबकि शिवरात्रि के पावन अवसर पर लाखों की तादाद में भोले भक्त यहां पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। इस मंदिर की महिमा ऐसी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई दिग्गज राजनेता भी यहां आकर बाबा औघड़नाथ का आशीर्वाद ले चुके हैं।
महाभारत कालीन हस्तिनापुर और द्रौपदेश्वर महादेव मंदिर
मेरठ को महाभारत काल की धरती के रूप में भी जाना जाता है, जिसके चलते हस्तिनापुर में भी कई प्राचीन और महत्वपूर्ण मंदिर देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक प्रमुख नाम द्रौपदेश्वर महादेव मंदिर का है। नहर के किनारे बसा यह मंदिर अपनी प्राचीन वास्तुकला और संस्कृति के लिए विशेष महत्व रखता है। हस्तिनापुर के इतिहास से जुड़े विभिन्न पहलुओं के जानकार प्रियंक भारती के अनुसार, यह एक बेहद प्राचीन मंदिर है जहां भक्तों की भारी भीड़ पूजा के लिए जुटती है।
पांडेश्वर मंदिर और पांडवों से जुड़ी किंवदंतियां
हस्तिनापुर में ही स्थित पांडेश्वर मंदिर से एक खास किंवदंती जुड़ी हुई है। ऐसा माना जाता है कि पांचों पांडव यहीं बूढ़ी गंगा में स्नान करने के बाद विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा किया करते थे। देश भर से श्रद्धालु इस प्राचीन मंदिर में माथा टेकने आते हैं। प्राचीन टीले के पास बने इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आपको पांचों पांडवों की मूर्तियां भी देखने को मिल जाती हैं।
बहसुमा का अनोखा शिव मंदिर जहां नहीं टिकती छत
मेरठ के बहसुमा में भी एक बेहद प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, जिसके बारे में मान्यता है कि यहां भी पांचों पांडव पूजा करने आया करते थे। इस मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं भी मौजूद है। इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस जगह पर भगवान भोलेनाथ विराजमान हैं, वहां आज तक कभी पक्की छत नहीं टिक पाई है। आस्था के इस प्रमुख केंद्र पर शिवरात्रि के दिन लाखों श्रद्धालु विधि-विधान से जलाभिषेक करते हैं।
गंगोल तीर्थ और स्वास्तिक आकार के शिवलिंग
महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली माने जाने वाले गंगोल तीर्थ में मोक्ष धाम की तर्ज पर एक अनूठा केंद्र विकसित किया गया है। यहां सैकड़ों की संख्या में स्वास्तिक के आकार वाले शिवलिंग बनाए गए हैं। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित पांच तत्वों के आधार पर इस पूरे तीर्थ स्थल को तैयार किया गया है। यहां 21 परिक्रमा पूरी करने के बाद श्रद्धालु मुख्य शिवलिंग के पास पहुंचते हैं। मंदिर के महंत शिवदास महाराज के अनुसार, जो भी भक्त यहां सच्चे मन से पूजा करता है, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है.


















