इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम शुरू होते ही दुनियाभर के मुसलमानों के बीच एक अलग ही रूहानी रंग छा जाता है। यह सिर्फ नए साल की दस्तक नहीं है, बल्कि उन चार पवित्र महीनों में से एक है जिन्हें इस्लाम में बेहद ऊंचा दर्जा हासिल है। यही वजह है कि लोग इस पूरे महीने को आत्मचिंतन, इबादत, सब्र और भले कामों के लिए खास मानते हैं। इस महीने की 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहते हैं, धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों लिहाज से सबसे अहम मानी जाती है।
इसी दिन कर्बला की धरती पर इमाम हुसैन और उनके साथियों ने इंसाफ, सच्चाई और इंसानियत की हिफाजत के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। यही कुर्बानी इस महीने को बाकी दिनों से अलग बनाती है। यही कारण है कि लोग इन दिनों इबादत, दुआ, रोजे और नेकी के जरिए अल्लाह की रजा पाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि मुहर्रम के इन शुरुआती दिनों में किन कामों को करना चाहिए और किनसे दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
आखिर मुहर्रम इतना खास क्यों है
इस्लाम में मुहर्रम को “शहरुल्लाह” यानी अल्लाह का महीना भी कहा जाता है। धार्मिक जानकारों का मानना है कि यह महीना इंसान को अपने कामों पर नजर डालने और अल्लाह के और करीब जाने का मौका देता है। कर्बला की घटना ने इसकी अहमियत को और बढ़ा दिया। आशूरा का दिन केवल गम का प्रतीक नहीं है, बल्कि सच्चाई, धैर्य और त्याग की जीती-जागती मिसाल भी माना जाता है। यही वजह है कि दुनियाभर का मुस्लिम समाज इस दिन को अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं के साथ याद करता है।
रोजा और इबादत में बिताया गया वक्त
मुहर्रम की 9वीं और 10वीं तारीख का रोजा बेहद पुण्यकारी माना जाता है। कई मुस्लिम परिवार इन दोनों दिन खासतौर पर रोजा रखकर अल्लाह से दुआ करते हैं और इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करते हैं। जानकारों के मुताबिक इस महीने में आम दिनों के मुकाबले ज्यादा नमाज पढ़ना, कुरआन की तिलावत करना और अल्लाह का जिक्र करना कहीं ज्यादा फायदेमंद माना गया है।
सेवा और मदद भी इबादत का हिस्सा
मुहर्रम सिर्फ इबादत तक सीमित नहीं है। इन दिनों जरूरतमंदों की मदद करना, गरीबों को खाना खिलाना और लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करना भी उतना ही जरूरी माना जाता है। कई जगहों पर आशूरा के मौके पर सबील लगाई जाती है, जहां राहगीरों को पानी और शरबत पिलाया जाता है। यह परंपरा इंसानियत और सेवा की भावना को और मजबूत करती है।
इस महीने में सदका देने का अलग ही महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े या आर्थिक मदद देना सवाब का काम माना जाता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार दान का मतलब केवल पैसे की मदद नहीं है। किसी की परेशानी दूर करना, किसी का हाथ बंटाना और अच्छे व्यवहार से लोगों का दिल जीतना भी सदका का ही एक रूप है।
कई शिया मुस्लिम समुदायों में मुहर्रम के दौरान खास परंपराएं निभाई जाती हैं। कुछ लोग इन दिनों बाल या दाढ़ी नहीं कटवाते और सादगी भरी जिंदगी अपनाते हैं। आशूरा के दिन गम और सम्मान के प्रतीक के रूप में विशेष धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
किन कामों से बनानी चाहिए दूरी
इस्लामी शिक्षाओं के मुताबिक मुहर्रम के दौरान किसी भी तरह का अन्याय, झूठ, धोखाधड़ी या किसी को नुकसान पहुंचाने वाला बर्ताव नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि पवित्र महीनों में किए गए अच्छे कामों का सवाब बढ़ जाता है, जबकि बुरे कामों की गंभीरता भी कई गुना ज्यादा मानी जाती है। यही वजह है कि इन दिनों इंसान को अपने व्यवहार और अपनी जबान, दोनों पर खास ध्यान देना चाहिए।
मुहर्रम उन चार महीनों में शामिल है जिन्हें इस्लाम में अमन और शांति का प्रतीक माना गया है। इसलिए किसी भी तरह के झगड़े, हिंसा या आपसी रंजिश से बचने की सलाह दी जाती है। धार्मिक ग्रंथों में भी शांति, भाईचारे और इंसाफ पर खूब जोर दिया गया है। ऐसे में इस महीने का असली पैगाम यही है कि समाज में प्रेम और सौहार्द बढ़ाया जाए।
सच्ची नीयत ही असली पैमाना
धार्मिक विद्वान मानते हैं कि इबादत और नेक काम केवल दिखावे के लिए नहीं होने चाहिए। मुहर्रम का असली मकसद आत्मशुद्धि और अल्लाह की खुशी हासिल करना है, इसलिए हर काम सच्ची नीयत के साथ करना बेहतर समझा जाता है। कर्बला की घटना आज भी इंसानियत को यह सिखाती है कि सच्चाई और इंसाफ के लिए कठिन से कठिन हालात में भी डटे रहना चाहिए। मुहर्रम महज शोक का महीना नहीं, बल्कि आत्ममंथन, सब्र, त्याग और मानवीय मूल्यों को याद करने का मौका भी है। यही वजह है कि इस महीने में इबादत के साथ-साथ अच्छे चरित्र और भले कामों पर भी खास जोर दिया जाता है।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारियां सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।)













