हिंदू पंचांग और परंपराओं के अनुसार साल का वह समय आ चुका है जब लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। आज 27 सितंबर 2026 से पितृ पक्ष की शुरुआत हो चुकी है। इस बार तिथियों की गणना और घट-बढ़ की वजह से 15 दिनों के भीतर ही कुल 16 श्राद्ध संपन्न किए जाएंगे। यह पूरा पखवाड़ा 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के दिन समाप्त होगा। इस दौरान महालया और श्राद्ध कर्मों के जरिए लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य जैसे अनुष्ठान करते हैं।
तारीखों का फेर और 15 दिनों में 16 श्राद्ध
इस वर्ष खगोलीय और पंचांगीय गणना के अनुसार तिथियों का क्षय होने के कारण दिनों की संख्या कम है लेकिन श्राद्धों की संख्या पूरी सोलह है। इसका विशेष उदाहरण 30 सितंबर को देखने को मिलेगा, जब चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। सनातन संस्कृति में पितृपक्ष को भय या नकारात्मकता का समय नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति गहरी श्रद्धा, उनके स्मरण और उनके प्रति आभार जताने का विशेष अवसर माना जाता है। इस अवधि में लोग सादगी और संयम से जीवन जीते हैं ताकि पूर्वजों की कृपा बनी रहे और किसी तरह का पितृदोष न लगे।
पितृ पक्ष में बड़े मांगलिक कार्यों से परहेज
परंपरागत रूप से इस पूरे पखवाड़े के दौरान नए और बड़े मांगलिक आयोजनों को शुरू करने से बचा जाता है। कई परिवार इस अवधि में विवाह, सगाई, नया घर खरीदने या गृह प्रवेश जैसे शुभ उत्सवों का आयोजन टाल देते हैं। हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं है कि दैनिक जीवन और कामकाज को पूरी तरह रोक दिया जाए। नौकरी, पढ़ाई, यात्रा और परिवार की सामान्य जिम्मेदारियां हमेशा की तरह चलती रहती हैं। यह रोक मुख्य रूप से उन समारोहों पर होती है जिनका उद्देश्य उत्सव मनाना या किसी नए बड़े सफर की शुरुआत करना होता है।
विलासिता और महंगी खरीदारी से दूरी
इस दौरान कई घरों में बिना किसी खास जरूरत के महंगी वस्तुएं, नए आभूषण और नए कपड़े खरीदने से बचा जाता है। इसके पीछे की मूल भावना जीवन में दिखावे के बजाय सादगी और अनुशासन अपनाना है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि रोजमर्रा की जरूरी चीजें या आपातकालीन सामान खरीदना बंद कर दिया जाए। यदि किसी को स्वास्थ्य, काम या यात्रा के सिलसिले में किसी वस्तु की सख्त आवश्यकता है, तो उसे खरीदने में कोई बाधा नहीं है। मुख्य उद्देश्य भौतिक सुखों से ज्यादा मानसिक सादगी पर ध्यान देना है।
खान-पान और सात्विकता के नियम
पितृपक्ष के दौरान खान-पान को लेकर भी विशेष अनुशासन देखा जाता है। अधिकांश परिवारों में इन दिनों पूरी तरह सात्विक भोजन किया जाता है। मांस, मछली, अंडे और मदिरा के सेवन से परहेज किया जाता है। इसके अलावा कई घरों में इस पूरे पखवाड़े या कम से कम श्राद्ध के दिन प्याज और लहसुन का प्रयोग भी नहीं होता है। भोजन में शुद्धता, ताजगी और संयम को सर्वोपरि रखा जाता है, हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और कुल की परंपराओं के अनुसार इन नियमों में कुछ भिन्नता हो सकती है।
भोजन की बर्बादी से बचने की सीख
श्राद्ध के इन दिनों में भोजन का विशेष महत्व होता है क्योंकि पितरों के निमित्त विशेष पकवान बनाए जाते हैं और जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है। इसलिए इस दौरान यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि थाली में खाना बिल्कुल बर्बाद न हो। केवल उतनी ही मात्रा में भोजन लें जितनी आवश्यकता हो और अतिरिक्त भोजन गरीबों या जरूरतमंदों तक पहुंचे। यह पखवाड़ा हमें अन्न के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव सिखाता है ताकि संसाधनों की बर्बादी रोकी जा सके।
पारिवारिक कलह और विवादों से बचाव
पितृपक्ष का सीधा संबंध परिवार की जड़ों और पूर्वजों की स्मृतियों से है। ऐसे में इन 15-16 दिनों के दौरान बेवजह के झगड़ों, कटु वचनों और पुराने पारिवारिक विवादों को तूल देने से बचने की सलाह दी जाती है। संपत्ति या विरासत के मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं को इस समय टाल देना बेहतर होता है ताकि घर का माहौल शांत और सौहार्दपूर्ण बना रहे। पूर्वजों की अच्छी यादों को साझा करना और आपसी रिश्तों में मिठास बनाए रखना इस समय की असली भावना है।
बाल और नाखून काटने से जुड़ी परंपराएं
कई परिवारों की मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म करने वाले मुख्य व्यक्ति को उस विशेष तिथि पर या पूरे पखवाड़े के दौरान बाल कटवाने, दाढ़ी बनवाने और नाखून काटने से बचना चाहिए। हालांकि यह नियम पूरी तरह से पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं पर निर्भर करता है। सभी समाजों में इसका एक जैसा पालन नहीं होता है, इसलिए किसी भी दुविधा की स्थिति में अपने कुल और परिवार के बुजुर्गों द्वारा तय किए गए नियमों का पालन करना ही सबसे उचित माना जाता है.
अंधविश्वास से दूर रहकर सादगी अपनाना
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पितृपक्ष को लेकर मन में किसी भी प्रकार का अनावश्यक डर या अंधविश्वास नहीं पालना चाहिए। यह समय किसी अनिष्ट का नहीं बल्कि अपने पुरखों को याद करने का है। लोग अपनी नौकरी, व्यवसाय और पढ़ाई सामान्य रूप से जारी रखते हैं। इस पूरे अनुष्ठान का मूल सार यही है कि हम उन लोगों को याद करें जिनकी बदौलत आज हमारा अस्तित्व इस दुनिया में है और उनके प्रति सम्मान प्रकट करें।
प्रमुख श्राद्ध तिथियों की पूरी सारणी
27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध के साथ शुरू हुआ यह क्रम 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध, 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध और महाभरणी, 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध के साथ आगे बढ़ेगा। इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध, 3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध, 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध, 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध, 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध, 7 अक्टूबर को द्वादशी और मघा श्राद्ध तथा 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध संपन्न होगा।



















