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रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही श्री हनुमान के दर्शन, अंबाला में दो सदी पुराने मंदिर की अटूट धार्मिक परंपराधर्म
14 अग॰ 2026, 8:07 am (48 दिन पहले)· 3

रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही श्री हनुमान के दर्शन, अंबाला में दो सदी पुराने मंदिर की अटूट धार्मिक परंपरा

अंबाला शहर रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर स्थित दो सौ साल से अधिक पुराना श्री हनुमान मंदिर श्रद्धालुओं और यात्रियों की अटूट आस्था का केंद्र है, जहां रोजाना और विशेष पर्वों पर भक्तों का तांता लगा रहता है।

हरियाणा के ऐतिहासिक शहर अंबाला में रेलवे स्टेशन से बाहर कदम रखते ही श्रद्धालुओं को एक अद्भुत धार्मिक वातावरण की अनुभूति होती है। अंबाला शहर रेलवे स्टेशन के मुहाने पर स्थापित श्री हनुमान मंदिर पिछले दो सौ वर्षों से भी अधिक समय से जन-आस्था का विशाल केंद्र बना हुआ है। इस पावन स्थल की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि रेलगाड़ियों से उतरने वाले यात्री अपनी आगे की यात्रा शुरू करने से पहले संकटमोचन हनुमान जी के चरणों में माथा टेकना अपनी दिनचर्या और परंपरा का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। केवल अंबाला के स्थानीय नागरिक ही नहीं, बल्कि पंजाब, हिमाचल प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु भी संकटमोचन के इस प्राचीन दरबार में नियमित रूप से नमन करने पहुंचते हैं।

अंबाला रेलवे स्टेशन के बाहर आस्था का दो सदी पुराना केंद्र

अंबाला शहर रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार के समीप स्थित यह प्राचीन मंदिर बीते दो सौ सालों से अधिक समय के समृद्ध इतिहास और धार्मिक धरोहर को अपने भीतर समेटे हुए है। पीढ़ी दर पीढ़ी से यह मान्यता चली आ रही है कि यदि कोई भक्त सच्चे हृदय और निष्ठा से भगवान हनुमान के सामने अपनी प्रार्थना रखता है, तो उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। इसी अटूट विश्वास के कारण कई परिवार वर्षों से इस मंदिर से जुड़े हुए हैं। जब श्रद्धालुओं की मनौतियां पूर्ण होती हैं, तो वे मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन करवाते हैं और साधु-संतों तथा आम जनता को भोजन कराकर भगवान हनुमान का आभार व्यक्त करते हैं।

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चोला चढ़ाने की परंपरा और लौंग-इलायची के अनूठे प्रसाद की महत्ता

मंदिर की धार्मिक दिनचर्या में कई अनोखी और पुरातन परंपराएं शामिल हैं। भगवान हनुमान को संकटमोचक रूप में मानकर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार सिंदूरी चोला अर्पित करते हैं। इसके अतिरिक्त बजरंगबली को गुड़-चना और बूंदी का पार पारंपरिक भोग लगाया जाता है। पूजा विधान का एक बहुत ही विशेष हिस्सा लौंग और इलायची का अर्पण है। मंदिर प्रशासन और पूजा व्यवस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि भक्तों द्वारा भगवान के श्रीचरणों में चढ़ाई गई लौंग और इलायची को मंत्रोपचार के पश्चात पावन प्रसाद के रूप में वापस लौटा दिया जाता है। श्रद्धालु इस प्रसाद को बड़े आदर के साथ अपने घरों में ले जाते हैं और इसे अपने सुख-समृद्धि एवं स्वास्थ्य के लिए शुभ मानते हैं।

दीवारों पर उकेरी रामायण की झलकियां और प्राचीन स्थापत्य कला

मंदिर के प्राचीन इतिहास और इसकी स्थापत्य कला के संबंध में मंदिर के सेवादार पदम खन्ना बताते हैं कि इस पावन स्थल का इतिहास दो सौ वर्षों से भी अधिक पुराना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रेलवे स्टेशन से गुजरने वाले असंख्य यात्री अपनी यात्रा को मंगलमय बनाने के उद्देश्य से मंदिर में माथा टेककर ही अपनी मंजिल की ओर अग्रसर होते हैं। मंदिर का आंतरिक ढांचा और इसकी कलात्मक दीवारें इसके प्राचीन स्वरूप की गवाही देती हैं। मंदिर की अंदरूनी दीवारों पर रामायण की प्रमुख पावन घटनाओं को सुंदर चित्रकला के माध्यम से उकेरा गया है। इसके अलावा दीवारों पर अंकित 'श्री राम' नाम का निरंतर जाप और अंकन यहां आने वाले हर श्रद्धालु के मन को असीम शांति और भक्ति रस से भर देता है।

मंगलवार और शनिवार का विशेष आकर्षण तथा हनुमान जन्मोत्सव का भव्य पर्व

सप्ताह के आम दिनों में तो मंदिर में श्रद्धालुओं का आगमन निरंतर बना ही रहता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार के दिनों में यहां का दृश्य अत्यंत विहंगम हो जाता है। इन दो विशेष दिनों में तड़के सुबह से ही बजरंगबली के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतारें लग जाती हैं। मंदिर के सेवादार पदम खन्ना के अनुसार, कई बार श्रद्धालुओं की अत्यधिक संख्या के कारण रात को दस बजे तक लगातार लंबी लाइनें देखने को मिलती हैं। भक्त अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं और चोला, बूंदी तथा गुड़-चने का भोग चढ़ाते हैं।

वार्षिक हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर तो पूरा मंदिर परिसर एक अलग ही अलौकिक रूप धारण कर लेता है। इस पावन पर्व पर संपूर्ण मंदिर को भगवा ध्वजों से सजाया जाता है। भक्ति संगीत, ढोल-नगाड़ों और 'जय श्री राम' के उद्घोष से आसपास का पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठता है। हनुमान जन्मोत्सव के दिन मंदिर में आने वाले श्रद्धालु वहां से पूजित भगवा ध्वज अपने साथ ले जाते हैं और अपने घरों की छतों पर सम्मानपूर्वक फहराते हैं।

आधुनिकता के दौर में कायम अंबाला की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान

समय के परिवर्तन के साथ अंबाला शहर में आधुनिक इमारतों, व्यस्त सड़कों और तेज रफ्तार जिंदगी का विस्तार हुआ है, लेकिन इस रेलवे स्टेशन वाले श्री हनुमान मंदिर का आध्यात्मिक आकर्षण आज भी पूरी तरह से अक्षुण्ण है। यह मंदिर केवल पूजा-पाठ की जगह नहीं, बल्कि अंबाला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का एक अमूल्य स्तंभ बन चुका है। अपनी रेल यात्रा के दौरान कुछ पलों के लिए रुककर हनुमान जी के दर्शन करना और उनका आशीर्वाद लेकर जीवन पथ पर आगे बढ़ना एक ऐसी जीवंत परंपरा है, जो आज भी उतनी ही शिद्दत से निभाई जा रही है।

सवाल-जवाब

अंबाला का यह श्री हनुमान मंदिर कितना पुराना है?
मंदिर के सेवादार पदम खन्ना के अनुसार, यह हनुमान मंदिर लगभग 200 साल से भी अधिक पुराना है।
यह मंदिर कहां स्थित है और यहां कौन-कौन से श्रद्धालु आते हैं?
यह मंदिर अंबाला शहर रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर स्थित है। यहां स्थानीय निवासियों के अलावा ट्रेन से उतरने वाले यात्री तथा पंजाब और हिमाचल प्रदेश के श्रद्धालु आते हैं।
मंदिर में भगवान हनुमान को क्या-क्या भोग और प्रसाद चढ़ाया जाता है?
भक्त हनुमान जी को चोला चढ़ाते हैं, गुड़-चना और बूंदी का भोग लगाते हैं तथा लौंग व इलायची अर्पित करते हैं, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में वापस दिया जाता है।
मंगलवार और शनिवार को मंदिर में दर्शन की क्या व्यवस्था रहती है?
मंगलवार और शनिवार को मंदिर में भारी भीड़ रहती है और रात 10 बजे तक दर्शन के लिए लंबी लाइनें लगी रहती हैं।
हनुमान जन्मोत्सव पर मंदिर में किस प्रकार का आयोजन होता है?
हनुमान जन्मोत्सव पर मंदिर में भगवा ध्वज फहराए जाते हैं, धार्मिक गीत गाए जाते हैं और भक्त मंदिर से पूजित भगवा ध्वज अपने घर ले जाते हैं।
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