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सावन के पहले सोमवार पर वाराणसी में उमड़ा आस्था का जनसैलाब, जानिए पांच शिवालयों में यादव समाज के जलार्चन का इतिहासधर्म
3 अग॰ 2026, 12:29 pm (58 दिन पहले)· 1

सावन के पहले सोमवार पर वाराणसी में उमड़ा आस्था का जनसैलाब, जानिए पांच शिवालयों में यादव समाज के जलार्चन का इतिहास

सावन माह के पहले सोमवार पर वाराणसी में 50 हजार से अधिक यादव बंधुओं ने केदार घाट से जल भरकर काशी विश्वनाथ सहित पांच प्रमुख शिवालयों में जलाभिषेक किया। अकाल के दौर में बारिश की प्रार्थना से शुरू हुई यह ऐतिहासिक परंपरा आज भी निष्ठापूर्वक निभाई जा रही है।

पवित्र सावन माह की शुरुआत होते ही भगवान शिव की पावन नगरी काशी में धार्मिक उत्साह और भक्ति का अनोखा माहौल छा गया है। सावन के पहले सोमवार के अवसर पर जहां लाखों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ और अन्य शिवालयों में दर्शन और पूजन के लिए उमड़ रहे हैं, वहीं वाराणसी का यादव समाज अपनी सदियों पुरानी विशिष्ट धार्मिक परंपरा का निर्वहन कर रहा है। इस खास मौके पर पारंपरिक परिधान पहने 50 हजार से भी अधिक यादव बंधुओं ने एकजुट होकर काशी के पांच प्रमुख शिवालयों में गंगाजल से भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया।

सूखे और अकाल से उबरी काशी, यूं शुरू हुई सदियों पुरानी परंपरा

इस अनूठी जलाभिषेक यात्रा के पीछे एक ऐतिहासिक और पौराणिक लोककथा जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में पूरा देश भयानक अकाल और भीषण सूखे की चपेट में आ गया था। वर्षा न होने के कारण चारों तरफ पानी का संकट गहरा गया था और जनमानस में हाहाकार मचा हुआ था। इस विकट संकट से मुक्ति पाने और प्राकृतिक आपदा से राहत पाने के लिए काशी के यादव समाज ने भगवान शिव को प्रसन्न करने का सामूहिक संकल्प लिया। संकल्प के अनुसार, सावन महीने के पहले सोमवार को यादव बंधुओं ने एकजुट होकर शिवालयों में भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। इस सामूहिक पूजन के तुरंत बाद झमाझम बारिश हुई, जिससे अकाल खत्म हो गया। उसी समय से हर साल सावन के प्रथम सोमवार को जलाभिषेक करने की यह अटूट परंपरा निरंतर चली आ रही है।

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केदार घाट से गंगाजल लेकर इन पांच शिवालयों का अर्चन

यादव समाज के प्रतिनिधि मुन्नालाल यादव ने इस परंपरा की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि श्रद्धालु सबसे पहले केदार घाट पर एकत्र होते हैं और वहां से पवित्र गंगाजल भरकर अपनी यात्रा आरंभ करते हैं। इसके बाद यादव बंधु एक तय मार्ग से गुजरते हुए शहर के पांच प्रमुख शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। इन पांच पावन धामों में गौरी केदारेश्वर, तिलभांडेश्वर, काशी विश्वनाथ, महामृत्युंजय और मार्कण्डेय महादेव मंदिर शामिल हैं। मुन्नालाल यादव के अनुसार, उनके पूर्वज भी निष्ठापूर्वक इस धार्मिक परंपरा का निर्वहन करते थे और आज की पीढ़ी भी उसी श्रद्धा भाव के साथ अपने पुरखों के इस पवित्र संकल्प को आगे बढ़ा रही है।

151 डमरू वादकों का गुंजायमान दल, झांकियां और पुष्प वर्षा

सोमवार को निकली यह पारंपरिक यात्रा पूरी तरह से शिवमय नजर आई। त्रिशूल धारण किए भक्त महादेव-महादेव के गगनभेदी जयघोष के साथ अलग-अलग मंदिरों की ओर बढ़ते रहे। यात्रा का मुख्य आकर्षण 151 से अधिक लोगों का विशाल डमरू दल रहा, जिनकी तालबद्ध गूंज से पूरी काशी नगरी भक्तिमय हो उठी। इसके साथ ही भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती भव्य झांकियां भी निकाली गईं, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रहीं और श्रद्धालु इन झांकियों के साथ सेल्फी लेते दिखाई दिए। इस पूरी यात्रा के दौरान जगह-जगह स्थानीय नागरिकों द्वारा पुष्प वर्षा कर यादव बंधुओं का भव्य स्वागत किया गया, जबकि प्रशासन की ओर से सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए थे।

सवाल-जवाब

वाराणसी में यादव समाज की जलाभिषेक परंपरा कैसे शुरू हुई?
यह परंपरा प्राचीन काल में पड़े भयानक अकाल के दौरान शुरू हुई थी, जब सूखा दूर करने के लिए यादव समाज ने सावन के पहले सोमवार को शिवजी का जलाभिषेक किया, जिसके तुरंत बाद वर्षा हुई थी।
यादव समाज की इस यात्रा में कौन-कौन से पांच शिवालय शामिल हैं?
इस जलाभिषेक यात्रा के तहत श्रद्धालु गौरी केदारेश्वर, तिलभांडेश्वर, काशी विश्वनाथ, महामृत्युंजय और मार्कण्डेय महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।
यादव बंधु जलाभिषेक के लिए गंगाजल कहां से एकत्र करते हैं?
श्रद्धालु सबसे पहले वाराणसी के केदार घाट पर एकत्र होते हैं और वहां से पवित्र गंगाजल भरकर पांचों शिवालयों के लिए रवाना होते हैं।
इस साल की जलाभिषेक यात्रा में क्या मुख्य आकर्षण रहे?
इस वर्ष 50 हजार से अधिक यादव बंधुओं की भागीदारी, 151 से ज्यादा लोगों का डमरू दल, भगवान शिव की झांकियां और जगह-जगह पुष्प वर्षा यात्रा का मुख्य आकर्षण रही।
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