धर्मनगरी चित्रकूट की पहचान सदियों से भगवान श्रीराम की पावन तपोस्थली के रूप में रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने अपने चौदह वर्षों के वनवास काल में से लगभग साढ़े ग्यारह वर्ष इसी पावन भूमि पर व्यतीत किए थे। चित्रकूट के घने जंगल, विंध्य पर्वतमालाएं और तमाम आध्यात्मिक स्थल रामायण काल की अनेक अलौकिक घटनाओं तथा कथाओं को समेटे हुए हैं। इन्हीं पावन प्रसंगों में सबसे हृदयस्पर्शी प्रसंग भक्त शिरोमणि माता शबरी और प्रभु श्रीराम के मिलन तथा मीठे बेरों के अर्पण का माना जाता है, जिसकी गूंज आज भी मानिकपुर क्षेत्र में सुनाई देती है।
प्रभु श्रीराम और माता शबरी के दिव्य बेर प्रसंग की गाथा
रामायण की कथाओं के मुताबिक जब प्रभु श्रीराम चित्रकूट के वनों में प्रवास कर रहे थे, उस दौरान उनका आदिवासी और वनवासी समाज के प्रति आत्मीय स्नेह अत्यंत प्रगाढ़ हो गया था। माता शबरी प्रभु की अनन्य और निष्ठावान भक्त थीं, जो अपने आश्रम में प्रभु श्रीराम के आगमन की बाट निरंतर जोहती रहीं। जब लंबे इंतजार के उपरांत भगवान श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ शबरी की कुटिया में पधारे, तो माता शबरी का हृदय असीम आनंद से भर गया। उस समय अपनी कुटिया में भगवान के स्वागत सत्कार के लिए कोई विशेष व्यंजन न होने पर उन्होंने प्रेमपूर्वक जंगली बेर प्रभु को भेंट किए।
माता शबरी की भक्ति इतनी अगाध थी कि उन्होंने प्रभु को केवल मीठे फल अर्पित करने के उद्देश्य से प्रत्येक बेर को पहले स्वयं चखकर देखा ताकि कोई बेर खट्टा न निकल जाए। प्रभु श्रीराम ने सामाजिक मर्यादाओं और तथाकथित जूठेपन की चिंता किए बिना केवल प्रेम और समर्पण की भावना को स्वीकार करते हुए उन बेरों को बड़े चाव से ग्रहण किया। इस अनुपम प्रसंग के बाद से ही वनवासी समाज का जुड़ाव प्रभु श्रीराम से इतना गहरा हुआ कि आज भी आदिवासी समाज के लोग स्वयं को प्रभु श्रीराम का वंशज मानते हैं।
जीव हिंसा के विरोध से आरंभ हुई थी माता शबरी की वैराग्य यात्रा
आदिवासी समाज के स्थानीय सदस्य राजन कोल के अनुसार, माता शबरी ने प्रभु की कृपा प्राप्ति के लिए कठोर साधना और तपस्या का मार्ग अपनाया था। उनके वैराग्य की पृष्ठभूमि भी अत्यंत मार्मिक और करुणा से परिपूर्ण है। अपने विवाह के समय जब उन्होंने देखा कि विवाह समारोह के रीति-रिवाजों और भोजन व्यवस्था के नाम पर मूक पशुओं की बलि दी जानी तय है, तो इस क्रूर जीव हिंसा से उनका मन अत्यंत व्यथित हो उठा। निरीह प्राणियों पर होने वाले अत्याचार को देखकर उन्होंने विवाह का त्याग कर दिया और वन गमन का निर्णय लिया।
संसार के बंधनों से विरक्त होकर जब वे वन में पहुंचीं, तो उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन केवल प्रभु श्रीराम की अनवरत भक्ति और आराधना में समर्पित कर दिया। चित्रकूट के पाठा अंचल में स्थापित शबरी आश्रम इसी त्याग और तपस्या की जीती-जागती मिसाल है। यहां के आदिवासी समुदाय में माता शबरी और भगवान श्रीराम के प्रति अगाध आदर है और स्थानीय लोग आज भी माता शबरी के नाम से ही अपनी आध्यात्मिक पहचान जोड़ते हैं।
मतंग ऋषि की भविष्यवाणी और मानिकपुर आश्रम की वर्तमान धरोहर
शबरी आश्रम के पुजारी अच्छे लाल के अनुसार, माता शबरी ऋषि मतंग की अत्यंत निष्ठावान शिष्या थीं। अपने देहावसान से पूर्व गुरु मतंग ऋषि ने शबरी को आश्वस्त करते हुए कहा था कि भले ही वे स्वयं इस भौतिक संसार में न रहें, किंतु शबरी को निरंतर प्रभु श्रीराम के नाम का जप करते रहना चाहिए, क्योंकि एक दिन प्रभु श्रीराम स्वयं उनकी कुटिया में दर्शन देने अवश्य पधारेंगे। गुरु के इसी पावन वचन पर अटूट विश्वास रखकर शबरी निरंतर साधना में लीन रहीं और अंततः उन्हें भगवान के साक्षात दर्शन प्राप्त हुए।
इसी ऐतिहासिक और धार्मिक घटनाक्रम के आधार पर चित्रकूट के मानिकपुर स्थित पाठा क्षेत्र में भव्य शबरी आश्रम स्थापित है। इस आश्रम के गर्भगृह में प्रभु श्रीराम, उनके भ्राता लक्ष्मण और माता शबरी की दिव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं। प्राचीन काल में यह स्थल प्रभु श्रीराम और वनवासी समाज के परस्पर मिलन और संवाद का दरबार हुआ करता था। वर्तमान समय में भी आदिवासी समाज के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले विभिन्न वर्गों के श्रद्धालु इस आश्रम में पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।



















