भाद्रपद माह के समापन के साथ ही पितरों की आराधना का पावन पखवाड़ा शुरू हो जाता है। इस वर्ष 26 सितंबर 2026 से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही है, जिस दौरान लोग अपने पूर्वजों की तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे अनुष्ठान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार अपने पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए यह समय सर्वोत्तम माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जिस कुल पर पितरों का स्नेह और आशीर्वाद बना रहता है, वहां सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है और धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती। इसके विपरीत, पूर्वजों की नाराजगी से कुल में पितृ दोष उत्पन्न होने का भय रहता है, जिससे व्यक्ति को आजीविका, व्यवसाय और आर्थिक मोर्चे पर बार-बार विफलताओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की आत्मा की शांति हेतु किए जाने वाले इन धार्मिक कृत्यों के पश्चात शास्त्रों में कुछ कार्यों को करने की सख्त मनाही की गई है।
पूजन समाप्त होते ही विश्राम करने की मनाही
पितरों के निमित्त किया जाने वाला तर्पण या श्राद्ध कर्म संपन्न होने के तुरंत बाद बिस्तर पर जाकर लेटने या आराम करने से परहेज करना चाहिए। धार्मिक विधान के अनुसार श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद कम से कम एक पहर, जिसका अर्थ लगभग 3 घंटे होता है, तक विश्राम नहीं करना चाहिए। इस अवधि में मन को शांत रखकर पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए अथवा दान-पुण्य जैसे शुभ कार्यों में समय लगाना चाहिए। हालांकि, यह कड़ा नियम घर के अत्यंत वृद्ध सदस्यों और अस्वस्थ व्यक्तियों पर लागू नहीं होता है, वे आवश्यकतानुसार आराम कर सकते हैं।
क्रोध, कलह और बड़ों के अनादर से रहें दूर
श्राद्ध वाले दिन घर के वातावरण को पूरी तरह शांत, शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। जिस दिन आपके घर में तर्पण या श्राद्ध का अनुष्ठान हो, उस दिन किसी भी बात पर क्रोध करने या परिजनों के साथ वाद-विवाद में उलझने से बचें। विशेष रूप से परिवार के बुजुर्गों और वरिष्ठ सदस्यों का किसी भी प्रकार से तिरस्कार या अपमान भूलकर भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि जीवित वरिष्ठों के सम्मान से ही पितर प्रसन्न होते हैं।
पंचबलि और ब्राह्मण विदाई से पहले न करें भोजन
तर्पण और श्राद्ध की विधि पूरी होते ही परिवार के सदस्यों को तुरंत भोजन करने नहीं बैठना चाहिए। परंपरा के अनुसार, श्राद्ध कर्म का भोजन सबसे पहले ब्राह्मणों, गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए निकाला जाता है, जिसे पंचबलि कहा जाता है। इन सभी जीवों और ब्राह्मण को विधिपूर्वक अन्न अर्पित करने के उपरांत ही स्वयं भोजन ग्रहण करने का नियम है। इसके साथ ही, भोजन कराने के बाद ब्राह्मण को आदरपूर्वक दान और दक्षिणा देकर ही विदा किया जाना चाहिए।
तामसिक पदार्थों और व्यसन से पूरी तरह दूरी
जिस दिन पितरों का श्राद्ध या तर्पण किया जा रहा हो, उस दिन घर की रसोई में किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन नहीं बनना चाहिए और न ही बाहर ऐसा भोजन करना चाहिए। भोजन में मांस, मछली के साथ-साथ प्याज और लहसुन का प्रयोग भी पूरी तरह वर्जित रहता है। इसके अतिरिक्त मदिरा और अन्य सभी नशीले द्रव्यों से भी पूर्ण दूरी बनाकर रखनी चाहिए। पूर्वजों के अनुष्ठान के बाद केवल पूर्ण सात्विक और पवित्र आहार ही ग्रहण करना शास्त्रों में उचित बताया गया है।



















