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सीकर: युद्ध के बाद इस मंदिर में 'फतेह' की मुनादी करते थे राव राजा माधोसिंहधर्म
11 जुल॰ 2026, 11:43 am (81 दिन पहले)· 1

सीकर: युद्ध के बाद इस मंदिर में 'फतेह' की मुनादी करते थे राव राजा माधोसिंह

सीकर का प्राचीन फतेह बालाजी धाम अपने ऐतिहासिक महत्व और राजघराने से जुड़ी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि युद्ध से लौटने पर यहां राजा बालाजी को अपनी जीत समर्पित करते थे।

सीकर के दूजोद दरवाजे के भीतर स्थित श्री फतेह बालाजी धाम एक धार्मिक स्थल से कहीं बढ़कर है। यह स्थान सीकर राजघराने के स्वर्णिम अतीत का गवाह रहा है। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, तत्कालीन राव राजा माधोसिंह जब भी किसी सैन्य अभियान या युद्ध पर निकलते थे, तो वे सबसे पहले फतेह बालाजी के दरबार में हाजिरी लगाते थे। वे महाराज से विजय का आशीर्वाद लेकर ही रणभूमि की ओर प्रस्थान करते थे।

राजा की फतेह और बालाजी की कृपा

युद्ध में सफलता प्राप्त करने के बाद, राव राजा माधोसिंह सबसे पहले इसी मंदिर में वापस आते थे। वे बालाजी के चरणों में अपना शीश झुकाकर श्रद्धापूर्वक कहते थे, “बाबा, मेरी फतेह हो गई।” इसी प्राचीन और गौरवशाली परंपरा के कारण इस मंदिर का नाम फतेह बालाजी पड़ा। मंदिर के महंत पंडित रामावतार मिश्र के अनुसार, उनके परिवार की लगातार सात पीढ़ियां यहां सेवा और पूजा-अर्चना का कार्य संभाल रही हैं, जो इस मंदिर के प्रति जनमानस की अटूट निष्ठा को दर्शाता है।

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नगर के रक्षक के रूप में हनुमान

इस धाम को लेकर एक बेहद रोचक मान्यता प्रचलित है। शहर के जिस पुराने दूजोद दरवाजे पर यह मंदिर स्थित है, वहां कभी भी किवाड़ या दरवाजे नहीं लगाए गए। स्थानीय लोगों का दृढ़ विश्वास है कि नगर की रक्षा साक्षात फतेह बालाजी स्वयं करते हैं। इसी कारणवश, मंदिर में अन्य स्थानों के विपरीत कभी पर्दा नहीं लगाया जाता। श्रद्धालु किसी भी समय, चाहे दिन हो या रात, बालाजी के दर्शन का लाभ उठा सकते हैं।

विशेष भोग और उत्सवों की परंपरा

फतेह बालाजी धाम में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन साल भर चलता रहता है। बालाजी महाराज को प्रतिदिन 'रोट' का भोग लगाने की प्रथा है। हर मंगलवार को विशेष पूजा के दौरान ज्योत जलाई जाती है और भक्तों के बीच हलवा, खीर और चूरमे का प्रसाद वितरित किया जाता है। पौष के महीने में आने वाले हर मंगलवार को पौष बड़ा महोत्सव का आयोजन होता है, वहीं चैत्र पूर्णिमा पर हनुमान जन्मोत्सव के मौके पर पांच दिनों तक चलने वाले विशेष समारोह और सवामणी का आयोजन किया जाता है।

मौसमी परंपराएं और भक्तों की आस्था

मंदिर में मौसम के अनुसार भोग लगाने की अनूठी परंपरा भी कायम है। भीषण गर्मी के मौसम में बालाजी को आमरस, दही की लस्सी, ठंडाई और रायते का भोग अर्पित किया जाता है, जबकि कड़ाके की सर्दियों में बाजरे का खीचड़ा और गरमा-गरम दूध का भोग लगाया जाता है। मकर संक्रांति, होली, रक्षाबंधन, दीपावली, निर्जला एकादशी, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे त्योहारों पर मंदिर परिसर को बेहद आकर्षक झांकियों के जरिए सजाया जाता है। आज भी हजारों की संख्या में भक्त अपनी विजय और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस सिद्धपीठ में अपनी अरदास लेकर पहुंचते हैं।

सवाल-जवाब

फतेह बालाजी धाम कहां स्थित है?
यह मंदिर सीकर शहर के पुराने दूजोद दरवाजे के भीतर स्थित है।
इस मंदिर का नाम फतेह बालाजी क्यों पड़ा?
राव राजा माधोसिंह युद्ध से वापस आकर इस मंदिर में बालाजी को अपनी जीत (फतेह) समर्पित करते थे, जिसके कारण इसका नाम फतेह बालाजी पड़ा।
दूजोद दरवाजे पर किवाड़ क्यों नहीं लगे हैं?
स्थानीय मान्यता है कि नगर की रक्षा स्वयं फतेह बालाजी करते हैं, इसलिए यहां दरवाजे नहीं लगाए गए हैं।
बालाजी महाराज को किस तरह का भोग लगाया जाता है?
यहां प्रतिदिन रोट का भोग लगाया जाता है, जबकि मौसम के अनुसार आमरस, लस्सी या बाजरे का खीचड़ा जैसे विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं।
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