उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। इसी जिले के श्यामनगर क्षेत्र में एक ऐसा पावन स्थल है, जो श्रद्धा और प्राचीन साधना का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यहां स्थित बाबा रामेश्वर दास का समाधि स्थल और उसके समीप बना हनुमान जी का भव्य मंदिर स्थानीय लोगों के लिए गहरी आस्था का केंद्र है। लगभग नब्बे वर्ष पुराने इस धार्मिक स्थल के अस्तित्व में आने की कहानी बेहद रोचक है, जो एक दिव्य स्वप्न और कड़े संकल्प से जुड़ी हुई है।
इस पावन स्थल की आधारशिला वर्ष 1936 में रखी गई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तत्कालीन महंत बाबा रामेश्वर दास को एक रात सोते समय स्वप्न में एक अलौकिक संकेत मिला था। इस स्वप्न में उन्हें आदेश दिया गया कि वे मानव आबादी और शहर की हलचल से दूर एक बीहड़ वन में प्रस्थान करें। स्वप्न के माध्यम से उन्हें निर्देशित किया गया कि वे उसी निर्जन स्थान पर अपनी आध्यात्मिक तपस्या को आगे बढ़ाएं और वहां एक मंदिर का निर्माण करवाएं। महंत ने इस स्वप्न को साधारण घटना न मानकर साक्षात ईश्वर का आदेश स्वीकार किया और उस अज्ञात वन क्षेत्र की खोज में निकल पड़े।
बीहड़ जंगल से आस्था के जीवंत केंद्र तक का सफर
आज जिस श्यामनगर को हम चहल-पहल और घनी आबादी वाले क्षेत्र के रूप में देखते हैं, वह करीब नौ दशक पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था। उस दौर में यह पूरा इलाका घने जंगलों, झाड़ियों और सन्नाटे से घिरा हुआ था। जंगली जानवरों के डर के कारण आम लोग इस ओर आने से कतराते थे। ऐसे दुर्गम और सुनसान माहौल में पहुंचकर बाबा रामेश्वर दास ने अपनी कठिन साधना प्रारंभ की। वे दिन-रात ईश्वर की भक्ति में लीन रहने लगे। धीरे-धीरे उनकी इस कठिन तपस्या और आध्यात्मिक तेज की चर्चा आस-पास के गांवों तक फैलने लगी। लोग उनके दर्शन के लिए इस दुर्गम जंगल में भी आने लगे।
बाबा के प्रति बढ़ती जनश्रद्धा को देखते हुए स्थानीय लोगों के सहयोग से वहां एक मंदिर बनाने की योजना तैयार की गई। अंततः वर्ष 1936 में वहां हनुमान जी के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और मंदिर की स्थापना पूरी हुई। समय के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थितियां भी बदलती चली गईं। जैसे-जैसे साल बीतते गए, जंगल का यह वीरान इलाका धीरे-धीरे रिहायशी क्षेत्र में तब्दील हो गया और आज यह सुल्तानपुर के सबसे प्रमुख इलाकों में से एक है। मंदिर का परिसर भी विस्तृत होता गया और आज यह क्षेत्र भक्तों की भीड़ से गुलजार रहता है।
पुजारी सीताराम मौनी बाबा का कथन और समाधि स्थल का महत्व
इस मंदिर की देखभाल और पूजा-पाठ का दायित्व संभाल रहे पुजारी सीताराम मौनी बाबा ने बताया कि महंत बाबा रामेश्वर दास को मिले दिव्य स्वप्न ने ही इस पूरे क्षेत्र की नियति को बदल दिया। उनके अनुसार, बाबा रामेश्वर दास ने अपनी पूरी जिंदगी इसी स्थान पर ईश्वर की सेवा और साधना में समर्पित कर दी थी। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद मंदिर के ठीक बगल में ही उनका समाधि स्थल बनाया गया। आज जो भी श्रद्धालु इस प्राचीन हनुमान मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं, वे बाबा रामेश्वर दास के समाधि स्थल पर जाकर अपना शीश झुकाना नहीं भूलते। लोगों का मानना है कि इस परिसर में कदम रखते ही असीम मानसिक शांति की अनुभूति होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
यह स्थान सुल्तानपुर की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य हिस्सा बन चुका है। जो स्थान कभी डरावने सन्नाटे और घने पेड़ों से ढका हुआ था, वह आज हनुमान चालीसा के पाठ और शंखनाद से गूंजता रहता है। नौ दशकों का यह सफर इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची श्रद्धा और दिव्य संकल्प किस प्रकार एक निर्जन वन को भी पावन तीर्थ स्थल में परिवर्तित कर सकते हैं।



















