उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में रेलवे स्टेशन मार्ग पर स्थित प्राचीन पांडेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। यह पवित्र स्थल न केवल क्षेत्रीय श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि पौराणिक काल की कई अहम घटनाओं का साक्षी भी रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अज्ञातवास और वनवास के दौरान पांचों पांडव अपनी माता कुंती के साथ इस क्षेत्र में ठहरे थे, जिसके बाद यहाँ कई पवित्र शिवलिंगों की स्थापना की गई थी।
वनवास के दौरान पांडवों का फर्रुखाबाद आगमन
सदियों पूर्व, जब आधुनिक फर्रुखाबाद शहर अस्तित्व में नहीं आया था, तब यह संपूर्ण इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था। पांडेश्वर नाथ मंदिर के महंत उमेश शर्मा के अनुसार, अपने वनवास काल के दौरान पांडव भ्रमण करते हुए इस क्षेत्र में पहुँचे थे। उन दिनों जंगलों के समीप कुम्हारों की एक छोटी सी बस्ती हुआ करती थी। माता कुंती और पांचों पांडव भाइयों ने इसी कुम्हार बस्ती में शरण ली थी और कुछ समय यहाँ व्यतीत किया था।
माता कुंती की आज्ञा और पांचों शिवलिंगों की स्थापना
बस्ती में प्रवास के दौरान माता कुंती ने भगवान शिव की विशेष आराधना करने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने अपने पुत्रों से कहा कि वे पूजा-अर्चना के लिए शिवलिंग लेकर आएँ। माता की आज्ञा पाते ही युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव अलग-अलग दिशाओं में शिवलिंग की खोज में निकल पड़े।
सबसे पहले ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर शिवलिंग लेकर लौटे। उस समय वहाँ मौजूद ऋषि धौम्य ने पांडवों की उपस्थिति में उस शिवलिंग को विधिवत स्थापित कराया। यही शिवलिंग आज पांडेश्वर नाथ मंदिर के मुख्य पूज्य रूप में प्रसिद्ध है। इसके बाद अन्य भाइयों द्वारा लाए गए शिवलिंग भी भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थापित किए गए
- भीमसेन द्वारा लाया गया शिवलिंग: इसे गंगा नदी के मार्ग पर स्थापित किया गया था।
- अर्जुन द्वारा लाया गया शिवलिंग: यह स्थान आज तामेश्वर नाथ मंदिर के रूप में जाना जाता है।
- नकुल द्वारा लाया गया शिवलिंग: इसे कोतवालेश्वर नाम से जाना और पूजा जाता है।
- सहदेव द्वारा लाया गया शिवलिंग: इसकी स्थापना ऐतिहासिक कंपिल क्षेत्र में की गई थी।
ऋषि धौम्य का आश्रम और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पौराणिक उल्लेखों के अनुसार, उस दौर में गंगा किनारे राजा द्रुपद का भव्य किला स्थित था। उसी परिसर के पास महर्षि धौम्य का आश्रम भी था, जहाँ पांडवों ने लंबा समय बिताया था। मंदिर प्रांगण में एक अति प्राचीन पीपल का वृक्ष और चबूतरा आज भी मौजूद है, जहाँ पांडवों द्वारा ज्योतिर्लिंग स्थापित किए जाने की बात कही जाती है। पेयजल आपूर्ति के लिए उस समय निर्मित किए गए तीन प्राचीन कुएँ आज भी मंदिर परिसर की धरोहर के रूप में देखे जा सकते हैं।
रुद्राभिषेक की परंपरा और श्रद्धालुओं की आस्था
वर्तमान समय में भी इस मंदिर के प्रति जनमानस में अगाध श्रद्धा है। श्रद्धालु पास ही स्थित पांचाल नगरी पहुँचकर पतित पावनी माँ गंगा का जल भरते हैं और फिर पांडेश्वर नाथ मंदिर आकर भगवान भोलेनाथ का रुद्राभिषेक करते हैं। प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त यहाँ दर्शन-पूजन के लिए जुटते हैं। जनमान्यता है कि पांडेश्वर नाथ धाम में सच्चे मन से आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की समस्त मनोकामनाएँ भगवान शिव अवश्य पूर्ण करते हैं।



















