सनातन परंपरा में कार्तिक के महीने को साधना, आत्मशुद्धि और दान-पुण्य के लिए सबसे कल्याणकारी माना जाता है। इस पूरे महीने में पड़ने वाली अमावस्या का स्थान सबसे ऊपर है, क्योंकि यह दिन मां लक्ष्मी, भगवान विष्णु और पितरों की आराधना के लिए समर्पित रहता है। श्रद्धालुओं के बीच गंगा और अन्य पावन नदियों में डुबकी लगाकर दान करने की पुरानी परिपाटी रही है। वर्ष 2026 में तिथियों के फेर के चलते भक्तों के बीच इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि अमावस्या का मुख्य पर्व और स्नान-दान 8 नवंबर को संपन्न होगा अथवा 9 नवंबर को। पंचांग की गणनाओं के आधार पर इस तिथि के फैलाव और पूजा-अर्चना के सही समय को समझना बेहद जरूरी है।
कार्तिक अमावस्या 2026 की सही तिथि और समय
वैदिक पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का शुभारंभ 8 नवंबर 2026 को प्रातः 11 बजकर 27 मिनट पर होगा। इसके बाद यह तिथि अगले दिन यानी 9 नवंबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक प्रभावी रहेगी। हिंदू धर्म के नियमों में किसी भी व्रत और धार्मिक अनुष्ठान के लिए सूर्योदय कालीन तिथि यानी उदयातिथि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। इस गणना के तहत उदयातिथि 9 नवंबर को प्राप्त हो रही है, इसलिए नदी स्नान, तर्पण और दान से जुड़े सभी धार्मिक कार्य 9 नवंबर 2026 को ही संपन्न किए जाएंगे। दूसरी तरफ, प्रदोष काल और निशीथ काल में की जाने वाली दिवाली की मुख्य पूजा 8 नवंबर को की जाएगी, क्योंकि उस शाम को अमावस्या तिथि विद्यमान रहेगी।
स्नान और दान के लिए प्रमुख शुभ मुहूर्त
जो श्रद्धालु इस पावन अवसर पर पुण्य अर्जित करना चाहते हैं, उनके लिए शास्त्रों में विशेष समय चक्र निर्धारित किए गए हैं। ब्रह्म मुहूर्त में किया गया स्नान सबसे उत्तम माना जाता है, जो 9 नवंबर को प्रातः 5 बजकर 1 मिनट से लेकर सुबह 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में पवित्र सरोवरों या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करने से मानसिक शांति और आरोग्यता की प्राप्ति होती है। इसके अलावा दोपहर के समय अभिजित मुहूर्त का समय दोपहर 12 बजकर 00 मिनट से दोपहर 12 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। किसी भी शुभ संकल्प अथवा दान के लिए विजय मुहूर्त भी बहुत फलदायी माना गया है, जिसका समय दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से दोपहर 3 बजकर 1 मिनट तक रहने वाला है। इन अवधियों में किए गए सत्कर्म अनंत गुना फल प्रदान करते हैं।
महाभारत के शांति पर्व में वर्णित धार्मिक महत्व
कार्तिक अमावस्या के आध्यात्मिक वैभव का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। पौराणिक प्रसंगों के अनुसार महाभारत के शांति पर्व में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने इस तिथि की महिमा का बखान किया है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि कार्तिक अमावस्या उनकी सर्वाधिक प्रिय तिथि है और जो भी प्राणी इस दिन निष्काम भाव से उनकी आराधना और वंदना करता है, उसके जीवन के सभी कष्टों, संतापों और पापों का निवारण हो जाता है। इस वर्ष तिथि का विस्तार दो अलग-अलग दिनों में होने की वजह से उत्सव और साधना का विभाजन स्वाभाविक रूप से हुआ है। दीपदान और लक्ष्मी गणेश पूजन जहां 8 नवंबर की रात्रि में होगा, वहीं सूर्यदेव को अर्घ्य देकर जरूरतमंदों को सहायता पहुंचाने का कार्य 9 नवंबर के सूर्योदय के साथ शुरू होगा।
इस पावन अवसर पर किन वस्तुओं का दान करें
शास्त्रों के अनुसार कार्तिक अमावस्या पर सुपात्र और अभावग्रस्त व्यक्तियों को भेंट देने से देवी लक्ष्मी के साथ-साथ भगवान विष्णु का अटूट आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके साथ ही पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण करने से जन्म कुंडली में मौजूद पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और कुल में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। इस खास अवसर पर श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न सामग्रियों का दान कर सकते हैं
- अन्न और गेहूं या चावल
- मौसम के अनुकूल स्वच्छ वस्त्र
- पितरों की शांति के लिए काले तिल
- मिठास और सकारात्मक ऊर्जा के लिए गुड़
- हवन और भोजन में प्रयुक्त होने वाला शुद्ध घी
- पुष्टि और सात्विकता का प्रतीक ताजा दूध
- उपयोगी धातु के बर्तन
- यथाशक्ति धन अथवा दक्षिणा
अभावग्रस्तों को भोजन कराने और उनकी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने से घर में स्थायी रूप से बरकत बनी रहती है तथा जीवन के तमाम संकट धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।



















