कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली त्रयोदशी तिथि का हिंदू परंपरा में असाधारण महत्व माना गया है। दीपावली के पावन उत्सव से ठीक दो रोज पूर्व यह पर्व मनाया जाता है, जिसे आम बोलचाल में धनतेरस कहा जाता है। इस पावन अवसर पर केवल माता लक्ष्मी ही नहीं, बल्कि देवों के खजांची कुबेर देव और आरोग्य के प्रदाता भगवान धन्वंतरि की उपासना की भी गहरी परिपाटी रही है। इस वर्ष यह शुभ पर्व 6 नवंबर को आ रहा है। घरों में सुख, समृद्धि और वैभव के स्थायी वास की कामना लिए श्रद्धालु पूरे विधि-विधान के साथ इस दिन विशेष अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
घर की उत्तर दिशा में इस तरह तैयार करें पूजन चौकी
कुबेर देव की साधना आरंभ करने से पहले प्रात:काल शुद्ध जल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना आवश्यक है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार उत्तर दिशा धन और समृद्धि की मानी जाती है, इसलिए इसी दिशा में पूजा का स्थान सजाना चाहिए। लकड़ी की एक साफ चौकी रखकर उस पर लाल अथवा पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाएं। इसके ऊपर भगवान कुबेर की सुंदर प्रतिमा, चित्र अथवा कुबेर यंत्र की विधिवत स्थापना करें। यदि किसी कारणवश प्रतिमा या यंत्र उपलब्ध न हो सके, तो घर की तिजोरी अथवा आभूषणों के डिब्बे को ही उनका प्रतीक मानकर पूजा में शामिल किया जा सकता है। उस स्थान पर रोली और सिंदूर की सहायता से मांगलिक स्वस्तिक चिन्ह बनाएं तथा पवित्र मौली रक्षासूत्र बांधें।
गणेश वंदना और ध्यान मंत्र से करें अनुष्ठान की शुरुआत
सनातन रीति के अनुसार किसी भी मांगलिक कर्मकांड का प्रारंभ प्रथम पूज्य भगवान गणेश के स्मरण और पूजन के साथ ही होता है। विघ्नहर्ता का विधिवत वंदन करने के उपरांत हाथ में ताजे पुष्प लेकर धनपति कुबेर का ध्यान करना चाहिए। ध्यान के दौरान उनके दिव्य स्वरूप का स्मरण करते हुए स्तुति की जाती है। उनके ध्यान हेतु गरुड़ रत्न के समान कांति वाले, निधियों के अधिपति, मुकुट से सुशोभित और हाथ में श्रेष्ठ गदा धारण करने वाले भगवान कुबेर के स्वरूप का मन में चिंतन किया जाता है।
समर्पण सामग्री, दीपदान और मंत्र जाप की प्रक्रिया
कुबेर देव की प्रतिमा, स्थापित यंत्र, चांदी के सिक्के अथवा तिजोरी पर पवित्र जल का छिड़काव करने के बाद चंदन, कुमकुम, सिंदूर, अक्षत और सुगंधित फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक ॐ श्रीं कुबेराय नमः मंत्र की कम से कम 11 अथवा 108 बार माला जपते हैं। नैवेद्य के रूप में विविध फल, मिष्ठान और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। मान्यता के अनुसार इस पूजन में सफेद रंग की मिठाई का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। इसी अनुष्ठान के दौरान माता लक्ष्मी एवं भगवान धन्वंतरि की भी विधिवत अर्चना की जाती है।
सप्त धान्य अर्पण और संध्या समय 13 दीपकों का नियम
पूजा की शास्त्रीय विधि में सात प्रमुख अनाजों का समर्पण बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। इन सप्त धान्यों में गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर को शामिल किया जाता है। इन सभी धान्यों को धूप, दीप, अक्षत और पुष्पों के साथ देव प्रतिमा को अर्पित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, धनतेरस के दिन प्रदोष काल यानी गोधूलि वेला में दीपदान का विशेष महात्म्य है। संध्या समय घर में जहां धन, आभूषण अथवा संपत्ति रखी जाती है, उस स्थान के निकट 13 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। पूजन की समाप्ति पर श्रद्धा भाव से आरती उतारकर सभी में प्रसाद वितरित किया जाता है और बरकत बनाए रखने के लिए तिजोरी में सिद्ध यंत्र अथवा सिक्का स्थापित किया जाता है।
धन और ऐश्वर्य के अधिपति का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं में कुबेर देव को देवताओं के कोषाध्यक्ष का दर्जा प्राप्त है। वे समस्त सांसारिक संपदा, रत्न, वैभव और ऐश्वर्य के रक्षक तथा स्वामी माने गए हैं। धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजन के साथ उनके पूजन का मूल उद्देश्य यही है कि अर्जित धन का सदुपयोग हो और परिवार में आर्थिक स्थिरता सदैव बनी रहे। विधिवत पूजन से घर-परिवार में दरिद्रता का नाश होकर सुख और शांति का संचार होता है।



















