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उत्तराखंड में मनाया जा रहा है खास घ्यू त्यार, घी खाने से जुड़ी है अनोखी मान्यताधर्म
17 अग॰ 2026, 10:41 am (44 दिन पहले)· 4

उत्तराखंड में मनाया जा रहा है खास घ्यू त्यार, घी खाने से जुड़ी है अनोखी मान्यता

उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में सिंह संक्रांति के अवसर पर घ्यू त्यार मनाया जा रहा है, जिसमें घी खाने की अनूठी परंपरा के साथ ही कृषि और संस्कृति का मिलन देखने को मिलता है।

उत्तराखंड की देवभूमि अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और अनूठे पर्वों के लिए देश भर में एक अलग ही पहचान रखती है। इसी कड़ी में कुमाऊं अंचल में मनाए जाने वाले घ्यू त्यार का विशेष स्थान है, जो आस्था, खान-पान, कृषि और सामाजिक परंपराओं का एक सुंदर संगम पेश करता है। सिंह संक्रांति के पावन अवसर पर आने वाले इस पर्व को लेकर लोगों में काफी उत्साह रहता है। इस दिन घी का सेवन करना केवल शुभ नहीं माना जाता, बल्कि इसे परंपरा का एक अनिवार्य हिस्सा भी समझा जाता है। इस त्योहार से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प लोकमान्यता भी है, जिसके अनुसार अगर कोई इस दिन घी नहीं खाता है, तो उसे अगले जन्म में घोंघा बनना पड़ता है।

सिंह संक्रांति और पर्व का समय

नैनीताल के रहने वाले पंडित प्रकाश जोशी बताते हैं कि कुमाऊं क्षेत्र में घ्यू त्यार मुख्य रूप से सिंह संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह लोकपर्व हरेला पर्व के ठीक एक महीने के बाद भादो मास की पहली तिथि यानी एक गते के आसपास पड़ता है। पर्व के आने से पहले ही पहाड़ी गांवों में घरों की साफ-सफाई से लेकर पारंपरिक पकवानों को तैयार करने तक की विशेष तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कई इलाकों में इस उत्सव को ओल्गिया पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इसका दायरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों के जीवन, उनकी नई फसल और स्थानीय खान-पान की परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

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घी न खाने से जुड़ी लोककथा और मान्यता

इस पर्व की सबसे अनोखी बात इस दिन अनिवार्य रूप से घी का सेवन करना है। कुमाऊं में पीढ़ियों से यह कहावत चली आ रही है कि जो व्यक्ति इस दिन घी नहीं चखता, उसे अगले जन्म में गनेल यानी घोंघे की योनि मिलती है। यह एक ऐसी लोकमान्यता है जिसके जरिए बच्चों और नई पीढ़ी को इस संस्कृति से जोड़े रखने का काम किया जाता रहा है। स्थानीय मान्यताओं में घोंघे को सुस्ती, धीमेपन और आलस्य का प्रतीक माना जाता है, जो परंपरा के बहाने जीवन में सक्रियता का संदेश देता है।

पारंपरिक पकवान और स्थानीय फसलें

घ्यू त्यार के मौके पर घरों में लजीज पारंपरिक भोजन बनाने की खास तैयारी की जाती है। उड़द की दाल को लगभग छह से आठ घंटे तक भिगोकर रखा जाता है, और फिर उसे सिलबट्टे पर पीसकर बेड़ू रोटी, पूड़ी, पुए और खीर जैसे पकवान तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा कुमाऊं के अनेक क्षेत्रों में इस दिन पिनालू यानी अरबी के पत्तों, जिन्हें स्थानीय भाषा में गाबे भी कहा जाता है, की सब्जी बनाने की शुरुआत भी की जाती है। इस प्रकार यह त्योहार स्थानीय फसलों और पारंपरिक व्यंजनों को संरक्षित करने का एक बड़ा माध्यम बन जाता है।

बच्चों के सिर पर घी लगाने की परंपरा

इस त्योहार से जुड़ी एक बेहद आत्मीय रस्म बच्चों के सिर पर ताजा मक्खन या घी लगाने की है। परिवार के बुजुर्ग लोग बच्चों के सिर पर घी लगाकर उन्हें लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा घर के बड़ों के अनुभवों और आने वाली पीढ़ी के बीच सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करती है। इस बहाने बच्चे अपने पहाड़ की लोक परंपराओं और खान-पान की शैली से भली-भांति परिचित होते हैं।

कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति आभार

घ्यू त्यार का नाता कृषि संस्कृति से भी बहुत गहरा है। इस दिन किसान अपनी खेतों की नई फसल की पहली उपज को देवी-देवताओं को अर्पित करते हैं। कई जगहों पर गाबा, भुट्टा, ककड़ी, दूध और दही जैसी चीजें पंडितों, रिश्तेदारों और आसपास के परिचितों को भेंट करने का रिवाज है। यही कारण है कि ओल्गिया पर्व को किसान जीवन, भाईचारे और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व हमें प्रकृति और खेती से मिलने वाले तमाम संसाधनों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।

लोक नृत्य और ज्योतिषीय महत्व

घ्यू त्यार का उल्लास केवल रसोई और घरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांवों में महिलाएं और पुरुष मिलकर झोड़ा-चांचरी का आयोजन करते हैं। पारंपरिक लोकगीतों और नृत्य की थाप पर पूरा गांव उत्सव के माहौल में रंग जाता है। इसके अलावा सिंह संक्रांति का संबंध सूर्य देव से भी जोड़ा जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य देव की पूजा करने, घी का सेवन करने तथा उसका दान करने से कुंडली में सूर्य ग्रह मजबूत होता है, हालांकि ये पूरी तरह से पारंपरिक और धार्मिक विश्वास हैं।

सवाल-जवाब

घ्यू त्यार मुख्य रूप से किस क्षेत्र में मनाया जाता है?
घ्यू त्यार मुख्य रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक लोकपर्व है।
इस पर्व को किस संक्रांति के रूप में मनाया जाता है?
कुमाऊं में घ्यू त्यार को सिंह संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है।
घ्यू त्यार से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोकमान्यता क्या है?
इस दिन घी न खाने वाले व्यक्ति को लेकर यह मान्यता है कि उसे अगले जन्म में घोंघा यानी गनेल की योनि मिलती है।
इस पर्व को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
कुमाऊं के कई क्षेत्रों में घ्यू त्यार को ओल्गिया पर्व के नाम से भी पुकारा जाता है।
पर्व के दौरान कौन से पकवान विशेष रूप से बनाए जाते हैं?
इस दिन उड़द की दाल से बेड़ू रोटी, पूड़ी, पुए और खीर जैसे पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं।
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