आगरा से महज करीब 14 किलोमीटर दूर यमुना नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव सदियों पुरानी एक बड़ी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है. आज इस गांव को रुनकता के नाम से जाना जाता है, लेकिन पुराने समय में इसे रेणुका धाम कहा जाता था. मान्यता है कि यही वह पवित्र भूमि है जहां त्रेता युग में भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम ने जन्म लिया था.
महर्षि जमदग्नि की तपोभूमि
इतिहासकारों के मुताबिक रेणुका धाम को महर्षि भृगु के वंशज महर्षि जमदग्नि की तपोभूमि माना जाता है. श्रीमद्भागवत और हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में दर्ज कथाओं के अनुसार महर्षि जमदग्नि अपनी पत्नी माता रेणुका के साथ यमुना किनारे इसी आश्रम में रहा करते थे. यहीं वैशाख शुक्ल तृतीया, यानी अक्षय तृतीया के दिन माता रेणुका की कोख से भगवान परशुराम ने जन्म लिया. आगरा के इतिहासकार शैलेन्द्र सिंह बताते हैं कि जब परशुराम का जन्म हुआ था तो आसपास मौजूद सभी ऋषियों ने खुशियां मनाई थीं. उन्हीं क्षणों से इस भूमि को बेहद पवित्र और चमत्कारी मान लिया गया.
पिता की आज्ञा पर मां का वध
रेणुका धाम से जुड़ी सबसे चर्चित कथा परशुराम और उनकी मां रेणुका के बीच की है. मान्यता है कि एक दिन यज्ञ के लिए जल लाने में माता रेणुका से देरी हो गई. इससे नाराज महर्षि जमदग्नि ने अपने पुत्र परशुराम को आदेश दिया कि वे अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दें. पिता की आज्ञा मानते हुए परशुराम ने ऐसा कर भी दिया. बाद में जब महर्षि जमदग्नि प्रसन्न हुए तो उन्होंने परशुराम को वरदान दिया, जिसकी मदद से माता रेणुका को फिर से जीवित कर दिया गया. इसी घटना के चलते यह स्थान लोगों की आस्था में और गहराई से बस गया और इसे चमत्कारी भूमि माना जाने लगा.
रेणुका धाम से कैसे बना रुनकता
समय बीतने के साथ रेणुका धाम का नाम बोलचाल की भाषा में बदलता चला गया. लोग इसे धीरे धीरे रुनकता कहने लगे, जिसका मतलब निकाला जाता है ऋण कृत तीर्थ. यही वजह है कि आज ज्यादातर लोग इस गांव को रुनकता के नाम से ही पहचानते हैं, हालांकि क्षेत्र के कई बुजुर्ग और श्रद्धालु आज भी इसे रेणुका धाम कहना पसंद करते हैं. यमुना किनारे बसा यह इलाका इतिहास, आस्था और चमत्कार तीनों को अपने में समेटे हुए है.
18वीं सदी में बना भव्य मंदिर
वर्तमान में इस स्थान पर भगवान परशुराम का एक प्राचीन और भव्य मंदिर बना हुआ है. बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण ग्वालियर के महाराज जयाजी राव सिंधिया ने 18वीं सदी में करवाया था. इस मंदिर के दर्शन के लिए दूर दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. खासकर परशुराम जयंती के मौके पर यहां भारी संख्या में लोग जुटते हैं और यमुना में स्नान करने के बाद मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं. आगरा को पहले ही एक ऐतिहासिक नगरी के तौर पर जाना जाता रहा है, और रेणुका धाम इस पहचान को और मजबूत करता है. इतिहासकार शैलेन्द्र सिंह के मुताबिक यह क्षेत्र सिर्फ ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि बेहद पवित्र और चमत्कारी भी माना जाता है, जिसकी जड़ें सीधे त्रेता युग से जुड़ती हैं.













