उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के निचलौल क्षेत्र में स्थित राम जानकी मंदिर इन दिनों अपनी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ एक विशेष प्राकृतिक धरोहर की वजह से चर्चा में है। मंदिर परिसर के पिछले हिस्से में एक अत्यंत प्राचीन और विशाल गूलर का पेड़ मौजूद है, जिसकी वास्तविक आयु के बारे में किसी को सटीक जानकारी नहीं है। स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं के लिए यह विशालकाय वृक्ष हमेशा से कौतूहल का विषय रहा है। कई पीढ़ियों से यह पेड़ इसी विशाल रूप में मंदिर परिसर की शोभा बढ़ा रहा है और लोग इसे आस्था के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखते हैं।
तीन पीढ़ियों का पारिवारिक इतिहास और अनसुलझी आयु
राम जानकी मंदिर के वर्तमान पुजारी के परिवार की कई पीढ़ियां इस पावन स्थल पर पूजा-अर्चना और सेवा करती आ रही हैं। वर्तमान पुजारी स्वयं इस मंदिर की सेवा करने वाले तीसरे पीढ़ी के सदस्य हैं। उन्होंने इस प्राचीन वृक्ष के संदर्भ में महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि उनके परदादा भी अपने समय में इस गूलर के पेड़ का उल्लेख किया करते थे। उनके परदादा के समय में भी यह पेड़ ठीक इसी तरह विशाल और घना हुआ करता था।
पुजारी का कहना है कि जब उनके परदादा के कार्यकाल में भी यह पेड़ इतना ही विशाल था, तो ऐसे में इसकी वास्तविक उम्र का सटीक आकलन कर पाना लगभग असंभव है। समय बीतने के साथ-साथ यह पेड़ मंदिर की ऐतिहासिक पहचान और पारिवारिक स्मृतियों से गहराई से जुड़ चुका है। यही कारण है कि मंदिर में आने वाला हर नया-पुराना श्रद्धालु इस वृक्ष की विशालता को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है।
पवित्र परिसर में पक्षियों और बंदरों का अनूठा आश्रय
इस प्राचीन गूलर वृक्ष की एक सबसे अनूठी और ध्यान आकर्षित करने वाली विशेषता इसके फलों से जुड़ी है। सामान्य तौर पर लोग गूलर के फलों को तोड़कर खाते हैं, लेकिन राम जानकी मंदिर परिसर में स्थित इस पेड़ के फलों को कोई भी इंसान तोड़कर नहीं खाता। स्थानीय धार्मिक परंपराओं और श्रद्धा के चलते श्रद्धालुओं ने हमेशा इन फलों को वन्यजीवों के लिए ही छोड़ रखा है।
दिन भर इस विशाल पेड़ की डालियों पर बंदरों की टोलियां और तरह-तरह के पक्षी फल खाते हुए दिखाई देते हैं। मंदिर परिसर में आने वाले भक्त अक्सर पेड़ की घनी शाखाओं पर पक्षियों और बंदरों को शांतिपूर्वक फल खाते हुए देखते हैं। यह दृश्य मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण को प्रकृति के साथ सुंदर तालमेल प्रदान करता है।
कटाई के प्रस्ताव का विरोध और संरक्षण का संकल्प
यह विशाल वृक्ष मंदिर परिसर को न केवल घनी छांव और निरंतर हरियाली प्रदान करता है, बल्कि आसपास के वातावरण को भी बेहद शांत और सुहावना बनाए रखता है। श्रद्धालुओं के लिए यह पेड़ अब मंदिर की वास्तुकला और परिवेश का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हालांकि, कुछ समय पहले इस ऐतिहासिक पेड़ को काटने का विचार सामने आया था, जिससे इसके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा था।
जैसे ही पेड़ को हटाने या काटने की बात उठी, मंदिर के पुजारी ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पेड़ मंदिर संरचना या किसी भी व्यक्ति को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा रहा है। पुजारी का मानना था कि सदियों पुरानी इस प्राकृतिक और धार्मिक धरोहर को नष्ट करने के बजाय इसका संरक्षण करना चाहिए। पुजारी के इस मजबूत रुख के कारण पेड़ को कटने से बचा लिया गया, और आज यह गूलर का वृक्ष राम जानकी मंदिर की महान परंपरा, प्राकृतिक सुंदरता और जन-आस्था का एक मजबूत प्रतीक बनकर खड़ा है।



















