अंतरिक्ष तकनीक की दौड़ में चीन ने एक बहुत बड़ी कामयाबी दर्ज की है। पहली बार चीन ने ऑर्बिटल कैटेगरी के रॉकेट के फर्स्ट स्टेज बूस्टर को वर्टिकल पावर्ड डिसेंट के जरिए सफलतापूर्वक वापस जमीन पर उतार लिया है। इस तकनीकी महारत के हासिल होने के बाद चीन उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास रीयूजेबल यानी दोबारा इस्तेमाल होने वाले लॉन्च सिस्टम को विकसित करने की क्षमता है। चीन की यह उपलब्धि भारत के लिए एक बड़ा संकेत है, क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का अपना महत्वाकांक्षी नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) अभी केवल विकास के शुरुआती दौर में है और इसकी पहली प्रदर्शन उड़ान में अभी कई साल का समय लगने की संभावना है।
चीन का मिशन और वैश्विक स्थिति
चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (CMSA) की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, लॉन्ग मार्च-10B रॉकेट का पहला चरण हैनान तट के पास पूरी तरह सुरक्षित तरीके से उतारा गया। चीन की योजना इस बूस्टर का उपयोग इसी वर्ष किसी अगले मिशन में करने की है, जो अंतरिक्ष प्रक्षेपण की लागत को बड़े पैमाने पर कम करने में सहायक होगा। इस क्षेत्र में अभी तक अमेरिकी कंपनी SpaceX का दबदबा है, जिसके फाल्कन-9 रॉकेट पिछले एक दशक से लगातार रिकवर किए जा रहे हैं। ब्लू ओरिजिन भी अपने न्यू ग्लेन रॉकेट के साथ इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। अब चीन की इस सफलता से यह साफ है कि रीयूजेबल तकनीक का एकाधिकार खत्म हो रहा है और चंद्रमा के भावी मिशनों तथा कमर्शियल लॉन्च के लिए यह तकनीक अनिवार्य हो गई है।
भारत का NGLV कार्यक्रम
भारत की ओर से ISRO का नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) प्रोजेक्ट इस रीयूजेबल तकनीक को हासिल करने की मुख्य कोशिश है। इसे एक ऐसे लॉन्चर के रूप में तैयार किया जा रहा है जो आंशिक रूप से रीयूजेबल हो, मानव मिशनों में सक्षम हो और व्यावसायिक रूप से भी सफल रहे। यह तीन चरणों वाला रॉकेट लो-अर्थ ऑर्बिट में करीब 30 टन तक का पेलोड ले जाने में सक्षम होगा। इसके डिजाइन में दो वेरिएंट्स पर काम किया जा रहा है, जिसमें एक में सॉलिड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर का उपयोग होगा और दूसरे में नहीं।
ISRO की तैयारी और भविष्य
ISRO ने NGLV के फर्स्ट स्टेज को वर्टिकल लैंडिंग के जरिए वापस लाने का जो लक्ष्य रखा है, उसके लिए काम काफी व्यवस्थित तरीके से चल रहा है। एजेंसी पहले ही रॉकेट के प्रारंभिक डिजाइन, मिशन की जरूरतें, फ्लाइट पाथ का निर्धारण, विंड टनल मॉडल और 3D मॉडल जैसे अहम पड़ाव पूरे कर चुकी है। इसके अलावा, एलओएक्स-मीथेन पर आधारित LME-1100 इंजन की डिजाइन पर भी काम जारी है, और इसके निर्माण के लिए उद्योगों से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट आमंत्रित किए जा चुके हैं। इससे पहले ISRO अपने रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल-टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर (RLV-TD) के जरिए ऑटोनोमस रनवे लैंडिंग का सफल परीक्षण कर चुका है, लेकिन वर्टिकल लैंडिंग वाली वास्तविक क्षमता अभी NGLV प्रोग्राम के जरिए ही संभव होगी। चीन की मौजूदा सफलता ने वैश्विक अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा को एक नई गति दे दी है, जिससे भारत के सामने अपने इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को तय समय सीमा में पूरा करने का दबाव और चुनौती दोनों बढ़ गए हैं।











