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टाइटन और प्लूटो पर मिला एक ऐसा सिग्नल जिसे वैज्ञानिक अब तक नहीं पहचान पाएविज्ञान
3 घंटे पहले· 2

टाइटन और प्लूटो पर मिला एक ऐसा सिग्नल जिसे वैज्ञानिक अब तक नहीं पहचान पाए

एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में प्रकाशन के लिए भेजे गए एक अध्ययन के मुताबिक जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के डेटा में टाइटन और प्लूटो, दोनों पर 5.113 माइक्रोमीटर का एक ऐसा एब्जॉर्प्शन सिग्नल मिला है जिसे अब तक किसी जाने-पहचाने पदार्थ से नहीं जोड़ा जा सका।

दिव्या रेड्डीदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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टाइटन और प्लूटो नाम के दो बेहद ठंडे और दूर-दराज के खगोलीय पिंडों पर वैज्ञानिकों को एक ऐसा रासायनिक सिग्नल मिला है जिसे अब तक कोई पहचान नहीं पाया है। एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स नाम की पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजे गए एक अध्ययन के मुताबिक, 5.113 माइक्रोमीटर पर केंद्रित एक एब्जॉर्प्शन बैंड शनि के सबसे बड़े चंद्रमा टाइटन और सौरमंडल के किनारे मौजूद बौने ग्रह प्लूटो, दोनों से आने वाली इन्फ्रारेड रोशनी में मिला है। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों पिंड अरबों किलोमीटर दूर हैं और भौतिक रूप से एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, फिर भी सिग्नल एक जैसा है।

पक्का सिग्नल, पर पहचान नामुमकिन

यह कोई इक्का-दुक्का गड़बड़ी नहीं थी। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप यानी JWST के दो अलग-अलग उपकरणों से की गई ऑब्जर्वेशन में भी यही सिग्नल दिखा, जिसके बाद वैज्ञानिकों की टीम ने इसे कैलिब्रेशन की गड़बड़ी या किसी तकनीकी खराबी की वजह मानने की संभावना खारिज कर दी। सिग्नल असली साबित होने के बाद टीम ने अपने रेफरेंस डेटा से मिलान करना शुरू किया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

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स्पेक्ट्रोस्कोपी से कैसे खुलता है ब्रह्मांडीय राज

दूर मौजूद किसी अनजान पदार्थ को पहचानने के लिए वैज्ञानिक स्पेक्ट्रोस्कोपी नाम की तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। हर तत्व और अणु रोशनी के साथ अपने अलग ही अंदाज़ में पेश आता है, यह कुछ खास वेवलेंथ को सोख लेता है और पीछे एक ऐसा पैटर्न छोड़ जाता है जो फिंगरप्रिंट जितना अनोखा होता है। पिछले कई दशकों में वैज्ञानिकों ने ऐसे स्पेक्ट्रल सिग्नेचर का बड़ा भंडार तैयार किया है, जिसकी मदद से पानी, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड या अमोनिया जैसे पदार्थों को ग्रहों और चंद्रमाओं के साथ-साथ सौरमंडल से बाहर मौजूद पिंडों पर भी पहचाना जाता रहा है। लेकिन इस बार 5.113 माइक्रोमीटर वाले बैंड का मिलान इन कैटलॉग से करने पर कोई ठोस नतीजा हाथ नहीं लगा। मौजूदा दौर की प्लेनेटरी स्पेक्ट्रोस्कोपी में किसी ऐसे केमिकल फिंगरप्रिंट का मिलना बेहद असामान्य माना जाता है जिसका किसी जाने-पहचाने पदार्थ से कोई नाता न जुड़ पाए, और टीम का मानना है कि टाइटन और प्लूटो पर आखिर हो क्या रहा है, यह सवाल आगे चलकर प्लेनेटरी साइंस के सबसे बुनियादी सवालों में शुमार हो सकता है।

शक के घेरे में आए पदार्थ भी फिट नहीं बैठे

वैज्ञानिकों ने पहले ही इन पिंडों पर मौजूद माने जाने वाले बर्फ और ऑर्गेनिक कंपाउंड के लैब स्पेक्ट्रा से कई संभावित पदार्थों का मिलान करके देखा, जिनमें एसिटिलीन, बेंजीन, कीटीन और एलीन कहलाने वाले अणुओं का एक पूरा परिवार शामिल है। इनमें से कोई भी वेब टेलीस्कोप से मिले सिग्नल से पूरी तरह मेल नहीं खाता। फिलहाल सबसे संभावित वजह यह मानी जा रही है कि यह सिग्नल किसी जाने-पहचाने पदार्थ का ही है, लेकिन वह किसी ऐसी भौतिक अवस्था या मिश्रण में मौजूद है जिसे अब तक लैब में कभी बनाकर परखा ही नहीं गया। अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक एक और चौंकाने वाली संभावना को भी खारिज नहीं कर रहे, कि यह सिग्नेचर किसी ऐसे पदार्थ का हो सकता है जिसकी केमिस्ट्री को अब तक वैज्ञानिकों ने समझा ही नहीं है।

दो बिल्कुल अलग दुनिया, फिर भी एक जैसी केमिस्ट्री

इस खोज को और रहस्यमयी बनाती है यह बात कि यह एक जैसा सिग्नल ऐसे दो पिंडों पर मिला है जो हालात के लिहाज से एक-दूसरे से बेहद अलग हैं। टाइटन का वायुमंडल नाइट्रोजन और मीथेन से भरपूर है, वहां सतह का दबाव करीब 1.5 बार है, यानी धरती से भी ज्यादा, इसके अलावा वहां लिक्विड मीथेन की नदियां और झीलें भी मौजूद हैं, और सतह का तापमान करीब माइनस 180 डिग्री सेल्सियस (माइनस 292 डिग्री फारेनहाइट) रहता है। दूसरी ओर प्लूटो के पास बेहद पतला वायुमंडल है, करीब 10 माइक्रोबार का, जो टाइटन के मुकाबले करीब 150,000 गुना कम घना है, वहां की बर्फीली सतह नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड से बनी है, और तापमान करीब माइनस 235 डिग्री सेल्सियस (माइनस 391 डिग्री फारेनहाइट) तक गिर जाता है। हालात में इतने बड़े फर्क के बावजूद दोनों दुनिया में सौर विकिरण और कॉस्मिक किरणों की वजह से जटिल ऑर्गेनिक केमिस्ट्री चलती रहती है, जो नए-नए पदार्थ बनाकर आखिरकार इनकी सतह पर जमा कर देती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हालात एक जैसे न होने के बावजूद, दोनों पिंडों का साझा केमिकल इतिहास ही इस रहस्यमयी सिग्नल की असली वजह हो सकता है।

आगे क्या होगा

इस पहेली को सुलझाने के लिए जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से आगे और ऑब्जर्वेशन जुटानी होंगी, साथ ही धरती पर लैब में टाइटन और प्लूटो जैसी बर्फीली केमिस्ट्री को दोबारा तैयार करने के लिए नए प्रयोग भी करने होंगे। वैज्ञानिकों को नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन से भी बड़ी उम्मीदें हैं, जो सीधे टाइटन की सतह पर उतरकर उसकी पड़ताल करेगा। हालांकि यह स्पेसक्राफ्ट इस खास इन्फ्रारेड सिग्नल को सीधे तौर पर देख नहीं पाएगा, लेकिन इसमें लगी केमिस्ट्री लैब कुछ संभावित पदार्थों की पहचान करने में मदद कर सकती है, जिससे जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की उठाई इस सबसे दिलचस्प पहेलियों में से एक को सुलझाने का रास्ता खुल सकता है।

इसका आप पर असर

  • अंतरिक्ष प्रेमियों और छात्रों के लिए: टाइटन और प्लूटो पर मिला यह अनसुलझा सिग्नल दिखाता है कि बुनियादी प्लेनेटरी केमिस्ट्री के बारे में अभी भी कितना कुछ अनजान है, और आने वाले वर्षों में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की नई ऑब्जर्वेशन और नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन से इसका जवाब मिल सकता है।

सवाल-जवाब

टाइटन और प्लूटो पर मिला रहस्यमयी सिग्नल आखिर क्या है?
यह जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से मिला 5.113 माइक्रोमीटर पर केंद्रित एक एब्जॉर्प्शन बैंड है, जिसे अब तक किसी जाने-पहचाने पदार्थ से नहीं जोड़ा जा सका है।
वैज्ञानिकों ने इसे तकनीकी गड़बड़ी क्यों नहीं माना?
यह सिग्नल जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के दो अलग-अलग उपकरणों से की गई ऑब्जर्वेशन में भी दिखा, इसलिए टीम ने कैलिब्रेशन की गड़बड़ी की संभावना खारिज कर दी।
क्या यह सिग्नल किसी जाने-पहचाने पदार्थ से मेल खाता है?
नहीं, एसिटिलीन, बेंजीन, कीटीन और एलीन जैसे पदार्थों के लैब स्पेक्ट्रा से मिलान करने पर भी कोई ठोस मेल नहीं मिला।
टाइटन और प्लूटो के भौतिक हालात में कितना अंतर है?
टाइटन का सतह दबाव करीब 1.5 बार और तापमान करीब माइनस 180 डिग्री सेल्सियस है, जबकि प्लूटो का वायुमंडल करीब 10 माइक्रोबार का बेहद पतला है और वहां तापमान करीब माइनस 235 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।
वैज्ञानिक इस पहेली को कैसे सुलझाने की कोशिश करेंगे?
इसके लिए जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से नई ऑब्जर्वेशन और धरती पर लैब प्रयोगों के साथ-साथ नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन से मिलने वाले डेटा पर भरोसा किया जा रहा है।
क्या ड्रैगनफ्लाई मिशन इस सिग्नल को सीधे देख पाएगा?
नहीं, लेकिन इसमें लगी केमिस्ट्री लैब कुछ संभावित पदार्थों की पहचान करने में मदद कर सकती है।
दिव्या रेड्डी
लेखक के बारे मेंदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता आगरा
विशेषज्ञताशिक्षा समाचार, स्कूल, विश्वविद्यालय, शिक्षा नीति, परीक्षा, छात्रवृत्ति, छात्र मामले, शैक्षणिक रुझान, उच्च शिक्षा, कौशल विकास

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक रुझानों और छात्रों से जुड़ी ख़बरों को कवर करती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के अहम घटनाक्रमों पर स्पष्टता व अंतर्दृष्टि के साथ रिपोर्ट करती हैं।

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो शिक्षा पत्रकारिता — स्कूल व विश्वविद्यालय की ख़बरों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक सुधारों, छात्र मामलों और कौशल विकास पहलों — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के ब्रेकिंग घटनाक्रम, परीक्षा अपडेट, संस्थागत बदलाव, सरकारी शिक्षा कार्यक्रम और सीखने में नवाचार पर रिपोर्ट करती हैं। सटीक व सुलभ रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ दिव्या छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे कवर करती हैं। उनका काम पाठ्यक्रम में बदलाव, उच्च शिक्षा रुझानों, छात्रवृत्ति अवसरों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा में तकनीक की बदलती भूमिका को उजागर करता है।

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